तिलहन का डेढ़ गुना पैदावार बढ़ाने का सरकारी प्लान, पर बिना 'सही दाम' के कैसे मानेगा किसान? 

तिलहन का डेढ़ गुना पैदावार बढ़ाने का सरकारी प्लान, पर बिना 'सही दाम' के कैसे मानेगा किसान? 

सरकार ने अगले 5 सालों में तिलहन की पैदावार को डेढ़ गुना बढ़ाने का एक बहुत शानदार प्लान तैयार किया है. देश को खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनाने के लिए यह बड़ा कदम है. लेकिन, इस पूरे प्लान में सबसे बड़ा सवाल किसानों के सही दाम का है. किसान चाहते हैं कि उन्हें अपनी फसल और मेहनत की पक्की कीमत मिले.

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तिलहन का डेढ़ गुना पैदावार बढ़ाने का सरकारी प्लान, पर बिना 'सही दाम' के कैसे मानेगा किसान? प्लान डेढ़ गुना पैदावार का पर किसानों के दाम का क्या? फोटो - AI

भारत में खाने-पीने का शौक और हर घर की रसोई में खाद्य तेल की भारी खपत किसी से भी छुपी नहीं है. हमारे देश में हर साल करीब 240 से 250 लाख टन खाने के तेल की खपत है. बड़े अफ़सोस की बात यह है कि इस भारी ज़रूरत को पूरा करने के लिए हमें अपना आधे से ज़्यादा खाद्य तेल विदेशों से आयात पड़ता है. इस लगातार होने वाले आयात से देश के खज़ाने पर हर साल करोड़ों रुपयों का भारी बोझ पड़ता है. इसी परेशानी को जड़ से खत्म करने के लिए, हाल ही में संसद में केन्द्र सरकार ने पूरी डिटेल से बताया कि देश को खाद्य तेल के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के लिए ज़मीन पर क्या ठोस काम हो रहा है. सरकार का मकसद बिल्कुल साफ़ है कि हमारा पैसा विदेशों में न जाए, बल्कि हमारे किसानों की जेब में पहुंचे और देश की अर्थव्यवस्था को एक नई मज़बूती मिले.

बंपर पैदावार के लिए सरकार का मेगा प्लान

देश के भविष्यके प्लान पर रौशनी डालते हुए सरकार ने बताया कि उनका विज़न बहुत साफ़ और लक्ष्य काफी बड़ा है. सरकार ने साल 2030-31 तक देश के तिलहन उत्पादन को सीधा 697 लाख टन तक पहुंचाने यानि 2025 -26  की तुलना में 70 प्रतिशत ज्यादा का ज़बरदस्त टारगेट सेट किया है. इसके अलावा, पाम ऑयल मिशन को आगे बढ़ाने के लिए साल 2026-27 के लिए राज्यों को 1143.9 करोड़ रुपये का नया बजट पास कर दिया गया है. किसानों को बड़ी राहत देते हुए, हाइब्रिड बीजों की खरीद पर सरकार की तरफ से 100% सब्सिडी दी जा रही है.इसका सीधा फायदा यह होगा कि किसानों की जेब पर कोई फालतू बोझ नहीं पड़ेगा और वे ज़्यादा पैदावार देने वाली नई किस्मों को बेझिझक अपना सकेंगे. इन तमाम कोशिशों से उम्मीद बंधती है कि पैदावार का ग्राफ लगातार ऊपर जाएगा.

मिशन तिलहन की ज़मीनी हकीकत

संसद में दी गई सरकार की जानकारी के मुताबिक, घरेलू उत्पादन तेज़ी से बढ़ाने के लिए 3 अक्टूबर 2024 को 'राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन' को हरी झंडी दिखा दी गई है. किसानों की पूरी मदद के लिए देशभर में 600 से ज़्यादा 'वैल्यू चेन क्लस्टर' बनाए गए हैं, जहां उन्हें मुफ़्त में बेहतरीन क्वालिटी के बीज दिए जा रहे हैं और खेती की नई तकनीकें भी सिखाई जा रही हैं. सरकार ने अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि साल 2022-23 में जहां देश में तिलहन का कुल उत्पादन 413.55 लाख टन था, वह अब 2025-26 के अनुमानों के मुताबिक बढ़कर 430.59 लाख टन तक पहुंच गया है.उन्नत हाइब्रिड बीजों के उत्पादन को रफ्तार देने के लिए 60 नए सीड हब और 50 ख़ास बीज गोदामों को भी बनाने की मंज़ूरी दी गई है, ताकि बुवाई के वक्त किसानों को बीजों की कोई किल्लत ना उठानी पड़े.

पाम ऑयल मिशन पर भारी फोकस

तिलहन के साथ पाम ऑयल पर अपने खास फोकस का ज़िक्र करते हुए सरकार ने बताया कि 'पाम ऑयल मिशन' देश की तकदीर बदलने वाला एक मास्टरस्ट्रोक साबित होगा. साल 2021-22 में 11,040 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बजट के साथ शुरू हुए इस मिशन का असल मक़सद आयात पर हमारी निर्भरता को पूरी तरह खत्म करना है. देश के 15 राज्यों में अब तक करीब 2.73 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर पाम की खेती शुरू हो चुकी है, जो एक बहुत बड़ी कामयाबी है. सरकार किसानों को पौधे लगाने, देखभाल करने, ड्रिप सिंचाई और मशीनों के लिए अच्छी-खासी वित्तीय सहायता दे रही है. सबसे बड़ी राहत यह है कि किसानों को फसल की कीमत की पक्की गारंटी (VGP) भी दी जा रही है ताकि बाज़ार के उतार-चढ़ाव से किसानों को कोई बड़ा आर्थिक नुकसान न हो.

सही दाम के बिना अधूरा है आत्मनिर्भरता का ख़्वाब

संसद में दिए गए इन तमाम जवाबों का असल फायदा धरातल पर तभी दिखेगा, जब सरकार किसानों की उपज की खरीद का एक पक्का सिस्टम बनाएगी. यह बात साफ़ है कि जब तक किसानों को तिलहन की सही कीमत (MSP) नहीं मिलेगी, वे निराश होकर दूसरी फसलों की तरफ मुड़ जाएंगे. इसलिए, जैसे हमारे देश में गन्ने की खेती का शानदार मॉडल है—जहां शुगर मिले पहले से आकलन और सरकार के तय दाम के अनुसार पेमेंट होता है और पक्का भुगतान मिलता है उसी तर्ज़ पर तिलहन का सिस्टम बनाना होगा.अगर दाम सही नहीं मिला, तो किसान इस फसल से तौबा कर लेगा. साथ ही, कृषि वैज्ञानिकों के साथ मिलकर नई रिसर्च करनी होगी ताकि कम ज़मीन में तिलहन का ज़्यादा पैदावार मिले. अगर किसानों की मेहनत का सही दाम मिल गया,तो यकीनन हमारे किचन का तेल विदेशी जहाज़ों से नहीं, बल्कि अपने खेतों से आएगा.

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