DAP-यूरिया पर खर्च घटाना है तो अपनाएं ये हरी खाद, ज्यादा उपजाऊ बनेगी मिट्टी

DAP-यूरिया पर खर्च घटाना है तो अपनाएं ये हरी खाद, ज्यादा उपजाऊ बनेगी मिट्टी

हरी खाद सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसकी जड़ों में मौजूद गांठें वातावरण से नाइट्रोजन खींचकर मिट्टी में जमा करती हैं. यही कारण है कि इसे प्राकृतिक नाइट्रोजन का अच्छा स्रोत माना जाता है.

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DAP-यूरिया पर खर्च घटाना है तो अपनाएं ये हरी खाद, ज्यादा उपजाऊ बनेगी मिट्टीहरी खाद

खेती में लगातार बढ़ती हुई लागत आज किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है. खासकर डीएपी, यूरिया और रासायनिक कीटनाशकों पर होने वाला खर्च किसानों की जेब पर असर कर रहा है. ऐसे में कृषि विशेषज्ञ किसानों को ढैंचा की हरी खाद अपनाने की सलाह दे रहे हैं. यह एक प्राकृतिक और सस्ता तरीका है, जो मिट्टी की सेहत सुधारने के साथ-साथ रासायनिक खादों पर निर्भरता भी कम कर सकता है.

ढैंचा से घटेगा खाद का खर्च

ढैंचा एक दलहनी फसल है, जिसे खेत में उगा कर बाद में मिट्टी में मिला दिया जाता है. इसे हरी खाद भी कहा जाता है. एक्सपर्ट्स के अनुसार ढैंचा की फसल खेत में मिलाने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है और अगली फसल के लिए पोषक तत्वों की जरूरतें भी पूरी हो जाती हैं. इससे यूरिया की जरूरत 25 से 30 फीसदी तक कम हो सकती है, जिससे किसानों का खाद पर होने वाला खर्च घटता है.
ढैंचा की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसकी जड़ों में मौजूद गांठें वातावरण से नाइट्रोजन खींचकर मिट्टी में जमा करती हैं. यही कारण है कि इसे प्राकृतिक नाइट्रोजन का अच्छा स्रोत माना जाता है. जब ढैंचा को खेत में पलट दिया जाता है, तो यह मिट्टी में नाइट्रोजन, जैविक कार्बन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ा देता है.

खेत में करें ढैंचा का उपयोग

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक ढैंचा के उपयोग से मिट्टी उर्वरा शक्ति का सुधार होता है. यह मिट्टी को भुरभुरी बनाता है, जिससे जड़ों का विकास बेहतर होता है. रेतीली मिट्टी में इसकी वजह से पानी रोकने की क्षमता बढ़ती है, जबकि भारी मिट्टी में जल निकासी और वायु संचार बेहतर होता है. इससे फसलों की बढ़वार पर सकारात्मक असर पड़ता है. ढैंचा की फसल खेत में खरपतवार नियंत्रण में भी मदद करती है. इसकी तेज बढ़वार और घनी पत्तियां सूर्य की रोशनी को जमीन तक कम पहुंचने देती हैं, जिससे खरपतवारों की बढ़ोतरी रुक जाती है. साथ ही, इसे मिट्टी में मिलाने से लाभदायक सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है, जो फसलों को कई रोगों से बचाने में मदद करते हैं.

खेत में कैसे और कब इस्तेमाल करें ढैंचा

विशेषज्ञों का कहना है कि ढैंचा की बुवाई मॉनसून की शुरुआत में या खरीफ सीजन से पहले की जा सकती है. बुवाई के लगभग 45 से 50 दिन बाद, जब पौधे हरे और कोमल हों, तब उन्हें खेत में पलट देना चाहिए. इससे अधिकतम जैविक पदार्थ और पोषक तत्व मिट्टी में मिल पाते हैं. कृषि एक्सपर्ट का मानना है कि यदि किसान ढैंचा की हरी खाद को अपनाएं, तो वे रासायनिक खादों पर होने वाला खर्च कम कर सकते हैं, मिट्टी की सेहत सुधार सकते हैं और लंबे समय तक बेहतर उत्पादन ले सकते हैं. यही कारण है कि ढैंचा को टिकाऊ और लाभकारी खेती की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. 

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