धान की खेतीखरीफ की खेती बिहार में अभी तक 50 फीसदी के पार पहुंच चुकी है. कम बारिश के बीच इस बार राज्य में अभी तक खरीफ की खेती पिछले वर्ष की तुलना में करीब 16 प्रतिशत से अधिक है. अल नीनो वर्ष और जलवायु परिवर्तन के दौर में यह आंकड़े बिहार के लिहाज से राहत भरे हैं. राज्य के अंदर खरीफ सीजन में धान, मक्का सहित दलहन, तिलहन और मिलेट्स की खेती करीब 42.200 लाख हेक्टेयर में की जाती है. कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अभी तक 21.734 लाख हेक्टेयर में खेती हो चुकी है. जिसमें धान की खेती सबसे अधिक करीब 37 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि में की जाती है, जो अभी तक 50 फीसदी के आसपास पहुंच चुका है. वहीं, किसानों का कहना है कि इस बार धान की खेती पिछले वर्ष की तुलना में महंगी पड़ रही है.
कृषि विभाग द्वारा खरीफ सीजन की खेती को लेकर जारी आंकड़ों के अनुसार, जहां मक्का की खेती लक्ष्य (2.703 लाख हे.) की तुलना में करीब 86 फीसदी (2.339 लाख हे.) के आसपास ही हो पाई है. वहीं, दलहन की खेती खरीफ सीजन में जहां 0.884 लाख हेक्टेयर होती है, अभी तक 0.448 लाख हेक्टेयर (50.66%) के आसपास ही हो पाई है. वहीं, तिलहन की खेती निर्धारित लक्ष्य 0.130 लाख हेक्टेयर की तुलना में 0.049 लाख हेक्टेयर (37.68%) और मिलेट्स की खेती लक्ष्य के 0.413 लाख हेक्टेयर की तुलना में 0.136 लाख हेक्टेयर (33.30%) के आसपास हुई है. वहीं, पिछले वर्ष की तुलना में अगर बात करें तो 22 जुलाई तक खरीफ की खेती करीब 16% अधिक हुई है.
बिहार के कई ऐसे जिले हैं, जहां धान की खेती अपने लक्ष्य के करीब पहुंच चुकी है, वहीं कुछ ऐसे भी जिले हैं जो अपने लक्ष्य से कोसों दूर हैं. 80% से 100% धान की खेती के लक्ष्य को हासिल करने वाले जिलों में पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सहरसा, मधेपुरा, किशनगंज और कटिहार जिले शामिल हैं. वहीं 4% से लेकर 30% के बीच धान की रोपनी वाले जिलों में गया, पटना, भोजपुर, कैमूर, जहानाबाद, अरवल, नवादा, औरंगाबाद, मुंगेर, शेखपुरा, लखीसराय, जमुई और बांका समेत करीब 13 जिले शामिल हैं, जहां धान की रोपनी बहुत धीमी है. वहीं करीब सात ऐसे जिले हैं, जहां धान की खेती करीब-करीब अपने लक्ष्य के काफी नजदीक पहुंच गई है.
पटना जिले के संपतचक इलाके के किसानों ने बताया कि इस बार डीजल का दाम बढ़ने से धान की खेती महंगी हो गई है. जहां पिछले वर्ष की तुलना में प्रति बीघा खेत की जुताई 400 से 500 रुपये के आसपास बढ़ गई है, जो इस बार करीब 2000 रुपये प्रति बीघा के आसपास पहुंच गई है. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि खुदरा में जो यूरिया 8 रुपये प्रति किलो बिकता था, वह अब 12 रुपये प्रति किलो पहुंच गया है. वहीं डीएपी 27 से 28 रुपये प्रति किलो की जगह 32 से 33 रुपये प्रति किलो हो गया है. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि मजदूरी भी 50 से लेकर 80 रुपये के बीच बढ़ गई है.
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