खेत से शुरू होगी मसालों की क्वालिटी की जांच, एथिलीन ऑक्साइड विवाद के बाद कंपनियों ने कसी कमर

खेत से शुरू होगी मसालों की क्वालिटी की जांच, एथिलीन ऑक्साइड विवाद के बाद कंपनियों ने कसी कमर

मसाला उद्योग में खाद्य सुरक्षा का फोकस अब खेती के स्तर तक पहुंच रहा है. ETO जांच को लेकर उठे सवालों के बाद कंपनियां IPM, कीटनाशक नियंत्रण, किसान प्रशिक्षण और ट्रेसबिलिटी पर जोर दे रही हैं.

Advertisement
खेत से शुरू होगी मसालों की क्वालिटी की जांच, एथिलीन ऑक्साइड विवाद के बाद कंपनियों ने कसी कमरखेत से ही मसालाें की क्‍वालिटी पर फोकस करेगी कं‍पनियां (सांकेतिक तस्‍वीर)

भारत के मसाला उद्योग में अब क्‍वालिटी जांच का फोकस निर्यात खेप से आगे बढ़कर खेती के स्तर तक पहुंच रहा है. घरेलू बाजार में संगठित कंपनियां कीटनाशक अवशेष, ट्रेसबिलिटी और खाद्य सुरक्षा को लेकर किसानों से सीधे जुड़ने और सोर्सिंग सिस्टम मजबूत करने पर जोर दे रही हैं. इसका मकसद उत्पाद की क्‍वालिटी के साथ उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ाना है. अप्रैल 2024 में सिंगापुर और हांगकांग में भारतीय ब्रांडेड मसाला उत्पादों को वापस लिए जाने के बाद क्‍वालिटी का मुद्दा ज्यादा प्रमुखता से सामने आया था.

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद स्पाइसेज बोर्ड ने इन दोनों देशों को निर्यात होने वाली हर मसाला खेप की एथिलीन ऑक्साइड यानी ETO जांच अनिवार्य कर दी थी. इस घटनाक्रम ने भारतीय मसाला सप्लाई चेन में ट्रेसबिलिटी और टेस्टिंग व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत बढ़ा दी है.

FY25 में 11.99 मिलियन टन रहा उत्पादन

स्पाइसेज बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में देश में करीब 11.99 मिलियन टन मसालों का उत्पादन हुआ था. इस दौरान मसाला निर्यात 4.52 अरब डॉलर का रहा. हालांकि, वित्त वर्ष 2025-26 में औसत मासिक निर्यात घटकर करीब 414 मिलियन डॉलर रह गया, जो FY25 के 520.54 मिलियन डॉलर के औसत से करीब 20 फीसदी कम है.

2.22 लाख करोड़ रुपये का है घरेलू बाजार

दूसरी ओर, घरेलू मसाला बाजार तेजी से बढ़ रहा है. वर्ष 2025 में बाजार का आकार करीब 2.22 लाख करोड़ रुपये था, जिसके 2034 तक 5.29 लाख करोड़ रुपये पहुंचने का अनुमान है. इस बाजार में करीब 60 फीसदी हिस्सेदारी अभी असंगठित क्षेत्र की है, जबकि राष्ट्रीय ब्रांड 30 फीसदी से कम राजस्व पर काबिज हैं. ऐसे में संगठित कंपनियां गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा को अपनी बाजार रणनीति का अहम हिस्सा बना रही हैं.

कंपनियां किसानों के साथ बढ़ा रहीं सीधा जुड़ाव

मसाला कंपनियों के लिए चुनौती यह है कि खेती के दौरान इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों के अवशेष को केवल प्रोसेसिंग के जरिए नियंत्रित करना हमेशा संभव नहीं होता. इसलिए कंपनियां इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट यानी IPM, नियंत्रित कीटनाशक इस्तेमाल, मिट्टी की जांच और किसान प्रशिक्षण पर जोर दे रही हैं. सीधे किसानों से खरीद और नियमित सैंपल टेस्टिंग को भी सप्लाई चेन का हिस्सा बनाया जा रहा है.

मसाला उद्योग में आगे की प्रतिस्पर्धा सिर्फ उत्पादन और कीमत तक सीमित रहने की संभावना नहीं है. क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म क्षेत्रीय ब्रांडों को बड़े डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में भारी निवेश किए बिना शहरी ग्राहकों तक पहुंच बनाने का रास्ता दे रहे हैं. ऐसे में खेती से लेकर पैकेजिंग और बिक्री तक क्‍वालिटी बनाए रखना आने वाले समय में मसाला कंपनियों के लिए फायदे का सौदा बन सकता है.

POST A COMMENT