फूड प्रोसेसिंग ने खोल दिए खेती में मुनाफे के रास्ते फोटों :AIअब घंटों रसोई में पसीना बहाने के बजाय,अवाम का पूरा ज़ोर सहूलियत और झटपट तैयार होने वाले खाने पर है. यही वजह है कि 'रेडी-टू-ईट' और पैकेट बंद खाने का क्रेज सिर्फ हमारे मुल्क में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सिर चढ़कर बोल रहा है. ऑनलाइन फूड डिलीवरी और 10 मिनट में सामान पहुंचाने वाले ऐप्स ने इस बदलाव को और भी तेज कर दिया है, जिससे लोगों की जिदगी बेहद आसान और सुकून भरी हो गई है. लोगों की इसी बदलती हुई आदत ने फूड प्रोसेसिंग को आज मुल्क का सबसे अहम और तेजी से उभरता हुआ 'सनराइज सेक्टर' बना दिया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की ऐतिहासिक प्राचीर से देशवासियों के सामने 'शक्ति की सप्तधारा' का एक शानदार और क्रांतिकारी विजन पेश किया. उनमें मैन्युफैक्चरिंग पावर,कृषि और फूड प्रोसेसिंग, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन, गति शक्ति और कनेक्टिविटी, रक्षा शक्ति, ग्रीन और ब्लू इकोनॉमी,और भारत की सॉफ्ट पावर सात ताकतों का खाका खींचा. इन सात शक्तियों में फूड प्रोसेसिंग को खेती के फौरन बाद दूसरा सबसे अहम मुकाम दिया. उन्होंने लोगों को पूरे यकीन देकर समझाया कि खेती में हमें अपनी फूड प्रोसेसिंग की ताक़त पर सबसे ज़्यादा जोर देना होगा.
आज की भागदौड़ भरी जिदगी में लोगों के पास वक्त की थोड़ी किल्लत है, इसलिए खान-पान का सदियों पुराना रिवायती तरीका पूरी तरह से पलट गया है. फिक्की की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आज गांव और शहर के परिवार अपने मासिक खाने के कुल बजट का लगभग 23 फीसद हिस्सा सिर्फ पैकेज्ड फूड पर खर्च कर रहे हैं. इसके बाद फल-सब्जियों पर 20% और डेयरी उत्पादों पर 18% का खर्च आता है. फिक्की का साल 2025 की रिपोर्ट के अनुसार,भारत के बड़े शहरों में रहने वाले लोग अपने खाने-पीने के कुल बजट का 50% हिस्सा सिर्फ पैक्ड फूड,रेस्तरां और ऑनलाइन फूड डिलीवरी पर लगा रहे हैं. रिलायंस फ्रेश, डी-मार्ट और क्विक-कॉमर्स ऐप्स ने घर-घर बेहतरीन सामान चंद मिनटों में पहुंचाकर लोगों की जिदगी को बेहद आसान बना दिया है.
एक रिसर्च के मुताबिक, साल 2025 में दुनिया का फूड पैकेजिंग बाजार लगभग 45.32 लाख करोड़ रुपये का था, जिसके 2026 में बढ़कर 47.94 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है. इस ग्लोबल मार्केट में एशिया-पैसिफिक इलाके का सबसे ज़्यादा उत्पादन है और भारत अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराते हुए ओवरऑल पैकेजिंग में दुनिया में पांचवें मुकाम पर अपनी जगह बना चुका है. आज ग्लोबल मार्केट में भारत की हिस्सेदारी लगभग 7.17% है, जबकि 23% के साथ चीन पहले स्थान पर है. सबसे खास बात यह है कि जहां अमेरिका और यूरोप में यह बाजार महज 3 से 5% की सुस्त रफ्तार से बढ़ रहा है.
वहीं, भारत में इसकी तरक्की की रफ्तार 7 से 12% है. एपिडा के अनुसार आज यह सेक्टर भारत के कुल फ़ूड मार्केट में 32% की बड़ी हिस्सेदारी रखता है और देश के टॉप 5 सेक्टर्स में गिना जाता है, जिससे भारत दुनिया भर में एक बड़े फ़ूड हब के रूप में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है.
