सोयाबीन किसानों पर मौसम के बाद अब सरकार की मार, इंपोर्ट ड्यूटी घटने से भाव पर बढ़ेगा दबाव

सोयाबीन किसानों पर मौसम के बाद अब सरकार की मार, इंपोर्ट ड्यूटी घटने से भाव पर बढ़ेगा दबाव

त्योहारी सीजन में खाद्य तेल की कीमतों से राहत देने के लिए सरकार ने पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल पर इंपोर्ट ड्यूटी घटा दी है. इससे आम ग्राहकों को सस्ता खाने का तेल मिलने की उम्मीद है, लेकिन पहले से गिरते बाजार भाव से परेशान सोयाबीन किसानों की चिंता बढ़ गई है. कई मंडियों में सोयाबीन के भाव कमजोर बने हुए हैं और किसान बेहतर कीमत के लिए जूझ रहे हैं. ऐसे में सस्ते आयातित तेल की आवक बढ़ने से घरेलू सोयाबीन के भाव पर और दबाव पड़ सकता है. जानिए सरकार के इस फैसले का सोयाबीन किसानों और बाजार पर क्या असर पड़ सकता है.

Advertisement
सोयाबीन किसानों पर मौसम के बाद अब सरकार की मार, इंपोर्ट ड्यूटी घटने से भाव पर बढ़ेगा दबावसोयाबीन के दाम में गिरावट

त्योहारी सीजन में आम लोगों को खाने के तेल की महंगाई से राहत देने के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के आयात पर लगने वाली ड्यूटी में कटौती कर दी है. इस फैसले से आने वाले दिनों में आयातित खाद्य तेल सस्ता होने और घरेलू बाजार में खाने के तेल की कीमतों पर दबाव कम होने की उम्मीद है. हालांकि, उपभोक्ताओं को राहत देने वाला यही फैसला देश के तिलहन किसानों, खासकर सोयाबीन उत्पादकों के लिए नई परेशानी खड़ी कर सकता है.

सरकार ने कच्चे पाम और सोयाबीन तेल पर बेसिक कस्टम्स ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी है, जबकि कच्चे सूरजमुखी तेल पर बेसिक कस्टम्स ड्यूटी को शून्य कर दिया गया है. इसके अलावा रिफाइंड पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल पर भी शुल्क घटाया गया है. ड्यूटी कम होने से विदेशी खाने के तेल के आयात की लागत घटेगी और देश में इसका आयात बढ़ सकता है. इसका सीधा असर घरेलू तिलहन और खाद्य तेल बाजार पर पड़ने की आशंका है.

पहले से गिर रहे सोयाबीन के भाव

सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब सोयाबीन किसान पहले से ही कमजोर बाजार भाव से जूझ रहे हैं. मंडियों से मिले भाव के आंकड़ों में सोयाबीन की कीमतों में गिरावट साफ दिखाई दे रही है. कई बाजारों में किसानों को अपनी उपज के लिए उचित दाम नहीं मिल रहे हैं. ऐसे में आयातित सोयाबीन तेल और सस्ता होने से घरेलू सोयाबीन की कीमतों पर दबाव और बढ़ने की आशंका है.

किसानों के सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई फसल की आवक के समय अगर बाजार में सोयाबीन का भाव पहले से कमजोर रहता है तो उन्हें अपनी उपज कम कीमत पर बेचनी पड़ सकती है. आमतौर पर नई फसल की आवक बढ़ने पर बाजार में आपूर्ति बढ़ती है. अब आयात शुल्क में कटौती के कारण खाद्य तेल आयात को भी बढ़ावा मिला तो घरेलू बाजार में तिलहन की कीमतों को सहारा मिलना और मुश्किल हो सकता है.

MSP के आसपास भाव पहुंचना भी चुनौती

सोयाबीन किसानों की चिंता सिर्फ भाव में गिरावट तक सीमित नहीं है. किसान लंबे समय से अपनी फसल का बेहतर दाम मांग रहे हैं और कई इलाकों में बाजार भाव को लेकर नाराजगी देखने को मिलती रही है. किसानों की सबसे बड़ी मांग यह रहती है कि कम से कम उन्हें सरकार की ओर से घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP के बराबर कीमत मिले.

