पेट्रोल में इथेनॉल, CNG में CBGकेन्द्र सरकार ने क्लीन फ्यूल की तरफ एक बहुत बड़ा कदम उठाया है. 1 अप्रैल 2025 से पूरे देश के पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाने की कामयाबी के बाद, सरकार ने एक और बड़ा फैसला लिया है. अब गाड़ियों और घरों में इस्तेमाल होने वाली CNG और PNG गैस में धीरे-धीरे कम्प्रेस्ड बायो-गैस (CBG) मिलाना ज़रूरी कर दिया जाएगा. इस बड़े विज़न को जमीन पर उतारने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार ने 'गोबरधन योजना' के लिए 23,731 करोड़ रुपये मंज़ूर किए हैं. यह योजना 2026-27 से लेकर 2035-36 तक, यानी अगले दस सालों तक चलेगी. इसके तहत खेती से बचे कचरे, जानवरों के गोबर और शहरों के गीले कचरे को साफ ईंधन और प्राकृतिक खाद में बदला जाएगा. इससे देश में बायोगैस का बनना बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगा और 'कचरे से कमाई' के साथ-साथ 'आत्मनिर्भर भारत' का सपना भी सच होगा.
सरकार ने गोबरधन योजना को पूरे मुल्क में तेजी से लागू करने के लिए छह खास इंतजाम किए हैं. इसके तहत सिटी गैस नेटवर्क में सीबीजी मिलाना जरूरी कर दिया गया है, जो 2026-27 के 3% से शुरू होकर आगे चलकर 5% हो जाएगा. प्लांट लगाने वालों को नुकसान से बचाने के लिए अगले 10 साल तक गैस की कीमत 2,110 रुपये प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (MMBTU ) फिक्स कर दी गई है, और नए बायोगैस प्लांट लगाने पर रोज़ाना पैदा होने वाली प्रति टन गैस के हिसाब से 2 करोड़ रुपये तक की सरकारी मदद दी जाएगी.
साथ ही इन प्लांट्स को बड़ी गैस पाइपलाइनों से तेजी से जोड़ने, छोटे कारोबारियों और महिलाओं को आसान और सस्ते लोन देने और जिला स्तर पर कचरा सही से इकट्ठा करने के लिए एक खास 'चैलेंज फंड' बनाने का भी फैसला लिया गया है. सरकार के इन कदमों से कभी प्रदूषण की आफत मानी जाने वाली पराली अब मुल्क की ताकत में बदल जाएगी, जो किसानों के लिए कमाई और खुशहाली का एक बहुत बड़ा ज़रिया साबित होगी.
ईंधन के मामले में यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा बदलाव होगा. जिस पराली को जलाने की वजह से कभी प्रदूषण की आफत खड़ी होती थी और किसानों को कोसा जाता था, आज वही पराली देश के बहुत काम आ रही है वही राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल जानवरों से करीब 165 करोड़ टन गोबर और 68.6 करोड़ टन खेती का कचरा निकलता है. इसमें से 23.4 करोड़ टन पराली और भूसा बिना इस्तेमाल के बेकार चला जाता है. अब इस कचरे से गैस बनेगी, जिससे इस परेशानी का सबसे बेहतरीन हल निकलेगा. इस बदलाव से गाड़ियों और कारखानों का धुआं कम होगा, किसानों की आमदनी बढ़ेगी और विदेशों से महंगी गैस मंगाने का भारी खर्च भी कम होगा.
अगर हम इस पूरी प्रक्रिया को आसान जुबान में समझें, तो जब 1 टन जैविक कचरे को प्रोसेस किया जाता है, तो उससे लगभग 40 से 60 क्यूबिक मीटर कच्ची बायोगैस बनती है. जब इसे साफ और कंप्रेस किया जाता है, तो 50 से 55 किलो एकदम शुद्ध (बायो-सीएनजी) गैस मिलती है.वैसे, गन्ने के कचरे से गैस थोड़ी ज़्यादा बनती है और गोबर से थोड़ी कम। लेकिन गोबर पूरे साल आसानी से मिल जाता है. इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि गैस निकालने के बाद बचा हुआ कचरा भी बेकार नहीं जाता.1 टन कचरे से 250 से 300 किलो तक बहुत ही बेहतर प्राकृतिक खाद भी मिलती है. कंपनियां अब इसमें ज़रूरी चीज़ें मिलाकर इसे और भी फायदेमंद बना रही हैं, ताकि किसान इसे आसानी से अपने खेतों में डाल सकें.
आज हमारे देश के सामने एक बड़ी दिक्कत यह है कि हमें अपनी ज़रूरत की लगभग 50% प्राकृतिक गैस (Natural Gas) विदेशों से बहुत महंगे दामों पर खरीदनी पड़ती है. इसमें हमारे अरबों डॉलर खर्च होते हैं.सरकार की 'सतत' (SATAT) पहल के तहत देशभर में 5,000 सीबीजी प्लांट लगाने का लक्ष्य रखा गया है. इनसे हर साल 1.5 करोड़ टन साफ गैस बनेगी. अभी हमारे देश में सालाना 4.4 करोड़ टन CNG और 3.13 करोड़ टन LPG की खपत होती है. अगर ये 5,000 प्लांट पूरी तरह से चालू हो जाएं, तो हमारी 40% CNG की ज़रूरत इसी कचरे से पूरी हो जाएगी. इससे बाहर से गैस मंगाने की मजबूरी कम होगी और हर साल 1 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की बचत होगी. यह सारा पैसा हमारे अपने देश और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में काम आएगा.
गोबरधन योजना और बजट 2026 की यह नई नीति सिर्फ गैस या ईंधन के लिए नहीं है, बल्कि यह हमारे गांवों की सूरत बदलने का एक बहुत बड़ा ब्लूप्रिंट है. जब विदेशों में जाने वाला 1 लाख करोड़ रुपया हमारे गांवों में ही रहेगा, तो वहां रोज़गार के हज़ारों नए रास्ते खुलेंगे.
इससे किसानों, पशुपालकों, भूसा इकट्ठा करने वाले मज़दूरों और गांव के छोटे कारोबारियों की कमाई में सीधा इज़ाफ़ा होगा. महिलाएं और छोटे कारोबारी आगे आएंगे, जिससे गांवों में छोटे-छोटे ऊर्जा के कारखाने शुरू होंगे. इससे पेट्रोल-डीज़ल का इस्तेमाल कम होगा, हवा में प्रदूषण घटेगा और कचरे का सही तरीके से निपटारा हो सकेगा. कुल मिलाकर, यह कदम हमारे किसान को सिर्फ पेट भरने वाला 'अन्नदाता' ही नहीं, बल्कि देश को ऊर्जा देने वाला एक सच्चा 'ऊर्जादाता' बनाएगा.
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