सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका पर सुनवाई की मांग (File Photo: ITG)नई दिल्ली में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू करने की मांग उठी. यह मामला आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) और जीन-संपादित फसलों की रिलीज से जुड़ा है. याचिकाकर्ता अरुणा रोड्रिग्स की ओर से दायर अवमानना याचिका में आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और 23 जुलाई 2024 के फैसले का जानबूझकर और सुनियोजित उल्लंघन किया है.
यह अवमानना याचिका वर्ष 2005 में दायर जनहित याचिका (PIL) का हिस्सा है. याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले निर्देश दिया था कि किसी भी GM फसल को जारी करने से पहले केंद्र सरकार एक व्यापक राष्ट्रीय नीति तैयार करे. यह नीति विशेषज्ञों, राज्य सरकारों और सभी संबंधित पक्षों से परामर्श के बाद बनाई जानी थी. आरोप है कि इस प्रक्रिया को पूरा किए बिना ही कुछ GM और जीन-संपादित किस्मों को जारी कर दिया गया.
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ के समक्ष कहा कि अवमानना याचिका काफी पहले दायर हो चुकी है, लेकिन अब तक इसे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया गया है. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह इस मामले को देखेंगे.
अवमानना याचिका में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव तनमय कुमार, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तत्कालीन सचिव देवेश चतुर्वेदी और जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) के अध्यक्ष अमनदीप गर्ग को पक्षकार बनाया गया है.
याचिका में हर्बिसाइड टॉलरेंट (HT) बासमती चावल की किस्म ‘RobiNOweed’ और जीन-संपादित धान किस्म ‘कमला’ (DRR Rice 100) समेत अन्य किस्मों की व्यावसायिक रिलीज को “गैरकानूनी” बताया गया है. याचिका के अनुसार, मई 2024 और मई 2025 में इन किस्मों की रिलीज ऐसे समय में हुई, जब सुप्रीम कोर्ट या तो अपना फैसला सुरक्षित रख चुका था या उसने स्पष्ट निर्देश दिया था कि राष्ट्रीय नीति बनने तक किसी GM फसल को जारी नहीं किया जाएगा.
याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2016 और 2017 के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को ‘गंभीर आश्वासन’ दिया था कि किसी भी GM फसल को पर्यावरणीय मंजूरी नहीं दी जाएगी. इसके बावजूद बीजों की बिक्री और व्यावसायिक उपयोग शुरू कर दिया गया, जिससे न्यायिक प्रक्रिया का ‘मजाक’ बना है.
याचिका में दावा किया गया है कि HT धान की रिलीज से भारत के धान जर्मप्लाज्म को अपूरणीय नुकसान हो सकता है. इसमें कहा गया है कि भारत में धान की 80 हजार से अधिक विशिष्ट किस्में मौजूद हैं और देश को चावल की उत्पत्ति का प्रमुख केंद्र माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तकनीकी विशेषज्ञ समिति (TEC) ने भी ऐसे क्षेत्रों में HT फसलों पर पूर्ण प्रतिबंध की सिफारिश की थी.
याचिका में कहा गया है कि HT धान की वजह से भारत की गैर-GMO बासमती चावल निर्यात पहचान प्रभावित हो सकती है. भारत का यह व्यापार 12 अरब डॉलर यानी करीब 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बताया गया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि जीन-संपादित और HT किस्मों से पारंपरिक धान किस्मों के दूषित होने का खतरा बढ़ सकता है.
याचिका में 2012 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तकनीकी विशेषज्ञ समिति (TEC) की 2013 की रिपोर्ट का उल्लेख किया गया है. रिपोर्ट में भारत में HT फसलों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई थी, खासकर उन फसलों में जिनके लिए भारत जैव विविधता या उत्पत्ति का केंद्र है, जैसे धान और सरसों. रिपोर्ट में HT फसलों को पर्यावरणीय रूप से अस्थिर, सामाजिक-आर्थिक रूप से नुकसानदेह और भारतीय कृषि परिस्थितियों के लिए वैज्ञानिक रूप से असुरक्षित बताया गया था.
याचिका में कहा गया है कि TEC रिपोर्ट में राउंडअप (Roundup) जैसे हर्बिसाइड और उनसे जुड़े रसायनों को संभावित कैंसरकारी माना गया था. इसके बावजूद केंद्र सरकार ने HT फसलों की रिलीज की दिशा में कदम बढ़ाए. याचिका के अनुसार, 24 मई 2024 को जब सुप्रीम Court ने फैसला सुरक्षित रखा हुआ था, तब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने HT बासमती किस्म ‘RobiNOweed’ की व्यावसायिक रिलीज की घोषणा कर दी. इसके अलावा 4 मई 2025 को कृषि मंत्री की मौजूदगी में DRR Rice 100 (Kamla) और Pusa DST Rice 1 जैसी जीन-संपादित धान किस्मों को भी जारी किया गया.
याचिका में कहा गया है कि 23 जुलाई 2024 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि GM फसलों को लेकर राष्ट्रीय नीति तैयार किए बिना ऐसी किसी फसल को जारी नहीं किया जाना चाहिए. अदालत ने केंद्र सरकार को अनुसंधान, खेती, व्यापार और वाणिज्य से जुड़ी GM फसलों पर व्यापक नीति बनाने का निर्देश दिया था. गौरतलब है कि 23 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने GM सरसों की पर्यावरणीय रिलीज को मंजूरी देने संबंधी केंद्र सरकार के 2022 के फैसले पर विभाजित फैसला सुनाया था. हालांकि, अदालत ने सर्वसम्मति से यह कहा था कि GM फसलों पर देश में एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति बनाना जरूरी है. (पीटीआई)
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