दाल बाजार संभालने के लिए सरकार का डबल फॉर्मूला, RBI की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा!

दाल बाजार संभालने के लिए सरकार का डबल फॉर्मूला, RBI की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा!

देश में दालों का उत्पादन मांग के मुकाबले कम होने पर केंद्र सरकार आयात-निर्यात नीति में बदलाव कर बाजार में आपूर्ति बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है. किसानों को उचित दाम मिलने के साथ आम उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ कम रहे, इसके लिए सरकार समय-समय पर आयात शुल्क, आयात कोटा, न्यूनतम आयात मूल्य और निर्यात प्रतिबंध जैसे उपायों का इस्तेमाल करती रही है.

Advertisement
दाल बाजार संभालने के लिए सरकार का डबल फॉर्मूला, RBI की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा!दालों की कमी से निपटने को सरकार का बड़ा प्लान

देश में दालों की बढ़ती मांग और घरेलू उत्पादन में कमी के बीच केंद्र सरकार लगातार ऐसी नीतियां अपना रही है, जिससे एक ओर किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले और दूसरी ओर उपभोक्ताओं को दालों की कीमतों में अधिक बढ़ोतरी का सामना न करना पड़े. इसके लिए सरकार आयात-निर्यात से जुड़े अलग-अलग नियमों शुल्कों में समय-समय पर बदलाव करती रही है.

हाल में जारी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की एक रिपोर्ट बताती है, सरकार दालों की उपलब्धता बढ़ाने और महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए पांच प्रमुख व्यापारिक उपायों का इस्तेमाल करती है. इनमें आयात शुल्क (कस्टम ड्यूटी), न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी), आयात कोटा, आयात प्रतिबंध और निर्यात नियंत्रण शामिल हैं.

दालों पर आयात शुल्क का लेखा-जोखा

साल 2017 से पहले तक अधिकांश दालों के आयात पर कोई शुल्क नहीं लिया जाता था. वहीं, साल 2015 तक दालों के निर्यात पर भी अलग-अलग प्रकार की पाबंदियां लागू थीं. लेकिन किसानों के हितों की रक्षा और आयात पर बहुत अधिक निर्भरता कम करने के मकसद से सरकार ने साल 2017 से आयात शुल्क बढ़ाना शुरू किया.

जुलाई 2017 में अरहर (तूर) दाल पर पहली बार 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया गया. इसके बाद दिसंबर 2017 में मटर पर 50 प्रतिशत और मसूर और चना पर 30 प्रतिशत आयात शुल्क लागू किया गया. हालांकि मूंग और उड़द दाल पर पिछले एक दशक के दौरान आयात शुल्क शून्य ही रखा गया.

सरकार ने मार्च 2018 में चने पर आयात शुल्क बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दिया. इसके कुछ महीनों बाद जुलाई 2018 में इसे बढ़ाकर 70 प्रतिशत तक पहुंचा दिया गया. इसी दौरान सरकार ने काबुली चना और देसी चना के लिए अलग-अलग शुल्क व्यवस्था लागू की. काबुली चना पर 40 प्रतिशत और देसी चना (बंगाल ग्राम) पर 60 प्रतिशत आयात शुल्क निर्धारित किया गया.

छोटे देशों से दालों का आयात

हालांकि भारत ने कुछ कम विकसित देशों (एलडीसी) से आने वाली दालों को राहत भी दी है. म्यांमार, मोजाम्बिक, तंजानिया, सूडान और मलावी जैसे देशों से आयात होने वाली दालों पर भारत शून्य शुल्क की सुविधा देता है. इससे जरूरत पड़ने पर कम लागत में दालों का आयात संभव हो पाता है.

समय के साथ घरेलू बाजार की जरूरतों को देखते हुए सरकार ने कई दालों पर शुल्क में कमी भी की. उदाहरण के लिए, तूर दाल पर पहले 10 प्रतिशत आयात शुल्क और सालाना चार लाख मीट्रिक टन का आयात कोटा लागू था. लेकिन घरेलू कमी को देखते हुए मार्च 2023 में तूर दाल के आयात पर शुल्क पूरी तरह समाप्त कर दिया गया. इसके साथ ही तूर दाल के मुक्त आयात की अनुमति मार्च 2025 तक बढ़ा दी गई.

इसी तरह जून 2018 में काबुली चना और देसी चना पर लागू 70 प्रतिशत आयात शुल्क को चरणबद्ध तरीके से घटाकर फरवरी 2021 में 10 प्रतिशत कर दिया गया. इसका मकसद घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाना और कीमतों को नियंत्रित रखना था.

दाम कम रखने में AIDC का रोल

फरवरी 2021 से सरकार ने कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर (AIDC) भी लागू किया. इसके तहत मटर पर 40 प्रतिशत, काबुली चना पर 30 प्रतिशत, देसी चना पर 30 प्रतिशत और मसूर पर 10 प्रतिशत सेस (उपकर) लगाया गया. सरकार का मानना है कि इससे कृषि क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाए जा सकते हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि दालों के बाजार में संतुलन बनाए रखने के लिए सरकार को आयात और घरेलू उत्पादन दोनों पर समान रूप से ध्यान देना होगा. जब घरेलू उत्पादन कम होता है तो आयात में राहत देकर कीमतों को नियंत्रित किया जाता है, जबकि उत्पादन बढ़ने पर किसानों को नुकसान से बचाने के लिए आयात शुल्क बढ़ाया जाता है. यही कारण है कि पिछले कुछ साल में दालों की व्यापार नीति में कई बार बदलाव देखने को मिला है.

POST A COMMENT