देश के देसी स्वाद का जादू अब सिर्फ मुल्क की सरहदों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में इसका डंका बज रहा है, क्योंकि इस इंडस्ट्री की असली ताकत इसका एक्सपोर्ट है. एपिडा के आंकड़े के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत ने लगभग 68,294 करोड़ रुपये के प्रोसेस्ड फ़ूड का निर्यात किया, जिसमें तैयार खाने-पीने के सामान 12,696 करोड़ रुपये अनाज से बनी चीजें 8,559 करोड़ दालें 8,241 करोड़, प्रोसेस्ड सब्जियां 7,924 करोड़ मूंगफली 5,873 करोड़ और जूस और फल 5,634 करोड़ रूपये की बड़ी हिस्सेदारी रही. इसके साथ ही, भारत की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि यहां से यूरोप, खाड़ी देशों, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों तक पहुंचना बेहद आसान है.
इसका सीधा फायदा भारतीय कारोबारियों को मिल रहा है. विकसित भारत @2047' के विज़न के तहत फ़ूड प्रोसेसिंग को देश की तरक्की का सबसे अहम इंजन माना गया है, और साल 2047 तक इस सेक्टर की ग्रॉस वैल्यू एडेड को 7.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने का बड़ा लक्ष्य रखा गया है. खेती और प्रोसेसिंग का यह बेहतरीन मेल आने वाले वक्त में भारत दुनिया की 'ग्लोबल किचन' के रूप में स्थापित करेगा.
भारत में तेजी से बढ़ता हुआ फ़ूड प्रोसेसिंग का यह बाज़ार 1.4 अरब लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के साथ किसानों के लिए किसी सुनहरे अवसर से कम नहीं है, क्योंकि यह फसलों को सड़ने से बचाकर उन्हें मेहनत का सही और वाजिब दाम दिलाने के बीच एक मजबूत पुल का काम करता है. दूसरी तरफ, साल 2030 तक देश की प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 3.63 लाख रुपये होने के अनुमान से देश की खरीदारी करने की ताकत में इज़ाफ़ा देखने को मिलेगा. वही कुदरत ने हमारे देश को बेहतरीन आबोहवा दी है, जिसकी वजह से हम कच्चे माल के मामले में पूरी दुनिया में बेजोड़ हैं.
आज हमारा भारत दूध उत्पादन में 25% की विशाल हिस्सेदारी के साथ वैश्विक स्तर पर नंबर वन पर है, जबकि फल, सब्ज़ी और अंडों में दूसरे नंबर पर और मसालों के उत्पादन में सबसे आगे है. इसी मजबूत बुनियाद पर अमूल आज दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी ब्रांड बनकर उभरा है. वहीं नेस्ले, ब्रिटानिया, पार्ले, हल्दीराम और MTR जैसी बड़ी कंपनियां अपनी बेहतरीन क्वालिटी और स्वाद के दम पर इस बाजार को नई ऊंचाइयों पर ले जा रही हैं. इसके अलावा,आलू की फूड प्रोसेसिंग और इसकी मांग भी तेजी से बढ़ रही है. उधर, हैदराबाद के मिलेट्स रिसर्च इंस्टीट्यूट को 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' बनाकर मोटे अनाजों की प्रोसेसिंग को नया बढ़ावा दिया गया है, जिससे ग्रामीण इलाकों में तरक्की की नई राहें खुल रही हैं.
इन तमाम कामयाबियों के बीच, पीएम मोदी ने एक बहुत जरूरी बात पर ध्यान खींचा है कि हमें अपने उत्पादों को 'ग्लोबल ब्रांड' बनाने के लिए क्वालिटी से कोई समझौता नहीं करना है. अक्सर ज़्यादा मुनाफे के लालच में खेतों में खतरनाक केमिकल और कीटनाशकों का छिड़काव होता है, जो देश लोगों की सेहत के साथ बड़ा खिलवाड़ है. इसके अलावा, स्टोरेज की कमी और मिलावट की वजह से ग्लोबल मार्केट में हमारे सामान रिजेक्ट हो जाते हैं, जिससे मुल्क की साख को गहरा धक्का लगता है.
अगर हमें दुनिया के बाज़ारों में अपना पक्का सिक्का जमाना है, तो हमें FSSAI के कड़े मानकों, बिना मिलावट वाले बेहतरीन सामान और साफ-सफाई के नियमों का पूरी ईमानदारी से पालन करना होगा. इसी पक्के रास्ते पर चलकर हम पूरी दुनिया में अपने देश का परचम लहरा सकते हैं .
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