रहस्यमय कहानी के जरिए तैरते द्वीपों पर रहने वाले मछुआरों का जीवंत चित्रणउत्तर पूर्व भारत की संस्कृति और रहन सहन को मुख्य धारा के सिनेमा में कम ही जगह मिली है, लेकिन हाल के सालों में वहां के फ़िल्मकारों ने अनोखी और भावप्रवण कहानियों के ज़रिए अपने समाज, संस्कृति और मुद्दों पर कुछ बेहतरीन फिल्में बनाई हैं. हौबाम पबन कुमार मणिपुर के ऐसे ही एक निर्देशक हैं जिन्होने अपनी डॉक्युमेंट्री और फिल्मों के माध्यम से आम मणिपुरी निवासियों के सरोकारों को बहुत खूबसूरती से पेश किया है.
मूलतः डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाने वाले हौबाम पबन ने 2016 में पहली फीचर फिल्म बनाई ‘लोकताक लाइरेम्बी’ यानी ‘लोकताक की देवी’. यहां यह बताना ज़रूरी है कि लोकताक है क्या? मणिपुर के भूगोल से वाकिफ लोग लोकताक झील के बारे में जरूर जानते होंगे. यह अनोखी झील अपने तैरते हुए द्वीपों, ‘फुमदी’ के लिए विश्व प्रसिद्ध है. यह दक्षिण एशिया में ताज़े पानी की सबसे बड़ी झील है. और यहां पर तैरते हुए द्वीपों में से एक पर स्थित है केयबुल लामजाओ नेशनल पार्क- यह दुनिया में एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान है.
इस झील के आसपास और इस पर तैरते हुए द्वीपों में रहते हैं हजारों मछुआरे, जिनकी आजीविका का मुख्य स्रोत इसी झील से मछली पकड़ना है. राज्य में हिंसा को रोकने और विकास कार्यों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने इस झील के कुछ द्वीपों से लोगों को हटाना शुरू किया था. नतीजतन बहुत से मछुआरों की ज़िंदगियां उलट-पुलट हो गईं. कुछ ने तो आत्महत्या तक कर ली. इस पूरे प्रकरण ने वहां के स्थानीय निवासियों पर गहरा असर डाला.
सुधीर नाओरोएबाम की लघुकथा ‘गन’ पर आधारित फिल्म ‘लोकताक लाइरेम्बी’ ऐसे ही एक मछुआरे की कहानी है. यह मछुआरा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ एक फुमदी पर रहता है. पत्नी चाहती है कि इस फुमदी को सरकार द्वारा हटाए जाने से पहले ही उन्हें झील के किनारे जाकर अपनी छोटी सी झोपड़ी बना लेना चाहिए. जबकि वह मछुआरा जो बेरोजगारी और गरीबी के कारण अवसाद के कगार पर है, फुमदी नहीं छोडना चाहता क्योंकि वह जानता है कि झील के किनारे भी उसे काम नहीं मिलेगा और उसके परिवार को निर्धनता के कारण अपमानित होना पड़ेगा.
वह अपना ज़्यादा वक्त अपनी झोंपड़ी में ही गुजरता है, जबकि उसकी पत्नी घर के कामकाज के साथ मछली पकड़ने का काम करते हुए भी दिखायी गई है. लोकताक झील उनके लिए एक पवित्र देवी है, जिसकी वे अपने तरह से पूजा अर्चना भी करते हैं. ऐसे ही एक दिन, इस मछुआरे को फुमदी में ही छिपी हुई एक पिस्तौल मिलती है. इस पिस्तौल से वह भयाक्रांत होता है और इसके प्रति आकर्षित भी. वह इस पिस्तौल को अपने घर ले आता है. अब वह उसके अकेलेपन में एक उत्सुकता का केंद्र बन जाती है. यह उसे एक ताकत और सत्ता का एहसास भी देती है.
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लेकिन वह नोटिस करता है कि जब से वह पिस्तौल लेकर घर आया है, तब से एक डोंगी में बैठी स्त्री लगातार उस पर नज़र रख रही है. फिर वह देखता है कि वह स्त्री उसका पीछा कर रही है. वह जहां जाता है, वह रहस्यमयी स्त्री वहीं उस पर नज़र रखे हुए है. उसमें आए इस अजीब से बदलाव को उसकी पत्नी भी देखती है और इससे पीछा छुड़ाने के लिए वे गांव के ओझा की मदद लेते हैं. ओझा की झाड़-फूंक के दौरान ही यह पता चलता है कि इस मछुआरे का नाम टोंबा है.
