जीरे की खेतीराजस्थान के पश्चिमी हिस्से में जीरे की खेती अब पारंपरिक तरीके से आगे बढ़कर इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) यानी एकीकृत कीट प्रबंधन की ओर बढ़ रही है. इस तरीके में फसल को कीट और रोगों से बचाने के लिए रसायनों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय जैविक उपाय, वैज्ञानिक निगरानी और जरूरत के हिसाब से दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. इससे जीरे की क्वालिटी बेहतर करने, कीटनाशक अवशेष कम करने और किसानों को बेहतर कीमत दिलाने में मदद मिल रही है.
साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर (SABC), जोधपुर और ICAR-नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन सीड स्पाइसेस (ICAR-NRCSS), अजमेर ने मिलकर ‘सस्टेनेबल प्रैक्टिसेज फॉर क्वालिटी प्रोडक्शन ऑफ IPM Cumin’ नाम से एक पब्लिकेशन जारी किया है. इसमें पश्चिमी राजस्थान में IPM के जरिए जीरे की खेती में हुए बदलाव और किसानों को मिले फायदे की जानकारी दी गई है.
इस पहल के तहत बाड़मेर, जैसलमेर, सांचौर, जालौर, जोधपुर, नागौर और पाली जैसे प्रमुख जीरा उत्पादक जिलों में किसानों के साथ काम किया गया. किसानों को खेत में जीरे की फसल की निगरानी, कीट और रोगों की पहचान, जैविक और वनस्पति आधारित उपाय, मिट्टी-पानी की जांच और क्वालिटी वाले बीज के इस्तेमाल की जानकारी दी गई. इसके साथ ही किसानों को कटाई के बाद की प्रक्रिया, कीटनाशक अवशेष की जांच और बाजार की जरूरत के अनुसार जीरे का उत्पादन करने के बारे में भी ट्रेनिंग दिया गया. FPO, प्रोसेसर, मसाला कंपनियों और निर्यातकों को किसानों से जोड़ने पर भी जोर दिया गया.
पब्लिकेशन के अनुसार, वर्ष 2023-24 में पश्चिमी राजस्थान के प्रमुख जीरा उत्पादक जिलों से करीब 37,500 मीट्रिक टन IPM जीरे की खरीद संगठित तरीके से की गई. इस दौरान लगभग 10,700 कीटनाशक अवशेष की जांच भी की गई. रिपोर्ट के मुताबिक, IPM तरीके से जीरा उगाने वाले किसानों को सामान्य बाजार कीमत की तुलना में औसतन 24 फीसदी अधिक भाव मिला. वहीं, कीट और फंगल रोगों के बेहतर प्रबंधन के कारण प्रति एकड़ उत्पादन लागत में करीब 25 से 35 फीसदी तक कमी आने की बात कही गई है. इससे किसानों को कम लागत में बेहतर क्वालिटी का जीरा तैयार करने और बाजार में प्रीमियम कीमत पाने का अवसर मिला है.
IPM खेती का मतलब यह नहीं है कि कीटनाशकों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया जाए. इसका मुख्य उद्देश्य बिना जरूरत रसायनों के इस्तेमाल को कम करना है. इसमें सबसे पहले खेत में कीटों और रोगों की निगरानी की जाती है. जरूरत पड़ने पर जैविक और वनस्पति आधारित उपाय अपनाए जाते हैं और गंभीर स्थिति में ही मंजूरशुदा पौध संरक्षण उत्पादों का इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा फसल की कटाई से पहले दवा के इस्तेमाल और कटाई के बीच जरूरी अंतर का भी ध्यान रखा जाता है. इससे जीरे में कीटनाशक अवशेष की मात्रा को सुरक्षित सीमा में रखने में मदद मिल सकती है.
SABC के मुताबिक, पश्चिमी राजस्थान में IPM जीरे का उत्पादन अब करीब 35,000 से 37,500 मीट्रिक टन तक पहुंच चुका है. आने वाले वर्षों में इसे बढ़ाकर 1 लाख मीट्रिक टन तक ले जाने की संभावना जताई गई है. यूरोप, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे बाजारों में सुरक्षित और तय मानकों के अनुरूप मसालों की मांग को देखते हुए राजस्थान के किसानों के लिए यह एक बड़ा अवसर माना जा रहा है.
IPM जीरे की खेती को बड़े स्तर पर बढ़ावा देने के लिए SABC ने राजस्थान सरकार के सामने कुछ सुझाव भी रखे हैं. इनमें IPM प्रोटोकॉल अपनाने वाले किसानों को 10,000 से 12,000 रुपये तक प्रोत्साहन देने का सुझाव शामिल है. इसके अलावा किसानों को स्प्रिंकलर से सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराने, सरकारी जमीन को लंबे समय के लिए लीज पर देने और मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में सब्सिडी वाली कीटनाशक-अवशेष जांच की सुविधा देने की मांग की गई है.
IPM जीरे का मॉडल केवल खेती की तकनीक तक सीमित नहीं है. इसमें किसान, FPO, टेस्टिंग लैब, प्रोसेसर, मसाला कंपनियां और निर्यातक सभी एक साथ जुड़ते हैं. इससे किसान को बाजार की जरूरत के मुताबिक फसल तैयार करने और बेहतर कीमत हासिल करने का मौका मिल सकता है. अगर यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल होता है, तो पश्चिमी राजस्थान क्वालिटी वाले और कम कीटनाशक-अवशेष वाले जीरे के बड़े केंद्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर सकता है. इससे किसानों की लागत घटाने, आय बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में राजस्थान के जीरे की पकड़ मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
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