नर्मदा में जंगल की जमीन पर खेती को लेकर टकरावगुजरात के नर्मदा जिले में जंगल की जमीन पर खेती करने को लेकर चल रहा विवाद अब बड़ा होता जा रहा है. खोपी गांव में आदिवासी किसानों के खेती के अधिकार का मामला लगातार चर्चा में है. किसान लंबे समय से जिस जमीन पर खेती करने का दावा कर रहे हैं, उसे लेकर वन विभाग और किसानों के बीच मतभेद बना हुआ है. अब इस मामले में राजनीतिक समर्थन भी सामने आया है. भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद मनसुख वसावा और विधायक डॉ. दर्शना देशमुख भी आदिवासी किसानों के समर्थन में धरने पर बैठे.
खोपी गांव में जंगल की जमीन पर खेती करने को लेकर आदिवासी किसान अपने अधिकार की मांग कर रहे हैं. किसानों का कहना है कि वे लंबे समय से इस जमीन पर खेती करते आ रहे हैं और इसी खेती से उनके परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है. अब जमीन को लेकर पैदा हुए विवाद के बाद किसान अपने हक के लिए धरने पर बैठ गए हैं.
यह मामला ऐसे समय में और ज्यादा चर्चा में आ गया है, जब विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों और समस्याओं को लेकर आवाज उठा रहा है. किसानों की मांग है कि उनके मामले को गंभीरता से देखा जाए और जमीन पर उनके खेती के अधिकार को लेकर उचित फैसला किया जाए.
आदिवासी किसानों के आंदोलन को अब स्थानीय राजनीतिक नेताओं का भी समर्थन मिला है. BJP सांसद मनसुख वसावा और विधायक डॉ. दर्शना देशमुख किसानों के साथ धरने में शामिल हुए. दूसरे स्थानीय नेताओं ने भी किसानों की मांग का समर्थन किया.
सांसद मनसुख वसावा ने कहा कि आदिवासी किसानों को न्याय मिलना चाहिए. जिस जमीन पर किसान वर्षों से खेती करने की बात कह रहे हैं, उसके मामले में सही तरीके से जांच होनी चाहिए. उनका कहना है कि केवल वन विभाग के अधिकारियों की राय के आधार पर इस मामले में फैसला नहीं किया जाना चाहिए.
उनके मुताबिक, इस मामले में चुने हुए जनप्रतिनिधियों की बात को भी सुना जाना जरूरी है. उन्होंने कहा कि जमीन से जुड़े विवाद का समाधान बातचीत और मौके की सही जांच के बाद होना चाहिए, ताकि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो.
मनसुख वसावा ने इस मामले में सूरत और नर्मदा जिले के किसानों के बीच पैदा हुई स्थिति पर भी सवाल उठाया. उनका कहना है कि एक तरफ सूरत जिले के कुछ किसान खेती कर रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ नर्मदा जिले के किसानों को उसी क्षेत्र में खेती करने की अनुमति नहीं दी जा रही है.
सांसद ने कहा कि अगर दोनों तालुकाओं या स्थानीय क्षेत्रों के बीच किसी तरह का मतभेद है, तो मामले को और गंभीरता से समझने की जरूरत है. उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसी स्थिति में वन समिति की राय भी ली जानी चाहिए. साथ ही जमीन की स्थिति और किसानों के दावे की मौके पर जाकर जांच की जानी चाहिए.
वहीं, सूरत वन विभाग की ओर से इस मामले में अलग पक्ष सामने आया है. वन विभाग का कहना है कि जिस जमीन को लेकर विवाद चल रहा है, वह सूरत जिले की सीमा में आती है. विभाग के मुताबिक, जंगल की जमीन पर खेती करने के लिए तय नियमों का पालन करना जरूरी है.
वन विभाग का कहना है कि अगर ग्राम सभा का गठन हुआ है और नियमों के तहत अनुमति की प्रक्रिया पूरी होती है, तभी इस जमीन पर खेती की जा सकती है. यानी वन विभाग के लिए जमीन का रिकॉर्ड, क्षेत्र की सीमा और तय नियम महत्वपूर्ण हैं.
यही वजह है कि इस मामले में अब जमीन की सीमा का सवाल भी अहम हो गया है. जिस जमीन पर विवाद है, वह सूरत जिले में बताई जा रही है, लेकिन वहां खेती करने वाले किसान नर्मदा जिले के रहने वाले हैं. इसी वजह से मामला और पेचीदा हो गया है.
इस पूरे मामले की सबसे बड़ी वजह जमीन और किसानों के जिले को लेकर सामने आया अंतर है. जमीन सूरत जिले में होने की बात वन विभाग कह रहा है, जबकि खेती करने वाले किसान नर्मदा जिले के निवासी हैं. किसान लंबे समय से इस जमीन पर खेती करने का दावा कर रहे हैं.
अब सवाल यह है कि क्या केवल जमीन किस जिले में आती है, इसके आधार पर किसानों के दावे को खारिज किया जा सकता है या उनके पुराने खेती के रिकॉर्ड और दावों की भी जांच की जाएगी. इसी बात को लेकर किसान और उनके समर्थन में खड़े नेता मौके की जांच और निष्पक्ष फैसला चाहते हैं.
फिलहाल इस मामले में दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं. एक तरफ वन विभाग का कहना है कि जंगल की जमीन पर खेती के लिए नियमों का पालन जरूरी है. दूसरी तरफ आदिवासी किसान दावा कर रहे हैं कि वे इस जमीन पर लंबे समय से खेती करते आए हैं और उनका परिवार इस जमीन पर निर्भर है.
ऐसे में पूरे मामले की सही तस्वीर जमीन के रिकॉर्ड, पुराने दस्तावेजों, स्थानीय जानकारी और मौके की जांच से ही सामने आ सकती है. यही वजह है कि किसान और उनके समर्थन में आए जनप्रतिनिधि मामले की जांच कर उचित फैसला लेने की मांग कर रहे हैं.
नर्मदा के खोपी गांव का यह मामला अब सिर्फ किसानों और वन विभाग के बीच का विवाद नहीं रह गया है. इसमें स्थानीय जनप्रतिनिधियों के शामिल होने के बाद मामला राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण हो गया है.
आदिवासी किसानों का कहना है कि उन्हें उनकी खेती और जमीन के मामले में न्याय मिलना चाहिए. वहीं वन विभाग अपने नियमों और जमीन के रिकॉर्ड के आधार पर कार्रवाई की बात कर रहा है. ऐसे में अब सबकी नजर सरकार और प्रशासन के अगले फैसले पर है.
सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है, क्या जमीन की मौके पर जांच कराई जाती है और आदिवासी किसानों के पुराने खेती के दावों पर क्या फैसला होता है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा. फिलहाल खोपी गांव में जंगल की जमीन पर खेती का विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है और आदिवासी किसान अपने हक की मांग पर डटे हुए हैं. (नरेंद्र पेपरवाला की रिपोर्ट)
ये भी पढ़ें:
इथेनॉल की बढ़ी मांग, लेकिन मक्के का दाम धड़ाम! MSP से कम भाव ने बढ़ाई किसानों की चिंता
जुलाई में महंगी हुई शाकाहारी थाली, टमाटर-प्याज-आलू के दाम बढ़ने से बढ़ा रसोई का बजट
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today