Handloom Dayभारत की पुरानी और खूबसूरत हथकरघा परंपरा को बढ़ावा देने के लिए NABARD ने मुंबई में तीन दिवसीय नेशनल हैंडलूम डे प्रदर्शनी और बिक्री कार्यक्रम का आयोजन किया. 5 से 7 अगस्त तक चले इस कार्यक्रम में देश के अलग-अलग राज्यों के बुनकरों और कारीगरों ने अपने हाथ से बनाए उत्पादों को प्रदर्शित किया. प्रदर्शनी को लोगों का अच्छा रिस्पॉन्स मिला और इस दौरान 67 लाख रुपये से ज्यादा के हथकरघा उत्पादों की बिक्री हुई.
मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स स्थित NABARD के मुख्यालय में आयोजित इस प्रदर्शनी में 14 राज्यों की 15 अलग-अलग हथकरघा परंपराओं को जगह दी गई. यहां लोगों को देश के अलग-अलग हिस्सों में बनाई जाने वाली साड़ियों, कपड़ों, शॉल और दूसरे हथकरघा उत्पादों को देखने और खरीदने का मौका मिला.
प्रदर्शनी में महाराष्ट्र की पैठणी, तेलंगाना की पोचमपल्ली इकत, राजस्थान की कोटा डोरिया, ओडिशा की संबलपुरी, बिहार का भागलपुर सिल्क, पश्चिम बंगाल की कांथा स्टिच और गुजरात के कच्छ शॉल जैसे उत्पाद शामिल रहे. इसके अलावा आंध्र प्रदेश की वेंकटगिरी, तमिलनाडु की अरनी सिल्क, केरल की बलरामपुरम, उत्तर प्रदेश का मुबारकपुर हैंडलूम, हरियाणा के अंबाला हैंडलूम, मध्य प्रदेश का बाघ, झारखंड की भगैया सिल्क और कर्नाटक के उत्तरीया जैसे उत्पाद भी प्रदर्शनी का हिस्सा रहे.
इनमें से कई उत्पादों को GI टैग भी मिला हुआ है. GI यानी भौगोलिक संकेतक टैग किसी खास जगह से जुड़े और वहां की पहचान माने जाने वाले उत्पाद की असली पहचान को सुरक्षित रखने में मदद करता है.
तीन दिनों तक चली इस प्रदर्शनी का एक बड़ा उद्देश्य बुनकरों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचाना था. आमतौर पर छोटे कारीगरों और बुनकरों को अपने उत्पाद बेचने के लिए बिचौलियों पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे आयोजनों से उन्हें सीधे ग्राहकों और खरीदारों से जुड़ने का मौका मिलता है.
प्रदर्शनी में लोगों ने हथकरघा उत्पादों में दिलचस्पी दिखाई और 67 लाख रुपये से अधिक की बिक्री दर्ज की गई. इससे पता चलता है कि लोग अब पारंपरिक और हाथ से बने भारतीय उत्पादों को खरीदने में रुचि ले रहे हैं.
प्रदर्शनी में हिस्सा लेने वाले कारीगरों को प्रमाण पत्र भी दिए गए. इसके अलावा बेहतर प्रदर्शन करने वाले तीन स्टॉल को ट्रॉफी देकर सम्मानित किया गया.
प्रदर्शनी के दौरान 6 अगस्त को एक बायर-सेलर मीट भी आयोजित की गई. इसमें बुनकरों, कारीगरों और शहरी खरीदारों को सीधे बातचीत करने का मौका मिला.
इस बैठक में खरीदारों ने अपनी पसंद और बाजार की मांग के बारे में जानकारी दी. वहीं कारीगरों ने भी अपनी समस्याएं और जरूरतें बताईं. इस बातचीत का उद्देश्य सिर्फ तत्काल बिक्री बढ़ाना नहीं था, बल्कि बुनकरों और खरीदारों के बीच लंबे समय तक व्यापारिक संबंध बनाना भी था.
इस तरह की पहल से कारीगरों को यह समझने में मदद मिलती है कि बाजार में किस तरह के उत्पादों की मांग है और ग्राहक क्या पसंद कर रहे हैं.
आज के समय में सिर्फ बाजार या प्रदर्शनी में सामान बेचना काफी नहीं है. इंटरनेट और ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़ते चलन को देखते हुए बुनकरों के लिए डिजिटल मार्केटिंग की जानकारी भी जरूरी हो गई है. इसी को ध्यान में रखते हुए 7 अगस्त को ONDC और MyStore को लेकर एक खास जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया. इसमें बुनकरों को ऑनलाइन कारोबार से जुड़ी जरूरी जानकारी दी गई.