लेकिन बाजार में कीमत कमजोर होने की स्थिति में किसानों को MSP का लाभ तभी मिल पाता है जब सरकारी खरीद प्रभावी तरीके से हो. यदि खुले बाजार में सोयाबीन के दाम और नीचे जाते हैं तो सरकारी खरीद व्यवस्था और बाजार हस्तक्षेप की अहमियत बढ़ जाएगी.

मौसम ने पहले मारा, अब बाजार की चिंता

सोयाबीन उगाने वाले किसानों के लिए मौजूदा सीजन पहले ही आसान नहीं रहा है. कई सोयाबीन उत्पादक क्षेत्रों में मौसम की मार से फसल प्रभावित होने की शिकायतें सामने आई हैं. कहीं बारिश के लंबे अंतराल ने परेशानी बढ़ाई तो कहीं बहुत अधिक बारिश और खेतों में पानी भरने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ा. ऐसे किसान अब बाजार से बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद लगाए बैठे थे.

लेकिन इंपोर्ट ड्यूटी में कटौती ने उनकी इस उम्मीद को कमजोर कर दिया है. किसानों का खर्च बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और कृषि मशीनरी समेत कई मदों पर लगातार बना रहता है. यदि उत्पादन प्रभावित होने के साथ बाजार भाव भी कमजोर मिलता है तो खेती का पूरा आर्थिक गणित बिगड़ सकता है.

इंपोर्ट ड्यूटी घटने से किसानों पर कैसे पड़ेगा असर?

खाने के तेलों पर आयात शुल्क घटने का गणित सीधे मांग और आपूर्ति से जुड़ा है. इंपोर्ट ड्यूटी कम होने पर विदेश से आने वाले खाद्य तेल की लागत कम होती है. आयात सस्ता पड़ने पर भारतीय बाजार में विदेशी खाद्य तेल की सप्लाई बढ़ सकती है.

ऐसी स्थिति में घरेलू तेल मिलों और प्रोसेसर्स के सामने सस्ते आयातित तेल का विकल्प मौजूद रहेगा. इसका असर घरेलू तिलहन की मांग और कीमतों पर पड़ सकता है. सोयाबीन की कीमत काफी हद तक उससे तैयार होने वाले तेल और खली की मांग और कीमत से जुड़ी होती है. इसलिए सोयाबीन तेल के सस्ते आयात का असर आखिरकार किसानों को मिलने वाली कीमत तक पहुंचने की आशंका रहती है.

ग्राहकों को राहत, किसानों के सामने मुश्किल

सरकार के फैसले के दो अलग-अलग पहलू दिखाई दे रहे हैं. पहला उपभोक्ताओं से जुड़ा है. त्योहारी सीजन में खाद्य तेल की कीमतों पर नियंत्रण से घरों का रसोई बजट संभालने में मदद मिल सकती है. खाद्य तेल महंगा होने पर उसका सीधा असर आम परिवार की जेब पर पड़ता है, इसलिए सरकार आयात शुल्क घटाकर बाजार में आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है.

दूसरा पहलू किसानों से जुड़ा है. भारत में बड़ी संख्या में किसान सोयाबीन समेत दूसरी तिलहन फसलों पर निर्भर हैं. ऐसे में सस्ते आयात से इनके घरेलू बाजार भाव कमजोर होने का खतरा बनता है. खासकर उस समय यह चुनौती ज्यादा गंभीर हो जाती है जब किसान की फसल तैयार होकर मंडियों में पहुंचने वाली हो या बाजार में पहले से ही कीमत नीचे चल रही हो.

ऐसे में सरकार के सामने बड़ी चुनौती उपभोक्ताओं और किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाने की होगी. एक तरफ खाने का तेल सस्ता रखना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही अहम है कि देश के तिलहन किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिले. यदि आयात शुल्क में कटौती के बाद सोयाबीन के बाजार भाव में और गिरावट आती है तो आने वाले दिनों में किसानों की ओर से सरकारी खरीद बढ़ाने और बाजार में हस्तक्षेप की मांग तेज हो सकती है.

POST A COMMENT