
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक खेती और कृषि जैव-विविधता को बड़ी पहचान मिली है. धमतरी जिले के नगरी विकासखंड के ग्राम गुहनानाला के किसान बंसी लाल सोरी द्वारा पीढ़ियों से सहेजे जा रहे स्थानीय ‘चिरपोटी टमाटर’ को अब कानूनी पहचान मिल गई है. इस पारंपरिक टमाटर किस्म का पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण (PPV&FRA) के तहत आधिकारिक पंजीयन किया गया है.
इस उपलब्धि पर कलेक्टर ने किसान बंसी लाल सोरी को शॉल और पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया. यह पंजीयन स्थानीय किस्मों और किसानों द्वारा पीढ़ियों से सहेजे जा रहे पारंपरिक बीजों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है.
‘चिरपोटी टमाटर’ को बचाए रखने की कहानी बंसी लाल सोरी के परिवार से जुड़ी है. उनके स्वर्गीय पिता मंगलू राम सोढ़ी लंबे समय से इस स्थानीय टमाटर के बीजों को सुरक्षित रखते थे और इन्हीं बीजों से खेती करते थे.पिता के निधन के बाद बंसी लाल ने इस जिम्मेदारी को संभाला.उन्होंने न केवल पारंपरिक बीज को सुरक्षित रखा, बल्कि इसकी खेती और संरक्षण का काम भी लगातार जारी रखा.
‘चिरपोटी टमाटर’ के पंजीयन की प्रक्रिया में कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), धमतरी और PPV&FRA प्रभारी का तकनीकी सहयोग मिला. इस किस्म के बारे में जरूरी जानकारी जुटाने, दस्तावेज तैयार करने और पंजीयन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया.इसके लिए 7 सितंबर 2016 को आवेदन किया गया था। करीब आठ साल की प्रक्रिया के बाद 8 जनवरी 2024 को ‘चिरपोटी टमाटर’ का पंजीयन हुआ.
इस पंजीयन को केवल किसी स्थानीय टमाटर किस्म की पहचान के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. यह उन किसानों के पारंपरिक ज्ञान और बीज संरक्षण की मेहनत को भी पहचान देता है, जो वर्षों से स्थानीय फसलों की किस्मों को बचाकर रखते आ रहे हैं.
PPV&FRA के तहत पंजीयन होने से किसान अधिकारों और पारंपरिक किस्मों को प्रोत्साहन देने वाली व्यवस्थाओं के तहत Recognition and Reward जैसी संभावनाओं का रास्ता भी खुलता है.
‘चिरपोटी टमाटर’ के पंजीयन के बाद कृषि विज्ञान केंद्र धमतरी ने जिले के किसानों से अपील की है कि अगर उनके पास भी पीढ़ियों से सुरक्षित कोई स्थानीय, पारंपरिक या खास फसल का बीज मौजूद है, तो उसे सुरक्षित रखें और KVK से संपर्क करें.KVK ऐसे किसानों को बीज की पहचान, दस्तावेजीकरण और कानूनी पंजीयन की प्रक्रिया में जरूरी तकनीकी मार्गदर्शन और सहयोग उपलब्ध कराने में मदद करेगा.
‘चिरपोटी टमाटर’ की कहानी बताती है कि किसान सिर्फ फसल नहीं उगाते, बल्कि वे पीढ़ियों की कृषि विरासत और जैव-विविधता को भी सहेजकर रखते हैं.
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