अनाज का सबसे बड़ा दुश्मनभारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में से एक है. हर साल किसान बड़ी मेहनत से अनाज पैदा करते हैं, लेकिन फसल कटने के बाद भी चुनौतियां खत्म नहीं होतीं. भंडारण के दौरान कई तरह के कीट अनाज को नुकसान पहुंचाते हैं. इनमें रेड फ्लोर बीटल (Tribolium castaneum) सबसे खतरनाक कीटों में से एक माना जाता है. यह कीट आटा, चावल, गेहूं, दाल और अन्य सूखे खाद्य पदार्थों में तेजी से फैलता है और उन्हें खराब कर देता है.
अनाज भंडारण के दौरान यदि समय पर इन कीटों पर नियंत्रण नहीं किया जाए तो बड़ी मात्रा में अनाज खराब हो सकता है. इससे किसानों, व्यापारियों और उपभोक्ताओं सभी को नुकसान उठाना पड़ता है. यही कारण है कि वैज्ञानिक लगातार ऐसे उपाय खोज रहे हैं जो अनाज को सुरक्षित रखने में मदद कर सकें.
रेड फ्लोर बीटल एक छोटा लाल-भूरे रंग का कीट होता है जो भंडारित खाद्य पदार्थों में पाया जाता है. यह तेजी से बढ़ता है और कम समय में बड़ी संख्या में फैल सकता है. इसकी मौजूदगी से अनाज की गुणवत्ता खराब हो जाती है और कई बार वह खाने योग्य भी नहीं रह जाता.
भारत सहित दुनिया के कई देशों में यह कीट खाद्यान्न भंडारण के लिए एक बड़ी समस्या बना हुआ है. यही वजह है कि इसके नियंत्रण के लिए लंबे समय से विभिन्न रसायनों का उपयोग किया जाता रहा है.
भंडारित अनाज को कीटों से बचाने के लिए आमतौर पर फॉस्फीन गैस का इस्तेमाल किया जाता है. यह गैस कीटों को मारने में प्रभावी मानी जाती है. लेकिन पिछले कई वर्षों से इसके लगातार और अधिक उपयोग के कारण रेड फ्लोर बीटल में इसके प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने लगी है.
सरल शब्दों में कहें तो अब कई रेड फ्लोर बीटल ऐसे हो गए हैं जिन पर फॉस्फीन गैस का असर पहले जैसा नहीं होता. ऐसे कीटों को फॉस्फीन रेसिस्टेंट कहा जाता है. जब ये कीट गैस के प्रभाव से नहीं मरते, तब अनाज की सुरक्षा और भी कठिन हो जाती है.
जब कोई कीट बार-बार एक ही रसायन के संपर्क में आता है, तो समय के साथ उसके शरीर और डीएनए में कुछ बदलाव हो सकते हैं. इन बदलावों के कारण वह उस रसायन के प्रभाव को सहन करने लगता है.
रेड फ्लोर बीटल में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है. लगातार फॉस्फीन गैस के उपयोग के कारण कुछ कीटों ने इसके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है. यही वजह है कि कई बार उपचार के बाद भी कीट पूरी तरह खत्म नहीं हो पाते.
इस समस्या को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI), नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने एक आधुनिक डीएनए आधारित तकनीक विकसित की है. यह CAPS मार्कर आधारित डीएनए टेस्ट रेड फ्लोर बीटल में फॉस्फीन रेसिस्टेंस की पहचान करने में मदद करता है.
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत कम समय में यह बता सकती है कि कोई बीटल फॉस्फीन गैस के प्रति प्रतिरोधक है या नहीं. पहले इस तरह की जानकारी प्राप्त करने में काफी समय लगता था, लेकिन अब कुछ घंटों में ही परिणाम मिल सकते हैं.
इस नए डीएनए टेस्ट से किसानों और अनाज भंडारण करने वाले संस्थानों को कई फायदे होंगे. यदि समय रहते यह पता चल जाए कि कीट फॉस्फीन रेसिस्टेंट हैं, तो उनके नियंत्रण के लिए वैकल्पिक उपाय अपनाए जा सकते हैं.
इससे अनावश्यक रूप से रसायनों का उपयोग कम होगा. साथ ही सही समय पर सही उपचार करने से अनाज को होने वाला नुकसान भी कम किया जा सकेगा. यह तकनीक भंडारण की लागत घटाने और खाद्यान्न की गुणवत्ता बनाए रखने में भी मददगार साबित हो सकती है.
रसायनों का अधिक उपयोग केवल कीटों के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का विषय है. जब जरूरत से ज्यादा रसायनों का उपयोग किया जाता है, तो उसका असर मिट्टी, पानी और आसपास के वातावरण पर पड़ सकता है.
नया डीएनए टेस्ट यह सुनिश्चित करने में मदद करेगा कि फॉस्फीन गैस का उपयोग केवल वहीं किया जाए जहां वास्तव में इसकी जरूरत हो. इससे रसायनों का उपयोग कम होगा और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा.
ICAR-IARI द्वारा विकसित यह तकनीक भारत के कृषि क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है. यह OneICAR अभियान के तहत विकसित की गई आधुनिक तकनीकों में से एक है, जिसका उद्देश्य कृषि को अधिक वैज्ञानिक और आधुनिक बनाना है.
भविष्य में इस तरह की तकनीकें न केवल अनाज भंडारण को सुरक्षित बनाएंगी, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और खाद्यान्न नुकसान को कम करने में भी अहम भूमिका निभाएंगी. रेड फ्लोर बीटल जैसे खतरनाक कीटों की समय पर पहचान अब संभव हो गई है और इससे देश की खाद्य सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी.
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