1 लीटर पेट्रोल, 2 किलो से ज़्यादा ज़हर!गाड़ी का इंजन चाहे कितना भी कीमती हो, लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि हमारे 'शरीर का इंजन' दुरुस्त रहना चाहिए. अपने आस-पास देखें तो गाड़ियां अब जरूरत से ज्यादा स्टेटस सिंबल और दिखावे का जरिया बन चुकी हैं. चार से छह सीटों वाली बड़ी-बड़ी लग्जरी गाड़ियों में अक्सर अकेला व्यक्ति ही सफर करता नजर आता है. बंद शीशों और फुल एसी की सहूलियत के बीच, बाहर साइलेंसर से जहरीला धुआं लगातार हवा में घुल रहा है. देश में हर साल लगभग 50 अरब लीटर पेट्रोल की खपत केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस भयानक तबाही का सूचक है जो हम खुद अपनी सांसों में घोल रहे हैं. गाड़ी का इंजन बिगड़ने पर गैराज में आसानी से ठीक हो सकता है, लेकिन अगर फेफड़े और दिल रूपी 'शरीर का इंजन' एक बार खराब हो गया, तो अस्पतालों में लाखों-करोड़ों रुपये बहाकर भी उसकी वापसी की कोई गारंटी नहीं है. वक्त रहते अगर हमने अपनी इस जानलेवा जीवनशैली को नहीं बदला, तो आने वाले कल में हमें साफ सांस लेने के लिए भी तरसना पड़ सकता है.
अगर आप विज्ञान के नजरिए से देखेंगे तो यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि शुद्ध पेट्रोल जलकर कितना भारी प्रदूषण पैदा करता है. एक लीटर पेट्रोल का वजन लगभग 740 ग्राम होता है, लेकिन जब यह गाड़ी के इंजन में जलता है, तो इससे लगभग 2.31 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) निकलती है. अब आप सोचेंगे कि 740 ग्राम की चीज जलकर 2.31 किलो कैसे बन गई? इसका जवाब छिपा है रसायन विज्ञान में. दरअसल, ईंधन में मौजूद हल्का कार्बन जब इंजन में जलता है, तो वह हवा में मौजूद ऑक्सीजन के दो भारी परमाणुओं के साथ मिल जाता है और भारी-भरकम ग्रीनहाउस गैस का निर्माण करता है.
अब इस गणित को पूरे देश के पैमाने पर देखिए- हर साल इस्तेमाल होने वाले 50 अरब लीटर पेट्रोल से लगभग 115.5 अरब किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड हमारी हवा में घुल जाती है. यह महज हवा में उड़ता हुआ कोई साधारण धुआं नहीं, बल्कि एक खतरनाक साइलेंट किलर है जो हमारे पर्यावरण को धीरे-धीरे एक जानलेवा गैस चैंबर में तब्दील कर रहा है.
पेट्रोल और डीजल जैसे फॉसिल फ्यूल के जलने से सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड ही नहीं निकलती, बल्कि अनगिनत हानिकारक गैसें और सूक्ष्मकण भी उत्सर्जित होते हैं जो इंसानी शरीर को अंदर से खोखला कर रहे हैं. इनके जलने से निकलने वाले अधजले कार्बन कण सीधे हमारे फेफड़ों की गहराई में जाकर अस्थमा और सांस की गंभीर बीमारियां पैदा करते हैं, जिनका कोई स्थायी इलाज नहीं है. यही नहीं, पेट्रोल में मौजूद बेंजीन और टोल्यूनि जैसे घातक केमिकल्स सीधे तौर पर जानलेवा कैंसर का कारण बनते हैं. इसके साथ ही, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी बेहद जहरीली गैसें हवा में घुलकर उसे हमारे लिए पूरी तरह दमघोंटू बना देती हैं.
जब ये खतरनाक गैसें बारिश के पानी के साथ मिलती हैं, तो एसिड वर्षा का कारण बनती हैं, जो हमारे पेड़-पौधों से लेकर ऐतिहासिक इमारतों तक को बर्बाद कर देती है. ग्लोबल आंकड़े साफ बताते हैं कि दुनिया भर में होने वाली हर पांच में से एक मौत केवल फॉसिल फ्यूल के प्रदूषण की वजह से होती है. साफ है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ वातावरण नहीं, बल्कि सिर्फ भयंकर बीमारियां और जहरीला पानी सौंपकर जा रहे हैं.