एक रात अचानक बाहर कुछ अजीब आवाज़ से उसकी नींद टूटती है, इस एहसास से कि कोई उसे देख रहा है. हो ना हो, यह वही रहस्यमयी स्त्री है. यह सोच कर टोंबा अपनी पिस्तौल साथ लेकर बाहर आता है. उसे फिर वही डोंगी में बैठी स्त्री दिखाई देती है. वह अपनी नाव में बैठ कर उसका पीछा करता है और जब वह स्त्री उसके हाथ नहीं आती तो खड़ा होकर वह अपनी पिस्तौल से निशाना साधता है और उस स्त्री पर दो गोलियां दागता है. वह स्त्री अपनी डोंगी में ढेर हो जाती है.
इस हिंसा से वह अवाक और निस्तब्ध है और मानो सम्मोहित सी अवस्था में अपनी झोपड़ी में वापिस आ जाता है. अपनी सोई हुई पत्नी के करीब बैठता ही है कि उसे फिर से घर के बाहर कुछ आवाज़ सुनाई देती है. इस सदमे, भ्रम और दहशत की अवस्था में वह दरवाजा खोलता है तो उसी स्त्री को अपने सामने खड़ा पाता है, जिस पर उसने दो गोलियां दागी थीं. कुछ क्षण के लिए वे एक दूसरे के सामने स्थिर खड़े रहते हैं, उनकी नज़रें मिलती हैं और वह स्त्री अपनी हथेली टोंबा के आगे फैला देती है, जिसमें पिस्तौल की वही दो गोलियां रखी हैं. इस रहस्यमय मोड़ पर कहानी खत्म होती है.
फिल्म के स्थिर शॉट्स, चुप्पी, कम से कम संवाद कहानी के रहस्यपूर्ण माहौल को बहुत प्रभावपूर्ण बनाते हैं. निर्देशक हौबाम पबन ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि वे पार्श्व संगीत को फिल्म में इस्तेमाल नहीं करना चाहते थे क्योंकि “संगीत बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावी होता है और वह फिल्म माहौल और किरदारों पर हावी हो जाता है”.‘लोकताक लाइरेम्बी’ की खासियत यह है कि फुमदी पर रहने वाले मछुआरों की दुर्दशा और घर और आजीविका खत्म हो जाने की असुरक्षा को एक रहस्यमय तरीके से दिखाया है, जो फिल्म को एक मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी ले जाता है.
वह रहस्यपूर्ण स्त्री न सिर्फ लोकताक झील का प्रतीक बन कर उभरती है, बल्कि वह उन सभी भयों और असुरक्षाओं की भी प्रतिछवि है जिनसे यहां के मछुआरे त्रस्त हैं. पिस्तौल से टोंबा का अजीब सा संबंध आम आदमी का हिंसा और सत्ता के प्रति आकर्षण और भय दोनों दर्शाता है. पिस्तौल पाकर टोंबा का रवैया जिस तरह बदलता है, जिस तरह वह ताकत के प्रति आकर्षित है और उसमें निहित हिंसा से भयभीत भी, फिल्म बगैर किसी संवाद के इसे बहुत सशक्तता से दिखाती है.
पांच साल लगे थे इस फिल्म को बनाने में. खास बात यह है कि इस फिल्म में कोई अभिनेता नहीं है. टोंबा और उसकी पत्नी वाकई लोकताक झील की एक फुमदी पर रहने वाले दंपत्ति हैं. इस फीचर फिल्म से पहले निर्देशक पबन कुमार ने इन्हीं मछुआरों पर एक डॉक्युमेंट्री बनाई थी. इस दौरान यहां के निवासी पबन कुमार को जानने लगे और कैमरा से भी परिचित हो गए.
तब निर्देशक इस कहानी को लेकर इन स्थानीय निवासियों के पास गए और उन्हें अपने निर्देशानुसार ‘अभिनय’ करने और संवाद बोलने के लिए कहा. 2016 में रिलीज़ हुई इस फिल्म का बजट था मात्र ग्यारह लाख रुपये. इसे वर्ष 2017 में पर्यावरण संरक्षण पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला और यह उत्तर पूर्व भारत की पहली फिल्म थी जिसे बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया.
2016 के मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया. फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर प्रतिष्ठित बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ और इस तरह विश्व फिल्म पटल पर हौबाम पबन कुमार उत्तर पूर्वी भारत के लोगों के सरोकारों का मुख्य स्वर बन कर उभरे. ‘लोकताक लाइरेम्बी’ उन चंद फिल्मों में से एक है जिसे सुदूर देश में विकास और हिंसा की भेंट चढ़ते मछुआरों के परंपरागत जीवन पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ के तौर पर जाना जाता रहेगा.
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