सूखे और कम बारिश का अचूक इलाज! 'सीड पेलेटाइजेशन’ से 40 दिनों तक पानी की कमी झेल सकेगी फसल

सूखे और कम बारिश का अचूक इलाज! 'सीड पेलेटाइजेशन’ से 40 दिनों तक पानी की कमी झेल सकेगी फसल

अल नीनो के कारण कम बारिश और सूखे की समस्या से निपटने के लिए "सीड पेलेटाइजेशन" एक प्रभावी और प्राकृतिक तकनीक के रूप में उभरकर सामने आई है. इस विधि में बीजों को बायोफर्टिलाइजर, मिट्टी और अन्य प्राकृतिक पदार्थों से कोटिंग करके तैयार किया जाता है, जिससे उनकी अंकुरण क्षमता और पानी की कमी सहने की शक्ति बढ़ जाती है. इस तकनीक से तैयार बीज 25 से 40 दिनों तक वॉटर स्ट्रेस झेल सकते हैं और कम बारिश में भी आसानी से अंकुरित हो जाते हैं. यह विधि किसानों के लिए खासतौर पर बारिश पर निर्भर खेती वाले क्षेत्रों में बेहद उपयोगी साबित हो रही है और अरहर समेत कई फसलों के लिए लाभकारी मानी जा रही है.

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'सीड पेलेटाइजेशन’ से 40 दिनों तक पानी की कमी झेल सकेगी फसलसीड पेलेटाइजेशन के फायदे कई

अल नीनो के कारण होने वाली मॉनसूनी देरी और सूखे से फसलों को बचाने के लिए एक नई तकनीक ढूंढी गई है जो पूरी तरह से प्राकृतिक विधि और बायो फर्टिलाइजर पर आधारित है. इसका नाम सीड पेलेटाइजेशन है. इस विधि से तैयार किया पेलेटाइज्ड बीज न सिर्फ पक्षियों और कीड़ों से सुरक्षित रहते हैं, बल्कि इनसे निकलने वाले पौधे 25 से 40 दिनों तक पानी की कमी (Water Stress) को सहन करने में सक्षम होते हैं. अभी इसका प्रयोग अरहर पर किया जा रहा है जो पूरी तरह से सफल है. बाकी फसलों पर भी इसे आजमाया जाएगा.

पेलेटिंग का मतलब है बीज को एक फिलर मटीरियल में लपेटना, जिसमें चिपकाने वाले पदार्थ और बायोएक्टिव केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है. इससे बीज अलग-अलग रहते हैं और उनका आकार बढ़ जाता है, जिससे उन्हें संभालना आसान हो जाता है.

पेलेटाइजेशन का तरीका

  • बीजों को सबसे पहले बीजामृत से उपचारित करें
  • अब बीजों को प्लास्टिक की ट्रे में लें
  • बीजों में थोड़ी मात्रा में एडहेसिव (10% मैदा का घोल) मिलाएं
  • एडहेसिव में मिट्टी, घनजीवामृत पाउडर और लकड़ी का बुरादा भी ले सकते हैं
  • बीजों को धीरे-धीरे हिलाएं ताकि एडहेसिव हर बीज पर समान रूप से फैल जाए
  • बीजों पर समान रूप से फिलर मटीरियल (अरप्पू पत्ती का पाउडर) डालें और तब तक हिलाते रहें जब तक कि उन पर एक जैसी कोटिंग न हो जाए
  • अगर बीज आपस में जुड़े हों, तो उन्हें अलग कर लें
  • छानकर अतिरिक्त फिलर मटीरियल हटा दें
  • नमी निकालने के लिए छाया में सुखाएं

पेलेटाइजेशन के फायदे

छोटे और टेढ़े-मेढ़े आकार के बीजों को आसानी से संभाला जा सकता है
बीजों का आकार और वजन बढ़ने से उनकी सटीक बुआई संभव हो पाती है
बीज की क्वालिटी (फिजियोलॉजिकल क्वालिटी) में सुधार होता है

इस प्राकृतिक विधि का फायदा

'बीजामृतम-उपचारित' बीजों पर चिकनी मिट्टी, घनाजीवामृतम पाउडर और लकड़ी की राख की परतें चढ़ाई जाती हैं, जिससे ऐसे सीड पेलेट्स (बीज की गोलियां) तैयार होते हैं जो सामान्य बीजों से तीन से पांच गुना बड़े होते हैं. जानकारों के मुताबिक, ये पेलेट्स बीजों को पक्षियों और कीड़ों से बचाते हैं और मिट्टी में सिर्फ 10 से 15 मिमी बारिश होने पर भी अंकुरित हो सकते हैं.

ये पेलेट्स कम नमी वाली स्थितियों में छह महीने तक ठीक रह सकते हैं और इनसे निकलने वाले पौधे 25 से 40 दिनों तक पानी की कमी को झेल सकते हैं, जिससे यह तकनीक सूखे की आशंका वाले इलाकों के लिए उपयुक्त हो जाती है.

वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी कि बेहतर अंकुरण और फसल के एक समान विकास के लिए पेलेट्स को 5 सेमी की गहराई पर बोएं. सीड पेलेटाइज़ेशन की वजह से नमी बनाए रखने की बेहतर क्षमता, एक साथ अंकुरण, फसल का जल्दी विकास और सही तरीके से बुवाई जैसे कई फायदे होते हैं. कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि वे मौजूदा कृषि सीजन में अरहर की बुवाई से पहले इस तकनीक को अपनाएं.

अल नीनो का फसलों पर प्रभाव

मौजूदा मौसम और गर्मी को देखते हुए पेलेटाइजेशन की विधि बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. अल नीनो को देखते हुए इसकी मांग और भी ज्यादा होने लगी है. भारत की लगभग आधी खेती वाली जमीन बारिश पर निर्भर है, इसलिए हर साल मॉनसून पर बहुत बारीकी से नजर रखी जाती है. जैसे-जैसे अल-नीनो (El Niño) मजबूत हो रहा है, देश में मॉनसून पर इसके संभावित असर को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुमान बताते हैं कि देश के कई हिस्सों में मॉनसून की बारिश सामान्य से कम हो सकती है.

धान, दाल, तिलहन और खरीफ की कई अन्य फसलों को बुवाई और बढ़ने के समय पर्याप्त बारिश की जरूरत होती है. मॉनसून के देर से आने या लंबे समय तक बारिश न होने से बुवाई के समय पर असर पड़ सकता है, मिट्टी में नमी कम हो सकती है और अंततः फसल की पैदावार घट सकती है. ऐसी रुकावटों से न केवल किसानों की आय पर असर पड़ता है, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था में खाने-पीने की चीजों की कीमतों और ग्रामीण इलाकों में मांग पर भी प्रभाव पड़ता है. 

इसका असर सिर्फ मुख्य फसलों तक ही सीमित नहीं है. अगर बारिश की कमी बनी रहती है, तो बागवानी, गन्ने की खेती, कपास के उत्पादन और सब्जी फसलों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.

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