जून में सूखा, जुलाई में फुल-टू बारिश2026 का मॉनसून अब तक खट्टा-मीठा और उतार-चढ़ाव से भरा एक दिलचस्प तजुर्बा रहा है. सच कहें तो इस साल का मौसम किसी सस्पेंस फिल्म से कम नहीं था. जून में बादलों ने ऐसा रुलाया कि किसान आसमान की तरफ टकटकी लगाए बारिश की दुआ मांग रहे थे. मौसम के इस अजीब मिज़ाज ने पूरे देश को उलझन में डाल दिया था. लेकिन, जहां जून की गर्मी ने डराया, वहीं जुलाई की झमाझम बारिश ने बड़ा संकट टाल दिया और सूखती फसलों को नई ज़िंदगी दी. मौसम विभाग का अंदाज़ा है कि अगस्त में भी बादल मेहरबान रहेंगे.
अगर ऐसा ही रहा, तो यह मॉनसून किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगा और हमारी अर्थव्यवस्था को भी मज़बूती मिलेगी. शहर वालों के लिए बारिश का मतलब भले ही ट्रैफिक जाम हो, लेकिन हमारे गांवों के लिए यह किसी अमृत से कम नहीं है. हमारी खेती पूरी तरह इसी कुदरत के करम पर टिकी है.
हर साल मॉनसून हमें सिखाता है कि हम कुदरत के कितने मोहताज हैं. कभी यह खौफ पैदा करता है तो कभी खुशियों की सौगात ले आता है. किसानों की नज़रें अभी भी आसमान पर टिकी हैं, इस उम्मीद के साथ कि आने वाले दिन बेहतर होंगे. अगर बारिश का यह सिलसिला जारी रहा तो महंगाई से भी बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है.
जून के शुरुआती हफ्तों में ऐसा लग रहा था मानो आसमान से पानी नहीं, बल्कि आग बरस रही हो. चिलचिलाती धूप, भयानक उमस और लू के थपेड़ों ने पूरे उत्तर और मध्य भारत में लोगों का जीना मुहाल कर दिया था. बादलों ने अपनी बारिश का खज़ाना पूरी तरह से बंद कर रखा था.
खेतों की उपजाऊ ज़मीन प्यासी रह गई थी, दरारें पड़ गई थीं और किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें साफ़ देखी जा सकती थीं. जून में जहाँ बारिश की भयंकर किल्लत ने पूरे देश को मायूस कर दिया था, वहीं जुलाई में बादलों ने ऐसी उदारता दिखाई कि कई इलाकों में आंकड़ा सामान्य से कहीं ज़्यादा निकल गया. जून की डरावनी कमी को जुलाई की झमाझम बारिश ने काफी हद तक पाट दिया है.
जून और जुलाई की राष्ट्रीय बारिश की बात करें, तो तस्वीर काफी साफ हो जाती है.IMD के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, भारत में जून के महीने में औसतन 165.4 मिलीमीट सामान्य बारिश दर्ज की जाती है, जिसे खेती के शुरुआती चरण के लिए बहुत ज़रूरी माना जाता है.
लेकिन, जून 2026 में मानसून की भारी सुस्ती के कारण देश भर में केवल 103 मिमी बारिश ही दर्ज हो सकी यह सामान्य के मुकाबले पूरे 39 प्रतिशत की भयानक कमी थी, जिसने सूखे का बड़ा अलर्ट जारी कर दिया था. इस कमी ने देश की अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी बजा दी थी.किसानों को लगने लगा था कि उनकी सारी मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी.
इसके विपरीत, जुलाई महीने में पूरे देश के लिए सामान्य बारिश का मानक 280.5 मिमी तय माना जाता है.जुलाई 2026 में मौसम ने ऐसी ज़बरदस्त वापसी की कि 29 जुलाई तक ही औसतन 263 मिमी भारी बारिश दर्ज हो चुकी है. इसका सीधा मतलब है कि 29 जुलाई तक देश ने जुलाई के कुल सामान्य बारिश के कोटे का लगभग 94% हिस्सा कवर कर लिया है.
30 और 31 जुलाई के आंकड़े आना बाकी हैं, जिससे उम्मीद है कि यह आंकड़ा जुलाई के मानक को पूरी तरह पार कर लेगा. जून और जुलाई के आंकड़ों को मिलाकर देखें, तो देश में अब तक कुल 366 मिमी बारिश हो चुकी है. इस रिकवरी की बदौलत राष्ट्रीय स्तर पर मानसूनी घाटा घटकर महज़ 15 फीसदी रह गया है.