जब भी वायु प्रदूषण की बात आती है, तो सबसे आसान शिकार हमेशा हमारे किसान ही बनते हैं. दिल्ली और उत्तर भारत में धुंध बढ़ते ही सारा दोष पराली पर मढ़ दिया जाता है. इसके लिए सख्त कानून बने, भारी जुर्माने लगे और किसानों को सबसे बड़ा 'विलेन' बना दिया गया. लेकिन पर्यावरण के हालिया आंकड़ों ने आंखें खोलने वाली सच्चाई उजागर की है- तमाम आर्थिक नुकसान सहकर और नए तरीके अपनाकर किसानों ने पराली पर काफी हद तक अंकुश लगा लिया है. आज कुल प्रदूषण में पराली का योगदान मात्र 6 से 7 प्रतिशत रह गया है, तो फिर बाकी का भयानक प्रदूषण कहां से आ रहा है? यह धुआं आ रहा है उन तथाकथित शिक्षित और शहरी लोगों की महंगी गाड़ियों से, जो खुद एसी में बैठकर किसानों को कोसते हैं.
एक शहरी इंसान बाजार से मामूली सब्जी लाने भी जाता है, तो अपनी बड़ी कार निकालता है. इस तरह की तथाकथित बुद्धिमत्ता का भला क्या फायदा, जब आप खुद ही अपने शहर को एक दमघोंटू गैस चैंबर बना रहे हों? किसानों ने तो अपना फर्ज पूरी ईमानदारी से निभा दिया है, लेकिन शहर के लोग अपनी गाड़ियों के जहरीले धुएं की जिम्मेदारी लेने को आखिर कब तैयार होंगे?
प्रदूषण की इस भयानक तबाही को रोकने के लिए सरकार ने एक बेहद कारगर समाधान निकाला है- पेट्रोल में इथेनॉल की ब्लेंडिंग. अगर देश में इस्तेमाल होने वाले 50 अरब लीटर पेट्रोल में 20 फीसदी लगभग यानी 10 अरब लीटर इथेनॉल मिलाया जाता है, तो इसके नतीजे चमत्कारी हैं. गन्ने और मक्के जैसी फसलों से तैयार यह प्राकृतिक ईंधन शुद्ध पेट्रोल की तुलना में बहुत कम नुकसान पहुंचाता है. केवल 10 अरब लीटर पेट्रोल बचाने से हम हवा में 23.1 अरब किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड का जहरीला धुआं घुलने से रोक सकते हैं, जो सीधे तौर पर हमारे फेफड़ों और 'शरीर के इंजन' को सुरक्षा देगा. पर्यावरण के साथ-साथ यह कदम देश के लगभग 2.20 लाख करोड़ रुपये भी बचाता है, जो विदेशी तेल के आयात पर खर्च होते थे.
बेशक, किसी भी नए नवाचार के साथ शुरुआती दिक्कतें और विरोध लाजिमी हैं, लेकिन सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियां इथेनॉल के हिसाब से गाड़ियों के इंजनों में लगातार तकनीकी सुधार का वादा कर रही हैं. ऐसे में, सिर्फ गाड़ी का इंजन बचाने के नाम पर 'इथेनॉल-फ्री पेट्रोल' के लिए अपनी जेब से ज्यादा पैसे देना और बदले में जानलेवा प्रदूषण खरीदना कोई समझदारी नहीं है. अपने ही पैसे चुकाकर रोज अपनी सांसों में जहर घोलना किसी भी समझदार इंसान के गले से नीचे नहीं उतरता.
अब सही वक्त आ गया है कि हम अपना नजरिया पूरी तरह बदलें और एक जिम्मेदार नागरिक का सकारात्मक परिचय दें. सरकार कह रही है तो इथेनॉल ब्लेंडिंग या ग्रीन एनर्जी के लिए जो सुधार कर रही है, उसे पॉजिटिव नजरिए से देखें. अगर आम लोगों की गाड़ियों से जुड़ी कुछ जायज शिकायतें हैं, तो सरकार को भी उन पर ध्यान देकर उन्हें तुरंत दूर करना चाहिए, लेकिन इथेनॉल ब्लेंडिंग पर थोड़ा सब्र और सहयोग जरूर दिखाना होगा. हमेशा याद रखिए, अगर आपकी महंगी गाड़ी का इंजन कभी खराब भी हुआ, तो कुछ हजार रुपये खर्च करके मैकेनिक उसे नया जैसा बना देगा. लेकिन अगर इस जहरीले धुएं से आपके 'शरीर का इंजन' हमेशा के लिए खराब हो गया, फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया या कैंसर जैसी घातक बीमारी लग गई, तो आप सब कुछ गंवा बैठेंगे. अपनी झूठी शान के लिए अपनों की सांसों का सौदा मत कीजिए.
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