
मक्के का दाम धड़ामएक तरफ सरकार मक्का से इथेनॉल बनाने को बढ़ावा देकर किसानों के लिए नए बाजार तैयार कर रही है, तो दूसरी तरफ मंडियों से सामने आए आंकड़े एक अलग कहानी बयां कर रहे हैं. दरअसल, 31 जुलाई 2026 के अखिल भारतीय मंडी थोक भाव के मुताबिक, मक्का का औसत भाव 2,034 रुपये प्रति क्विंटल रहा. वहीं, 2026-27 के लिए मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 2,400 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है. यानी किसानों को तय MSP से करीब 366 रुपये प्रति क्विंटल कम भाव मिल रहा है. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इथेनॉल की बढ़ती मांग का फायदा मक्का उगाने वाले किसानों की जेब तक क्यों नहीं पहुंच रहा?
केंद्र सरकार ने मई 2026 में खरीफ फसलों के लिए 2026-27 का MSP घोषित किया था. इसमें मक्के का MSP 2,410 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया, जबकि पिछले साल यह 2,400 रुपये था. यानी MSP में सिर्फ 10 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई. सरकार ने इसे उत्पादन लागत के मुकाबले 56 फीसदी मार्जिन के साथ तय किया है. लेकिन किसान के लिए असली सवाल यह है कि जब MSP 2,410 रुपये है तो मंडी में औसतन 2,034 रुपये क्यों मिल रहा है? यही वो अंतर है जो सरकारी आंकड़ों और किसान की जमीन पर मिलने वाली कीमत के बीच की समस्या को सामने लाता है. हालांकि, मंडी का थोक औसत भाव और MSP अलग-अलग चीजें हैं और हर किसान को हर मंडी में एक ही भाव नहीं मिलता. फिर भी औसतन MSP से 15 फीसदी से ज्यादा नीचे भाव किसानों के लिए चिंता का विषय जरूर है.
मान लीजिए किसी किसान के पास 50 क्विंटल मक्का है और उसे औसतन 2,034 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिलता है. MSP 2,400 रुपये के मुकाबले अंतर 366 रुपये प्रति क्विंटल है. मतलब 50 क्विंटल पर यह अंतर करीब 18,300 रुपये हुआ. ऐसे में अगर किसान की मात्रा इससे ज्यादा है तो नुकसान भी बढ़ता जाएगा. मक्का की खेती में बीज, खाद, सिंचाई, कीटनाशक, मजदूरी, कटाई और परिवहन का खर्च पहले ही किसान को उठाना पड़ता है. ऐसे में MSP से नीचे बिक्री होने पर उसकी कमाई पर सीधा असर पड़ता है.

इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को FCI के जरिए सस्ता चावल उपलब्ध होने से मक्का की खरीद पर असर पड़ रहा है. दरअसल, इथेनॉल उत्पादन के लिए कंपनियां मक्का और चावल दोनों का इस्तेमाल कर रही है, जब कंपनियों को सरकारी चावल रियायती दरों पर मिल जाता है, तो वो बड़े पैमाने पर मक्के की खरीद नहीं करते हैं. इसका सीधा असर मक्का की मांग और मंडी भाव पर पड़ रहा है. किसानों को उम्मीद थी कि इथेनॉल उद्योग में मक्का की बढ़ती मांग से उनकी फसल को बेहतर कीमत मिलेगी, लेकिन सस्ते सरकारी चावल की उपलब्धता के कारण कंपनियों की मक्का खरीद कम होने से बाजार में दबाव बढ़ गया है, ऐसे में मक्का किसान MSP से नीचे भाव मिलने की स्थिति में परेशान हैं.
मक्का का इस्तेमाल केवल पशु चारे या खाद्य पदार्थों में ही नहीं, बल्कि इथेनॉल जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में भी बढ़ रहा है. ऐसे में मांग बढ़ने के बावजूद किसानों को कम कीमत मिलना नीति- निर्माताओं पर सवाल खड़े करता है. सरकार के लिए चुनौती सिर्फ MSP घोषित करने की नहीं, बल्कि MSP भाव के आसपास खरीद, बाजार तक बेहतर पहुंच और किसानों को वैकल्पिक खरीदार उपलब्ध कराने की भी है. खासकर उन इलाकों में जहां मंडी भाव लगातार MSP से नीचे चल रहा है. किसानों के लिए इथेनॉल एक बड़ा बाजार जरूर बन सकता है, लेकिन इस बाजार का फायदा तभी माना जाएगा जब बढ़ती मांग का असर मक्का उगाने वाले किसान की आमदनी पर भी दिखाई दे. बता दें कि सरकार के मुताबिक, 2025-26 में मक्का आधारित इथेनॉल की खरीद कीमत करीब 71.86 रुपये प्रति लीटर है.
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि इथेनॉल नीति का फायदा किसानों और कंपनियों को बराबर नहीं मिल रहा है. किसानों ने इथेनॉल की बढ़ती मांग को देखते हुए मक्का की खेती बढ़ाई, लेकिन कई जगह उन्हें फसल का दाम MSP से नीचे मिल रहा है. ऐसे में सरकार के सामने बड़ा सवाल है कि जब मक्का को इथेनॉल के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है, तो किसानों को MSP का भरोसा क्यों नहीं मिल रहा? मक्का की MSP पर खरीद सुनिश्चित करने और किसानों को बोनस या लाभ के जरिए इथेनॉल से होने वाले फायदे में हिस्सेदारी देने की जरूरत है. तभी इथेनॉल नीति का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंच सकेगा.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today