गोबर-पराली से ऊर्जा क्रांतिबदलते वक्त के साथ हालात तेजी से बदल रहे हैं.जिस पराली का सही इस्तेमाल न होने की वजह से कभी देश में प्रदूषण की आफत खड़ी होती थी, आज वही पराली भारत को आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर रही हैयपहले मजबूरी में किसान खेतों में पराली जलाते थे, जिससे अक्टूबर से जनवरी तक उन्हें प्रदूषण के लिए कोसा जाता था. खुले में पड़ा गोबर ज़हरीली मीथेन छोड़ता था और पराली का धुआं लोगों का दम घोंटता था.लेकिन अब तस्वीर बदल रही है.राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के मुताबिक, देश में मवेशियों से हर साल 165 करोड़ टन गोबर मिलता है, वहीं सालाना 68.6 करोड़ टन फसल अवशेष का कचरा निकलता है. इसमें से पराली, गन्ने की खोई और भूसे जैसी 23.4 करोड़ टन चीज़ें बिना इस्तेमाल के बच जाती हैं.
देश भर में लग रहे कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट इस कचरे का सबसे मुकम्मल समाधान बन रहे हैं.इस वेस्ट को प्रोसेस करके हर साल करीब 2 करोड टन ताकतवर सीबीजी गैस बनाई जा सकती है, जो सीएनजी के बिल्कुल बराबर है. अगर देश के पूरे कृषि और डेयरी वेस्ट को सीबीजी के रूप में प्रोसेस कर लिया जाए, तो इससे देश के करीब 1 लाख करोड़ रुपये बच सकते हैं।वाक़ई, यह 'कचरे को कंचन' में बदलने का एक शानदार सफर होगा.
चलिए इस प्रोसेस का गणित बड़ी आसानी से समझते हैं. जब कोई 1 टन एक कचरे को सीबीजी प्लांट में प्रोसेस करता है, तो करीब 40 से 60 क्यूबिक मीटर कच्ची बायोगैस तैयार होती है. साफ़ और कम्प्रेस करने पर 50 से 55 किलो एकदम शुद्ध सीबीजी गैस मिलती है. गन्ने की मैली प्रेसमड ,से गैस ज़्यादा बनती है, जबकि गोबर से गैस थोड़ी कम बनती है, लेकिन यह साल भर आसानी से उपलब्ध रहता है. इस प्रक्रिया की सबसे बेहतरीन बात यह है कि गैस निकालने के बाद बचा मलबा बेकार नहीं जाता.
एक टन कचरे से सिर्फ 50 किलो गैस ही नहीं, बल्कि 250 से 300 किलो तक बेहतरीन नेचुरल खाद भी तैयार होती है. आजकल बहुत सी कंपनियाँ इसमें ज़रूरी पोषक तत्व मिलाकर इसे बेहतरीन खाद बना रही हैं. यह नेचुरल खाद खेतों के लिए किसी खाद से कम नहीं है, जिसे किसान बड़ी आसानी से अपनी फसलों में इस्तेमाल कर सकते हैं.
आज देश की कड़वी सच्चाई यह है कि 50% नेचुरल गैस विदेशों से आयात करता है, जिस पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं. सरकार की 'SATAT' योजना का मकसद 5,000 सीबीजी प्लांट लगाना है, जो सालाना 1.5 करोड़ मीट्रिक टन गैस पैदा करेंगे. फिलहाल भारत में सीएनजी की खपत 4.4 करोड़ और एलपीजी की 3.13 करोड़ टन सालाना है.अगर ये 5,000 प्लांट चालू हो जाएं, तो मुल्क की 40% सीएनजी की भारी जरूरत हमारे अपने कचरे से ही पूरी हो जाएगी.
इससे बाहर से मंगाए जाने वाले एलपीजी और डीज़ल पर हमारी निर्भरता बेहद कम होगी, और गाड़ियों से लेकर कारखानों तक स्वदेशी सीबीजी इस्तेमाल होगी. अगर हम मुल्क की 40% प्राकृतिक गैस को सीबीजी से बदल दें, तो विदेशी मुद्रा भंडार का हर साल 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बचेगा. यह पैसा भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ही घूमेगा, नई नौकरियां पैदा होंगी और किसान गर्व से अन्नदाता के साथ-साथ 'ऊर्जादाता' भी कहलाएगा.