उन्हें बताया गया कि अपने उत्पादों को ऑनलाइन कैसे लिस्ट किया जा सकता है, अच्छी तस्वीरें और कैटलॉग कैसे तैयार किए जाते हैं, ऑनलाइन ब्रांड कैसे बनाया जा सकता है और सोशल मीडिया के जरिए ग्राहकों तक कैसे पहुंचा जा सकता है. इसके साथ ही ऑनलाइन बिक्री, स्टॉक संभालने और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कारोबार शुरू करने की जानकारी भी दी गई. इसका फायदा यह हो सकता है कि किसी गांव या छोटे शहर में रहने वाला बुनकर अपने उत्पादों को सिर्फ आसपास के बाजार तक सीमित न रखकर देश के दूसरे हिस्सों में भी बेच सके.
कार्यक्रम के दौरान GI विशेषज्ञ और पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने भी बुनकरों और कारीगरों से बातचीत की. उन्होंने GI रजिस्ट्रेशन के महत्व के बारे में जानकारी दी. GI टैग से किसी खास क्षेत्र में बनने वाले उत्पाद की पहचान मजबूत होती है. इससे ग्राहकों को यह समझने में मदद मिलती है कि उत्पाद वास्तव में उसी क्षेत्र की पारंपरिक कला और तकनीक से जुड़ा है. डॉ. रजनीकांत ने कारीगरों को Authorised User Registration के बारे में भी जानकारी दी. इससे GI टैग वाले उत्पादों की असली पहचान बनाए रखने और बाजार में उनकी पहचान बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
हथकरघा क्षेत्र को बढ़ावा देने में NABARD लंबे समय से काम कर रहा है. NABARD के मुताबिक, उसके सहयोग से अब तक 43 हथकरघा उत्पादों को GI रजिस्ट्रेशन मिल चुका है.
इसके अलावा बुनकरों और ग्रामीण कारोबारियों को एक साथ जोड़ने के लिए देशभर में हथकरघा क्षेत्र में 41 रूरल एंटरप्राइज प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (REPO) बनाए गए हैं. इनके जरिए छोटे उत्पादकों को एक साथ आकर कारोबार और बाजार से जुड़ने में मदद मिलती है.
NABARD बुनकरों को देश के बड़े मेलों और प्रदर्शनियों में भी हिस्सा लेने का अवसर देता है. इनमें महालक्ष्मी सरस, सूरजकुंड इंटरनेशनल क्राफ्ट्स मेला और ग्रामीण भारत महोत्सव जैसे आयोजन शामिल हैं.
NABARD ने हाल ही में 'Emporium' पहल भी शुरू की है. इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बनाए जाने वाले असली और पारंपरिक उत्पादों को एक जगह प्रदर्शित करने और बेचने के लिए बेहतर मंच उपलब्ध कराना है.
इस तरह की पहल से ग्रामीण कारीगरों और छोटे कारोबारियों को नए ग्राहकों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है. साथ ही उनके उत्पादों को बड़े बाजार में पहचान मिलने की संभावना भी बढ़ती है.
हर साल 7 अगस्त को नेशनल हैंडलूम डे यानी राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है. यह दिन भारत की सदियों पुरानी बुनाई की परंपरा और देश के लाखों बुनकरों के योगदान को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है.
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का संबंध 1905 के स्वदेशी आंदोलन से भी है. उस समय देश में बने सामान को अपनाने और विदेशी उत्पादों के बहिष्कार पर जोर दिया गया था.
आज भी हथकरघा सिर्फ कपड़ा बनाने का काम नहीं है. यह देश की संस्कृति और कई ग्रामीण परिवारों की रोजी-रोटी से जुड़ा हुआ है. हथकरघा क्षेत्र में बड़ी संख्या में महिलाएं भी काम करती हैं. ऐसे में इस क्षेत्र को बाजार मिलने से ग्रामीण परिवारों की कमाई और रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं.
मुंबई में आयोजित NABARD की तीन दिवसीय प्रदर्शनी ने एक बार फिर दिखाया कि भारत की पारंपरिक बुनाई कला की मांग आज भी बनी हुई है. 67 लाख रुपये से ज्यादा की बिक्री और 14 राज्यों की 15 हथकरघा परंपराओं की भागीदारी इस बात का संकेत है कि अगर बुनकरों को सही बाजार, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ग्राहकों से सीधा जुड़ने का मौका मिले, तो उनकी कला के साथ-साथ उनकी कमाई को भी बढ़ाया जा सकता है.
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