कोरिया 'जल संरक्षण मॉडल' को मिला राष्ट्रीय पहचान, PM मोदी ने की तारीफ

कोरिया 'जल संरक्षण मॉडल' को मिला राष्ट्रीय पहचान, PM मोदी ने की तारीफ

PM रेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 132वें एपिसोड में छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के अभिनव जल संरक्षण मॉडल का जिक्र किया है.  उन्होंने बताया कि किसानों ने अपने खेतों में छोटे रिचार्ज तालाब और सोखता गड्ढे बनाकर बारिश के पानी को खेतों में ही रोकने का प्रभावी उपाय किया है, जिससे भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है.

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कोरिया 'जल संरक्षण मॉडल' को मिला राष्ट्रीय पहचान, PM मोदी ने की तारीफPM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 132वें एपिसोड में छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के अभिनव जल संरक्षण मॉडल का जिक्र किया है, जिसके बाद यह जिला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है. किसानों और ग्रामीण समुदाय की सक्रिय भागीदारी से विकसित '5 प्रतिशत मॉडल' ने न केवल जल संकट का समाधान प्रस्तुत किया है, बल्कि सतत विकास की दिशा में एक मजबूत उदाहरण भी स्थापित किया है. PM मोदी ने अपने संबोधन में कोरिया जिले के किसानों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे नवाचार बड़े बदलाव ला सकते हैं. उन्होंने बताया कि किसानों ने अपने खेतों में छोटे रिचार्ज तालाब और सोखता गड्ढे बनाकर बारिश के पानी को खेतों में ही रोकने का प्रभावी उपाय किया है, जिससे भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है.

5 प्रतिशत मॉडल- छोटे प्रयास, बड़ा परिणाम

कोरिया जिले में लागू '5 प्रतिशत मॉडल' के तहत किसानों ने अपनी भूमि का पांच प्रतिशत हिस्सा जल संरचनाओं के निर्माण के लिए समर्पित किया. इस पहल में छोटे-छोटे सीढ़ीदार तालाब, डबरियां और सोखता गड्ढे बनाए गए, जिससे बारिश के पानी का संरक्षण संभव हो पाया. इस मॉडल को 1200 से अधिक किसानों ने अपनाया, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं.

जनभागीदारी बनी सफलता की कुंजी

इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता जनभागीदारी रही. महिलाओं ने 'नीर नायिका' और युवाओं ने 'जल दूत' के रूप में जिम्मेदारी निभाई. ग्राम सभाओं के माध्यम से योजनाओं का विकेंद्रीकरण किया गया, जिससे स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने और क्रियान्वयन की प्रक्रिया मजबूत हुई. इससे समुदाय स्वयं इस अभियान का नेतृत्वकर्ता बन गया.

भूजल स्तर बढ़ाने में अच्छी कामयाबी

साल 2025 में इस अभियान के तहत करीब 2.8 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी जमीन के नीचे जमा किया गया, जो सैकड़ों बड़े तालाबों के बराबर है. छत्तीसगढ़ जल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, जिले में भूजल स्तर करीब 5.41 मीटर तक बढ़ गया. इससे साफ है कि यह तरीका जमीन के नीचे पानी बढ़ाने में काफी असरदार साबित हुआ है.

वर्षा अधिक, फिर भी जल संकट-अब समाधान

कोरिया जिले में हर साल करीब 1370 मिमी बारिश होती है, लेकिन जमीन की बनावट ऐसी है कि पानी जल्दी बहकर निकल जाता था. इसी वजह से जमीन के नीचे पानी जमा नहीं हो पाता था. इस समस्या को दूर करने के लिए ‘आवा पानी झोंकी’ अभियान शुरू किया गया, जिसके तहत बारिश के पानी को रोकने और उसे जमीन में उतारने के लिए ठोस कदम उठाए गए.

मनरेगा और सामुदायिक प्रयासों का परिणाम

2026 तक जिले में 20,612 से ज्यादा जल संरक्षण के काम पूरे हो चुके हैं या चल रहे हैं.इनमें से 17,229 काम गांव और समाज के स्तर पर किए गए हैं, जबकि 3,383 काम मनरेगा के तहत बनाए गए हैं. इससे लोगों को रोजगार भी मिला और पानी बचाने के काम को भी तेजी मिली.

राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान

इस मॉडल को केंद्रीय स्तर पर भी सराहना प्राप्त हुई है और इसे अन्य राज्यों में लागू करने योग्य बताया गया है. इससे यह स्पष्ट है कि कोरिया मॉडल भविष्य में देश के अन्य जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए मार्गदर्शक बन सकता है. इसके पहले भी पीएम मोदी इस अपने मन की बात कार्यक्र में इस क्षेत्र की सोनहनी शहद का जिक्र कर चुके हैं.

प्रशासन का दृष्टिकोण-हर बूंद की सुरक्षा

जिला प्रशासन का कहना है कि इस सफलता की सबसे बड़ी वजह लोगों की भागीदारी है. जब लोग खुद पानी बचाने का जिम्मा लेते हैं, तो इसका असर लंबे समय तक और बड़े स्तर पर दिखाई देता है. प्रशासन का लक्ष्य है कि हर बूंद पानी को बचाकर भविष्य की पीढ़ियों के लिए पानी की कमी न होने दी जाए.

किसानों के प्रयास से यह मॉडल राष्ट्रीय फलक पर

कलेक्टर चन्दन त्रिपाठी ने इस सफलता का श्रेय जिले के ग्रामीणों, किसानों और जनप्रतिनिधियों को दिया. उन्होंने कहा कि सबके मिलकर काम करने की वजह से ही यह मॉडल देशभर में पहचान बना पाया है. उन्होंने ये भी बताया कि कोरिया जिले का यह जल संरक्षण मॉडल दिखाता है कि जब अच्छी योजना, प्रशासन का सही नेतृत्व और लोगों का साथ मिलता है, तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल निकाला जा सकता है. यह पहल अब पानी बचाने को एक बड़े जन आंदोलन में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रही है. (धीरेन्द्र विश्वकर्मा की रिपोर्ट)

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