सीबीजी प्लांट सिर्फ गैस नहीं देते, बल्कि बाज़ार की अनिश्चितता से बचाकर पक्की कमाई भी कराते हैं. SATAT योजना के तहत IOCL और BPCL जैसी कंपनियां58 से 65 रुपये प्रति किलो के तय रेट पर गैस खरीदती हैं. सीधे कारखानों को बेचने पर 70 से 85 रुपये तक का तगड़ा मुनाफा मिल जाता है. इस पक्की आमदनी से बैंकों को पूराभरोसा हो जाता है और वो आसानी से लोन देते हैं. दूसरी तरफ, प्लांट से निकलने वाली खाद खेतों के लिए एक बड़ी फायदेमंद है है.
विशेषज्ञो के अनुसार आज पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी की ज़मीन यूरिया और डीएपी के बेतहाशा इस्तेमाल से बीमार हो चुकी है. मिट्टी में 'ऑर्गेनिक कार्बन' जो 1% होना चाहिए, वो गिरकर 0.3% से भी नीचे आ गया है. लिक्विड बायो-स्लरी और ठोस नेचुरल खाद है. यह खाद डालने पर मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन तेज़ी से बढ़ता है, केंचुए लौट आते हैं और नमी सोखने की ताकत बढ़ जाती है, जिससे बीमार ज़मीन फिर से उपजाऊ बन जाती है.
पर्यावरण की हिफाजत के लिए सीबीजी किसी जादू से कम नहीं. जब गोबर खुले में सड़ता है, तो 'मीथेन' गैस छोड़ता है, जो ग्लोबल वार्मिंग में कार्बन डाइऑक्साइड से 25 गुना ज्यादा खतरनाक है. पराली जलाने से भारी मात्रा में दमघोंटू धुआं और कार्बन डाइऑक्साइड हवा में घुलते हैं. सीबीजी प्लांट इन दोनों परेशानियों का सही इलाज है. मीथेन को हवा में उड़ने से पहले टैंकों में कैद करके शानदार ईंधन बना दिया जाता है. एक 5 टन वाला प्लांट हर साल हजारों टन जहरीली गैसों को हवा में रोकता है. इसी वजह से इन प्लांट्स को 'कार्बन क्रेडिट' का शानदार फायदा मिलता है.
मध्यम स्तर का प्लांट सिर्फ कार्बन क्रेडिट बेचकर सालाना 15 से 35 लाख रुपये एक्स्ट्रा कमा लेता है. सरकार इस आने वाले वक्त को समझती है, इसीलिए गोबर्धन और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय और बायोमास एकत्रीकरण मशीनरी योजना स्कीम में भारी सब्सिडी उपलब्ध है. रिज़र्व बैंक ने 50 करोड़ तक के लोन को 'प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग' में डाल दिया है और हाल ही में एसएएससीआई (SASCI) योजना के तहत 3,000 करोड़ रुपये का फंड भी जारी किया गया है.
जमीनी हकीकत की बात करें तो, सरकार का मकसद मुल्क भर में 5,000 सीबीजी प्लांट लगाने का है. लेकिन 2025 तक देश में बमुश्किल 170 प्लांट ही चालू हो पाए हैं.हालांकि 1,300 प्लांट पाइपलाइन में हैं, फिर भी 5,000 का बड़ा टारगेट हासिल करने के लिए फौरन 4,800 नए प्लांट्स की सख्त दरकार है. भारत की भौगोलिक स्थिति में बेशुमार मौके हैं. यूपी और महाराष्ट्र में गन्ने की मैली से बेहतरीन सीबीजी बन सकती है. पंजाब और हरियाणा में धान की पराली उम्दा कच्चा माल है, जबकि गुजरात और राजस्थान में गोबर की अपार संभावनाएं हैं. जो प्लांट आज नहीं लगा, वह खेतों में सड़ता कचरा और सरकार से न ली गई सब्सिडी का सीधा नुकसान है.
कुल मिलाकर यह किसानों और देश के लिए एकदम 'विन-विन' डील है.सीबीजी महज एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक शानदार क्रांति है. जिस दिन 5,000 प्लांट्स का आंकड़ा पूरा होगा, विदेशी आयात का बिल धड़ाम से गिरेगा और किसान सही मायनों में खुशहाल होगा.अब दरकार सिर्फ बाहिम्मत निवेशकों की है जो आगे आएं और कचरे को कंचन में तब्दील कर दें.
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