भारत में चीनी के दाम में गिरावटवैश्विक बाजार में कच्ची चीनी (Raw Sugar) की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली है. न्यूयॉर्क वायदा बाजार में चीनी के भाव 17 महीने के उच्चतम स्तर से फिसल गए. एक समय कीमतों में लगभग 21 फीसदी की तेजी आई थी, लेकिन अब बाजार का रुख बदलता नजर आ रहा है. 'ब्लूमबर्ग' ने एक रिपोर्ट में जानकारी दी है.
दरअसल, पिछले महीने दुनिया के दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक देश भारत में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई थी. अनुमान लगाया जा रहा था कि भारत को बड़ी मात्रा में चीनी आयात करनी पड़ सकती है. इसी आशंका के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ी थीं.
भारत सरकार ने हाल ही में 10 लाख टन तक कच्ची चीनी के शुल्क मुक्त (ड्यूटी-फ्री) आयात की अनुमति दी थी. इस फैसले से वैश्विक बाजार को लगा कि भारत बड़ी मात्रा में चीनी खरीदेगा, जिससे कीमतों को समर्थन मिला.
लेकिन अब घरेलू बाजार में चीनी के दाम कुछ नरम पड़ने लगे हैं. इसके चलते यह अनुमान कमजोर हुआ है कि भारत को पहले की अपेक्षा उतनी ज्यादा चीनी आयात करनी पड़ेगी. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कीमतों पर दबाव बढ़ गया.
चीनी की उपलब्धता बढ़ाने और जमाखोरी रोकने के लिए भारत सरकार ने इस सप्ताह चीनी के स्टॉक रखने की सीमा (Stock Limit) को और सख्त कर दिया. इसके बाद व्यापारियों और डीलरों के पास जमा चीनी का बड़ा हिस्सा बाजार में आने लगा.
कमोडिटी विशेषज्ञों का कहना है कि इन कदमों से बाजार में आपूर्ति बढ़ी है और दामों पर दबाव बना है. उनका अनुमान है कि भारत को अब करीब 5 से 6 लाख टन चीनी आयात करनी पड़ सकती है, जो पहले लगाए जा रहे अनुमानों से कम है.
हालांकि कीमतों में नरमी आई है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में चीनी की उपलब्धता को लेकर चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं. कई क्षेत्रों में उत्पादन और स्टॉक को लेकर दबाव बना हुआ है. ऐसे में आयात की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, सरकार की नीतियों ने फिलहाल बाजार में उपलब्ध स्टॉक को बाहर निकालने का काम किया है, जिससे कीमतों में कुछ राहत मिली है.
पिछले महीने चीनी की कीमतों में 21 फीसदी से ज्यादा की उछाल दर्ज की गई थी. तकनीकी संकेतकों के अनुसार बाजार 'ओवरबॉट' स्थिति में पहुंच गया था, यानी कीमतें बहुत तेजी से बढ़ी थीं.
ऐसी स्थिति में निवेशकों द्वारा मुनाफावसूली शुरू होने से भी कीमतों में गिरावट देखने को मिली. इसके अलावा, हाल के दिनों में जो शॉर्ट कवरिंग खरीदारी बाजार को ऊपर ले जा रही थी, उसका असर भी अब कम होने लगा है.
दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक ब्राजील में भी हालात बदलते दिख रहे हैं. मौजूदा समय में चीनी उत्पादन, इथेनॉल की तुलना में अधिक लाभकारी हो गया है. ऐसे में कई मिलें गन्ने का ज्यादा हिस्सा इथेनॉल की बजाय चीनी बनाने में लगा सकती हैं.
यदि ऐसा होता है तो वैश्विक बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों पर अतिरिक्त दबाव आ सकता है.
कीमतों में हालिया गिरावट के बावजूद वैश्विक चीनी बाजार को लेकर चिंताएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो (El Niño) का असर एशिया के कई प्रमुख चीनी उत्पादक देशों की फसलों पर पड़ सकता है.
वहीं यूरोप के कई हिस्सों में सूखे की स्थिति बनी हुई है, जिससे चीनी उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है. इसी वजह से आने वाले सीजन में वैश्विक चीनी बाजार में बड़े घाटे (Global Deficit) की संभावना अभी भी बनी हुई है.
कुल मिलाकर, भारत सरकार के हालिया कदमों ने फिलहाल बाजार को राहत दी है और चीनी की कीमतों में नरमी आई है, लेकिन वैश्विक उत्पादन और मौसम से जुड़ी चुनौतियों के कारण आने वाले महीनों में बाजार फिर से उतार-चढ़ाव देख सकता है.
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