आलू-प्याज-टमाटर की सप्लाई चेन में कहां जा रहा पैसाभारतीय घरों में टमाटर, प्याज और आलू हर दिन इस्तेमाल होते हैं. लेकिन जब आप बाजार से इन्हें खरीदते हैं, तो उस पैसे का बड़ा हिस्सा किसान तक नहीं पहुंचता. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की एक नई स्टडी में यह बात सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, उपभोक्ता जो 100 रुपये खर्च करता है, उसमें से किसान को औसतन सिर्फ 33 से 37 रुपये ही मिलते हैं. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की अक्टूबर 2024 की वर्किंग पेपर सीरीज में पब्लिश्ड स्टडी 'भारत में सब्जियों की महंगाई: टमाटर, प्याज और आलू का अध्ययन (TOP)' में में किसानों से लेकर ट्रेडर, थोक कारोबारी और रिटेलर तक पूरी वैल्यू चेन का आकलन किया गया है.
स्टडी के मुताबिक, टमाटर की सप्लाई चेन में किसान को हर 100 रुपये में से 33.5 रुपये मिलते हैं. ट्रेडर 21.3 रुपये लेता है, थोक कारोबारी 16.1 रुपये और रिटेलर सबसे ज्यादा यानी 29.1 रुपये लेता है. रिपोर्ट के मुताबिक, टमाटर जल्दी खराब हो जाता है. इसी वजह से रिटेलर को सबसे ज्यादा हिस्सा मिलता है, क्योंकि उसे खराबे का जोखिम खुद उठाना पड़ता है.
प्याज में किसान को 100 रुपये में से 36.2 रुपये मिलते हैं. ट्रेडर का हिस्सा 17.6 रुपये है, थोक कारोबारी का 15 रुपये और रिटेलर का 31.3 रुपये है. यानी प्याज में भी आधे से ज्यादा पैसा किसान के हाथ में आने से पहले ही खर्च हो जाता है.
आलू की सप्लाई चेन में किसान का हिस्सा 36.7 प्रतिशत है. ट्रेडर को 16.2 रुपये, थोक कारोबारी को 16 रुपये और रिटेलर को 31 रुपये मिलते हैं. यह आंकड़ा आगरा की थोक कीमत और मुंबई की खुदरा कीमत के आधार पर निकाला गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, आलू किसान को अपनी जेब से भी कई खर्च उठाने पड़ते हैं. ट्रांसपोर्ट पर करीब 30 रुपये प्रति क्विंटल खर्च होता है. पैकेजिंग पर 80 रुपये, मजदूरी पर 100 रुपये और स्टोरेज पर 250 से 260 रुपये प्रति क्विंटल तक खर्च आता है. यानी किसान को जो हिस्सा मिलता है, उसमें से भी यह खर्च कटता है.
किसान से लेकर उपभोक्ता तक सब्जी कई हाथों से गुजरती है. सबसे पहले किसान अपनी फसल मंडी में लाता है. वहां से ट्रेडर या कमीशन एजेंट उसे खरीदता है. इसके बाद माल थोक मंडी में जाता है, फिर रिटेलर तक पहुंचता है और आखिर में उपभोक्ता तक. हर लेवल पर ट्रांसपोर्ट, मंडी फीस, कमीशन, पैकेजिंग और लोडिंग-अनलोडिंग जैसे खर्च जुड़ते जाते हैं. इन खर्चों के ऊपर हर कड़ी अपना मुनाफा भी जोड़ती है. यही वजह है कि खेत से निकलने के बाद सब्जी की कीमत दोगुनी या तिगुनी तक हो जाती है.
रिपोर्ट यह भी साफ करती है कि ट्रेडर और थोक कारोबारी को जो हिस्सा मिलता है, उसका पूरा पैसा उनका मुनाफा नहीं होता. उदाहरण के लिए टमाटर में ट्रेडर का हिस्सा 21.3 प्रतिशत दिखता है, लेकिन इसमें से ज्यादातर पैसा ट्रांसपोर्ट, मंडी फीस, कमीशन और लोडिंग-अनलोडिंग में चला जाता है. असली मुनाफा सिर्फ 5.3 प्रतिशत के करीब बचता है.
रिपोर्ट में इन सब्जियों की डेयरी सेक्टर से भी तुलना की गई है. इसके अनुसार, दूध उत्पादकों को उनके उत्पाद की कीमत का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा मिलता है. जबकि टमाटर, प्याज और आलू में किसान को सिर्फ एक-तिहाई हिस्सा ही मिल पाता है. रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी बड़ी वजह इन सब्जियों की सप्लाई चेन में जरूरत से ज्यादा बिचौलियों का होना है.
टमाटर, प्याज और आलू की महंगाई का सीधा असर आम आदमी के बजट पर पड़ता है. इन तीनों सब्जियों का देश की कुल महंगाई में हिस्सा भले ही सिर्फ 2.2 प्रतिशत हो, लेकिन कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव के चलते इनका असर कहीं ज्यादा बड़ा दिखाई देता है. दूसरी तरफ, किसान को वाजिब दाम नहीं मिलने से वह भी घाटे में रहता है.
RBI की रिपोर्ट में किसानों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं. इनमें प्राइवेट मंडियां बढ़ाने, e-NAM जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का ज्यादा इस्तेमाल, किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को मजबूत करना और कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट बढ़ाना शामिल है. रिपोर्ट के अनुसार, इन कदमों से सप्लाई चेन के बीच का फासला कम होगा और किसान को उसकी मेहनत का बेहतर दाम मिल सकेगा.
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