अल नीनो के साये में 'दलहन मिशन’, कीमतें रोकने के लिए सरकार के पास क्या है प्लान?

अल नीनो के साये में 'दलहन मिशन’, कीमतें रोकने के लिए सरकार के पास क्या है प्लान?

अल नीनो के बढ़ते खतरे ने देश में दालों के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ा दी है. उत्पादन में गिरावट और बढ़ते आयात के बीच सरकार ने 11,440 करोड़ रुपये के दलहन मिशन की शुरुआत की है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौसम प्रतिकूल रहा तो दालों की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार को बफर स्टॉक का सहारा लेना पड़ सकता है.

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अल नीनो के साये में 'दलहन मिशन’, कीमतें रोकने के लिए सरकार के पास क्या है प्लान?खुले बाजार में दालों के दाम बढ़ रहे हैं

देश में दालों के उत्पादन पर एक बार फिर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. मौसम विशेषज्ञों और अलग-अलग पूर्वानुमान मॉडल्स के अनुसार अल नीनो का प्रभाव सितंबर से अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है और इसका असर अगले साल फरवरी-मार्च तक बना रहने की आशंका है. सरकार भी संकेत दे चुकी है कि आने वाले महीनों में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पर्याप्त बारिश नहीं हुई और मिट्टी में नमी की कमी रही तो खरीफ के साथ-साथ रबी फसलों पर भी असर पड़ सकता है. गेहूं, चना और सरसों जैसी फसलों के सामने जोखिम बढ़ेगा, जबकि दलहन और तिलहन फसलें सबसे अधिक प्रभावित हो सकती हैं.

दुनिया में दालों का सबसे बड़ा केंद्र है भारत

दालों के मामले में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक, उपभोक्ता, आयातक और प्रोसेसिंग सेंटर है. देश में दालों की भारी मांग को देखते हुए कई देश विशेष रूप से दलहन उत्पादन करते हैं ताकि वे भारतीय बाजार में अपनी उपज बेच सकें.

यही वजह है कि घरेलू उत्पादन में किसी भी तरह की कमी का असर सीधे कीमतों और आयात पर दिखाई देता है.

आत्मनिर्भरता के लिए शुरू हुआ राष्ट्रीय दलहन मिशन

दलहन उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय दलहन मिशन शुरू किया है. इस मिशन के तहत साल 2030-31 तक देश का दलहन उत्पादन बढ़ाकर 350 लाख टन करने का लक्ष्य रखा गया है. इसके लिए करीब 11,440 करोड़ रुपये निवेश किए जाएंगे.

सरकार का दावा है कि इस योजना से लगभग दो करोड़ किसानों को लाभ मिलेगा. बेहतर बीज, आधुनिक कटाई बाद इंफ्रास्ट्रक्चर और सुनिश्चित खरीद व्यवस्था इसके प्रमुख आधार होंगे.

किसानों को मिलेंगे मुफ्त बीज, बढ़ेगी उत्पादकता

मिशन के तहत किसानों को नई और अधिक उपज देने वाली दलहन किस्मों तक पहुंच उपलब्ध कराने के लिए 88 लाख मुफ्त बीज किट बांटी जाएंगी. सरकार का मानना है कि उन्नत बीजों के उपयोग से प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि होगी और कुल उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी.

इसके अलावा कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए देशभर में 1,000 प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की योजना बनाई गई है. इससे भंडारण, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग व्यवस्था मजबूत होगी.

MSP पर होगी 100 फीसदी खरीद

किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने अगले चार साल तक तुअर, उड़द और मसूर की फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर 100 प्रतिशत खरीद का प्रावधान किया है. इससे किसानों को बाजार जोखिम से सुरक्षा मिलने की उम्मीद है.

घट रहा रकबा, बढ़ रही आयात पर निर्भरता

हालांकि सरकार उत्पादन बढ़ाने की दिशा में प्रयास कर रही है, लेकिन हाल के वर्षों के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं. पिछले चार वर्षों में देश में दलहन की खेती का रकबा करीब 10 लाख हेक्टेयर घटकर लगभग 2.77 करोड़ हेक्टेयर रह गया है.

उत्पादन भी दबाव में है. साल 2021-22 में देश का कुल दलहन उत्पादन 2.73 करोड़ टन था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 2.60 करोड़ टन रहने का अनुमान है.

घरेलू उत्पादन में कमी का असर आयात पर साफ दिखाई दे रहा है. साल 2022-23 में भारत ने करीब 25 लाख टन दालों का आयात किया था. यह बढ़कर 2023-24 में 47 लाख टन और 2024-25 में रिकॉर्ड 72 लाख टन तक पहुंच गया. इससे स्पष्ट है कि देश की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अभी भी बड़े पैमाने पर आयात का सहारा लेना पड़ रहा है.

चना और अरहर पर टिकी दालों की तस्वीर

देश के कुल दलहन उत्पादन में चना और तुअर (अरहर) की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक है. चना मुख्य रूप से रबी सीजन की फसल है, जबकि अरहर खरीफ सीजन की प्रमुख दाल है. ऐसे में इन दोनों फसलों के उत्पादन में गिरावट का असर सीधे देश की दाल उपलब्धता और कीमतों पर पड़ता है.

अल नीनो की आशंकाओं के बीच इस बार अरहर, उड़द और मूंग जैसी खरीफ दालों को लेकर चिंता बढ़ गई है. इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय हालात और खाद की बढ़ती कीमतें भी किसानों की लागत बढ़ा रही हैं.

कीमतें बढ़ीं तो बफर स्टॉक बनेगा सहारा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उत्पादन प्रभावित होता है और दालों की कीमतों में तेजी आती है, तो सरकार अपने बफर स्टॉक का उपयोग कर सकती है. जरूरत पड़ने पर खुले बाजार में दालों की आपूर्ति बढ़ाकर कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है.

मौजूदा समय में सरकारी बफर स्टॉक में बड़ी मात्रा में दालें उपलब्ध हैं. इसमें मूल्य समर्थन योजना (PSS) और मूल्य स्थिरीकरण कोष (PSF) के तहत खरीदी गई दालें शामिल हैं. अनुमान के अनुसार चने का बफर स्टॉक लगभग 20 लाख टन है, जबकि अरहर का स्टॉक 7 से 8 लाख टन के बीच है.

हाल ही में उपभोक्ता मामले विभाग ने भी आने वाले महीनों में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए सार्वजनिक भंडार से दालों की बिक्री पर फिर से विचार करने का सुझाव दिया था. ऐसे में यदि त्योहारी सीजन के दौरान दालों की कीमतों में तेजी आती है तो सरकार चरणबद्ध तरीके से बफर स्टॉक बाजार में जारी कर सकती है.

आगे कैसी रहेगी स्थिति?

दालों की बढ़ती मांग, घटता उत्पादन और अल नीनो का खतरा सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. ऐसे में राष्ट्रीय दलहन मिशन और बफर स्टॉक नीति आने वाले महीनों में दालों की उपलब्धता और कीमतों को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभा सकती है. फिलहाल सरकार और किसान दोनों की नजर मौसम पर टिकी हुई है, क्योंकि इस बार की बारिश ही तय करेगी कि दालों की थाली सस्ती रहेगी या महंगी.

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