कैंसर से लड़ने की ताकत रखते हैं छत्तीसगढ़ के ये देसी चावल! जानिए लाईचा, गठुअन, करहनी और महाराजी का बड़ा राज

कैंसर से लड़ने की ताकत रखते हैं छत्तीसगढ़ के ये देसी चावल! जानिए लाईचा, गठुअन, करहनी और महाराजी का बड़ा राज

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक धान किस्में लाईचा, गठुअन, करहनी और महाराजी अपने औषधीय गुणों के कारण चर्चा में हैं.माना जाता है कि ये चावल रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ कैंसर, गठिया और श्वास संबंधी समस्याओं में भी लाभकारी हो सकते हैं.

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कैंसर से लड़ने की ताकत रखते हैं ये देसी चावल! जानें लाईचा, गठुअन, करहनी का बड़ा राज

छत्तीसगढ़ को देश का 'धान का कटोरा' कहा जाता है.यहां सदियों से उगाई जा रही पारंपरिक धान की कई किस्में केवल स्वाद और पोषण के लिए ही नहीं, बल्कि अपने औषधीय गुणों के कारण भी वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं. इनमें लाईचा, गठुअन, करहनी और महाराजी जैसी पारंपरिक किस्में विशेष रूप से चर्चा में हैं.

वैज्ञानिक शोध और पारंपरिक ज्ञान के अनुसार इन चावलों में ऐसे जैव सक्रिय तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ कई गंभीर बीमारियों से लड़ने में सहायक माने जाते हैं.विशेषज्ञों का कहना है कि इन किस्मों पर लगातार शोध किया जा रहा है ताकि इनके औषधीय गुणों का वैज्ञानिक स्तर पर और अधिक प्रमाण जुटाया जा सके.

लाईचा धान: कैंसर कोशिकाओं पर असर की संभावना

पारंपरिक मान्यताओं और प्रारंभिक शोधों के अनुसार लाईचा किस्म के चावल में ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जो कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोकने में सहायक हो सकते हैं.इसके अलावा त्वचा संबंधी समस्याओं में भी इसका उपयोग लाभकारी माना जाता है.

गठुअन: गठिया और वात रोग के लिए प्रसिद्ध

गठुअन धान का नाम ही उसके उपयोग को दर्शाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय से इसे गठिया, जोड़ों के दर्द और वात रोग से राहत देने वाला चावल माना जाता है. कई किसान परिवार आज भी इसे औषधीय आहार के रूप में उपयोग करते हैं.

करहनी: लकवा और श्वास रोग में उपयोगी

करहनी किस्म को लकवा, श्वास संबंधी समस्याओं और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है.पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसका विशेष महत्व बताया जाता है.

महाराजी: बढ़ाए शरीर की ताकत

महाराजी धान शरीर को ऊर्जा और ताकत देने वाली किस्म मानी जाती है. पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ कैंसर कोशिकाओं से लड़ने में भी सहायक हो सकती है.

संरक्षण और शोध की जरूरत

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर की महिला कृषि वैज्ञानिक डॉ मंगला पारीख का मानना है कि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक धान किस्में देश की अमूल्य जैविक धरोहर हैं. इनका संरक्षण, वैज्ञानिक परीक्षण और बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इन दुर्लभ किस्मों का लाभ उठा सकें. यदि इनके औषधीय गुणों की वैज्ञानिक पुष्टि और व्यापक स्तर पर होती है, तो ये किस्में किसानों की आय बढ़ाने के साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में भी नई संभावनाएं खोल सकती हैं.

Disclaimer

इन धान किस्मों के बारे में बताए गए औषधीय लाभ पारंपरिक मान्यताओं और कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों पर आधारित हैं. इन्हें किसी बीमारी के उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए. किसी भी रोग की स्थिति में चिकित्सकीय सलाह आवश्यक है.

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