दालों का रकबा बढ़ाओ, उत्पादन बढ़ाओ... लेकिन किसान की कमाई कौन बढ़ाएगा? नीति आयोग से बड़ा सवाल

दालों का रकबा बढ़ाओ, उत्पादन बढ़ाओ... लेकिन किसान की कमाई कौन बढ़ाएगा? नीति आयोग से बड़ा सवाल

भारत दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है, लेकिन किसानों की कमाई का सवाल अब भी बड़ा है. उत्पादन बढ़ने पर कई बार दालों के भाव एमएसपी से नीचे चले जाते हैं, जबकि कमी होने पर आयात बढ़ जाता है. नीति आयोग की रिपोर्ट के सुझावों के बीच सवाल है कि रकबा बढ़ाने के साथ किसान की आय और फसल के दाम कैसे बढ़ेंगे.

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दालों का रकबा बढ़ाओ, उत्पादन बढ़ाओ... लेकिन किसान की कमाई कौन बढ़ाएगा? नीति आयोग से बड़ा सवालदालों में आत्मनिर्भरता का सपना

भारत में किसान से कहा जाता है कि दालों की खेती बढ़ाइए, उत्पादन बढ़ाइए और देश को दालों में आत्मनिर्भर बनाइए. लेकिन सवाल यह है कि अगर किसान उत्पादन बढ़ा भी दे तो उसकी कमाई कितनी बढ़ेगी? क्योंकि जमीनी हकीकत कई बार इसके ठीक उलट दिखाई देती है. किसान जब कम उत्पादन करता है तो बाजार में दालों की कमी के कारण कीमत बढ़ जाती है, लेकिन जैसे ही किसान ज्यादा उत्पादन करता है, मंडी में कीमत गिरने लगती है. ऐसे में किसान आखिर दाल की खेती क्यों बढ़ाए?

यही सवाल नीति आयोग की दालों पर आई रिपोर्ट को पढ़ते हुए सबसे ज्यादा परेशान करता है. रिपोर्ट में दालों का रकबा बढ़ाने, धान की कटाई के बाद खाली रहने वाली जमीन पर दालें उगाने, बेहतर बीज देने, तकनीक अपनाने और उत्पादकता बढ़ाने की बात विस्तार से की गई है. लेकिन किसान की कमाई कैसे बढ़ेगी और उसे उसकी फसल का लाभकारी दाम कैसे मिलेगा, इस सवाल को उतनी मजबूती से क्यों नहीं उठाया गया?

ज्यादा उत्पादन, लेकिन कम कीमत- किसानों के लिए यह कैसा गणित?

किसान के लिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वह एक हेक्टेयर में कितनी दाल पैदा कर सकता है. असली सवाल यह है कि एक हेक्टेयर से उसे कितनी कमाई होगी. अगर नई तकनीक अपनाकर किसान ने उत्पादन बढ़ा लिया और बाजार में उसी समय दालों की सप्लाई बढ़ गई, तो कीमत गिर सकती है. किसान की लागत बढ़ी, मेहनत बढ़ी, उत्पादन बढ़ा, लेकिन कमाई घट गई. दूसरी तरफ अगर उत्पादन कम हुआ तो बाजार में कीमत बढ़ती है और सरकार महंगाई रोकने के लिए आयात खोल देती है. इससे घरेलू बाजार में फिर कीमतों पर दबाव आता है. यानी किसान के सामने दोहरी मार है- कम उत्पादन करे तो देश आयात करता है और ज्यादा उत्पादन करे तो कीमत गिरने का डर रहता है.

पिछले दो साल के दाम इस सवाल को और गंभीर बनाते हैं

दालों के बाजार में यह विरोध साफ दिखाई देता है. सरकार ने 2024-25 के लिए अरहर का एमएसपी 7,550 रुपये, उड़द का 7,400 रुपये, चना का 5,650 रुपये और मसूर का 6,700 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था. लेकिन 2025 में औसत मंडी भाव के आंकड़ों में अरहर करीब 6,867 रुपये और उड़द करीब 6,591 रुपये प्रति क्विंटल रहा. यानी दोनों फसलों के औसत भाव एमएसपी से नीचे चले गए. चना करीब 5,635 रुपये और मसूर करीब 6,389 रुपये प्रति क्विंटल रहा.

यहां सवाल सिर्फ एमएसपी का नहीं है. सवाल यह है कि जब सरकार किसान को दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है, तो क्या उसके पास यह सुनिश्चित करने की भी ठोस व्यवस्था है कि बढ़े हुए उत्पादन का दाम किसान को मिलेगा?