मानसून की शुरुआती सुस्ती के कारण इस साल खरीफ फसलों की बुआई काफी धीमी और पिछड़ी हुईथी. किसानों ने बीज तो खरीद लिए थे, लेकिन ज़मीन में नमी न होने से बुआई नहीं कर पा रहे थे. 29 जून 2026 तक पूरे देश में केवल 182.72 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हो पाई थी, जबकि 2025 में इसी तारीख तक 236.46 लाख हेक्टेयर पर बुआई पूरी हो चुकी थी.
यानी जून के आखिर तक बुआई 53.74 लाख हेक्टेयर लगभग 22.7% पीछे चल रही थी,जो खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा था. हालांकि, जुलाई के दूसरे और तीसरे हफ्ते में हुई लगातार बारिश ने खेतों की प्यास बुझाई और बुआई की रफ्तार को अचानक टॉप गियर में डाल दिया.यह बारिश किसानों के लिए वरदान साबित हुई.
कृषि मंत्रालय द्वारा 24 जुलाई 2026 तक जारी आंकड़ों के अनुसार, देश भर में खरीफ फसलों का कुल रकबा सुधरकर 787.37 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है. यह पिछले साल के 826.19 लाख हेक्टेयर के मुकाबले अब महज़ 38.82 लाख हेक्टेयर यानी सिर्फ 4.7% ही कम रह गया है. सबसे बड़ी राहत धान की रोपाई को लेकर आई है.
पिछले साल 24 जुलाई तक 240.62 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस बार 234.43 लाख हेक्टेयर में धान बोया जा चुका है. पानी से लबालब भरे खेत अब फिर से हरे-भरे होने लगे हैं, और किसानों की आंखों में अच्छी पैदावार की उम्मीद जाग उठी है. सोयाबीन, उड़द, मूंग और कपास की बुआई भी अब तेजी से जोर पकड़ रही है
सिर्फ जून महीने के आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में हालात काफी चिंताजनक थे. जून के शुरुआती और अंतिम हफ्तों में कई बड़े राज्य गंभीर सूखे की चपेट में थे. जून के चौथे सप्ताह में छत्तीसगढ़ में 67% और पूर्वी मध्य प्रदेश में 79% की भारी कमी दर्ज की गई थी.
उत्तर प्रदेश का हाल भी बेहद खराब था; जून के चौथे सप्ताह में पूर्वी यूपी में 90% और जून के दूसरे व चौथे सप्ताह में पश्चिमी यूपी में क्रमश 83% और -93% की भारी कमी देखी गई। पंजाब में जून के दूसरे सप्ताह में 67% व चौथे सप्ताह में 73% और बिहार में 78% बारिश कम हुई थी.
लेकिन जुलाई का महीना नई उम्मीद लेकर आया, जिसने सूखे के डर को दूर कर दिया. जिन इलाकों में बारिश की बूंद के लिए तरसना पड़ रहा था,वहां बादलों ने झमाझम बारिश कर रिकॉर्ड कायम कर दिए। साप्ताहिक आंकड़े गवाह हैं कि 8 जुलाई वाले हफ्ते में छत्तीसगढ़ में सामान्य से 109% अधिक बारिश दर्ज हुई.
उसी दौरान मध्य महाराष्ट्र में 266%, गुजरात रीजन में 156% और कोंकण व गोवा में 105% का भारी इजाफा दर्ज किया गया जुलाई के आखिर यानी 29 जुलाई वाले हफ्ते तक भी यह तेजी बनी रही सौराष्ट्र एवं कच्छ में 138% और गुजरात रीजन में 105% ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की गई. इन इलाकों में अब जलभराव की स्थितियां भी देखने को मिल रही हैं, लेकिन यह अमृत समान है.
जून और जुलाई की कुल बारिश का हिसाब लगाने पर तस्वीर साफ होती है कि राज्यों ने किस शानदार तरीके से रिकवरी की है. 29 जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार,ओडिशा पूरे देश में सबसे मज़बूत स्थिति में है, जहाँ कुल बारिश सामान्य से पूरे 35% ज़्यादा दर्ज की गई है.
जुलाई की इस मेहरबानी से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने भी अपने जून के घाटे को कम कर लिया है. 29 जुलाई तक छत्तीसगढ़ में कुल कमी सिमटकर 11% रह गई, जबकि पश्चिमी मध्य प्रदेश में 12% और पूर्वी मध्य प्रदेश में 16% कमी बची है.पश्चिमी उत्तर प्रदेश भी रिकवर होकर अब महज़ 12% के कुल घाटे पर आ चुका है. यह रिकवरी अनाज उत्पादन में भारी उछाल लाएगी.
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