नीति आयोग का फोकस उत्पादन पर, किसान का सवाल कमाई पर

नीति आयोग की रिपोर्ट में दालों की पैदावार बढ़ाने के लिए कई जरूरी सुझाव दिए गए हैं. रिपोर्ट हॉरिजॉन्टल विस्तार के तहत दालों का रकबा बढ़ाने और धान की कटाई के बाद खाली रहने वाली जमीन के इस्तेमाल की बात करती है. वहीं वर्टिकल विस्तार के तहत बेहतर बीज, वैज्ञानिक बुवाई, बीज उपचार, सिंचाई, पोषण और कीट प्रबंधन के जरिए प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाने पर जोर है. लेकिन यहां नीति बनाने वालों से एक सीधा सवाल पूछा जाना चाहिए- अगर किसान की आय नहीं बढ़ी तो सिर्फ उत्पादन बढ़ाने का फायदा किसे होगा?

देश में दालों का उत्पादन बढ़ेगा, उपभोक्ताओं को दाल उपलब्ध होगी और आयात कम होगा- यह अच्छी बात है. लेकिन इस पूरी व्यवस्था की पहली कड़ी किसान है. अगर उसे बार-बार कम कीमत मिलती रही तो वह अगली बार दाल की खेती का रकबा क्यों बढ़ाएगा?

आत्मनिर्भरता सिर्फ दाल में हो या किसान की आमदनी में भी?

भारत दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता देश है. 2015-16 में दालों का उत्पादन करीब 16.35 मिलियन टन था, जो 2022-23 में बढ़कर 26.06 मिलियन टन हो गया. यह करीब 59 फीसदी की बड़ी बढ़ोतरी है. इसके साथ आयात पर निर्भरता भी कम हुई. लेकिन उत्पादन बढ़ने के बावजूद आयात पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. 2024-25 में भारत ने करीब 7.3 मिलियन टन दालों का आयात किया. यानी दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और उपभोक्ता देश आज भी बड़ी मात्रा में दालों के लिए विदेशी बाजार पर निर्भर है.

यहीं से नीति का सबसे बड़ा सवाल निकलता है- जब हम आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ रहे हैं, तो क्या हमारी आयात नीति घरेलू किसान के हित को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है?

उत्पादन बढ़ा तो कीमत गिरी
उत्पादन बढ़ा तो कीमत गिरी

आयात खुलेगा तो किसान के भाव का क्या होगा?

जब घरेलू बाजार में दाल महंगी होती है तो सरकार के सामने उपभोक्ताओं को राहत देने का दबाव रहता है. ऐसे में आयात को आसान किया जाता है. इससे बाजार में दाल की उपलब्धता बढ़ती है और कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है. लेकिन यही आयात तब किसान के लिए परेशानी बन सकता है, जब उसकी नई फसल मंडी में आ रही हो. सस्ती आयातित दाल घरेलू बाजार में कीमत पर दबाव डालती है और किसान को एमएसपी से नीचे भी फसल बेचनी पड़ सकती है.

इसलिए दालों की आत्मनिर्भरता की नीति में उत्पादन नीति और आयात नीति को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता. दोनों का सीधा असर किसान की आय पर पड़ता है.

किसान को सिर्फ ज्यादा उगाने नहीं, ज्यादा कमाने का रास्ता भी बताइए

नीति आयोग ने 2030 तक घरेलू दालों की आपूर्ति 30.59 मिलियन टन और 2047 तक 45.79 मिलियन टन पहुंचने का अनुमान लगाया है. बेहतर रणनीतियों के इस्तेमाल से यह आपूर्ति 2030 तक 48.44 मिलियन टन और 2047 तक 63.64 मिलियन टन तक पहुंच सकती है. ये लक्ष्य निश्चित तौर पर बड़े हैं. लेकिन इनके साथ एक और लक्ष्य होना चाहिए- दाल उगाने वाले किसान की प्रति एकड़ आय कितनी बढ़ेगी?

अगर रिपोर्ट में यह बताया जाता है कि कितने हेक्टेयर में दाल की खेती बढ़ानी है, कितने जिलों में उत्पादन बढ़ाना है और कितनी अतिरिक्त दाल पैदा करनी है, तो यह भी साफ होना चाहिए कि किसान को उसकी फसल का न्यूनतम लाभकारी दाम कैसे मिलेगा. क्योंकि किसान सिर्फ आंकड़ा नहीं है. वह इस पूरी आत्मनिर्भरता की नींव है.

दालों में भारत को आत्मनिर्भर बनाना है तो सिर्फ खेत का रकबा बढ़ाने से काम नहीं चलेगा. किसान की कमाई बढ़ानी होगी, सरकारी खरीद मजबूत करनी होगी और आयात नीति को इस तरह बनाना होगा कि महंगाई रोकने के साथ घरेलू किसान के हित की भी रक्षा हो.

वरना खतरा यही है कि देश दालों में आत्मनिर्भर तो हो जाए, लेकिन दाल उगाने वाला किसान अपनी ही फसल के दाम के लिए आत्मनिर्भर न हो पाए.

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