सरसों किसानों की हुई बल्ले-बल्ले, MSP से ज्यादा हुआ मंडी भाव...ईरान-अमेर‍िका युद्ध से बाजार में तेजी

सरसों किसानों की हुई बल्ले-बल्ले, MSP से ज्यादा हुआ मंडी भाव...ईरान-अमेर‍िका युद्ध से बाजार में तेजी

ईरान‑इजरायल युद्ध से विदेशी तेल सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे भारत में खाद्य तेल महंगे हो रहे हैं. लेकिन तिलहन और सरसों किसानों को रिकॉर्ड भाव मिल रहे हैं. ऐसा कम ही होता है जब सरकारी खरीद के समय उपज के भाव किसानों को अच्छे मिलें.

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सरसों किसानों की हुई बल्ले-बल्ले, MSP से ज्यादा हुआ मंडी भाव...ईरान-अमेर‍िका युद्ध से बाजार में तेजी देश में तिलहन फसलों के भाव अच्छे मिल रहे हैं

ईरान–इजरायल संघर्ष ने दुनिया भर में कई आर्थिक चुनौतियां पैदा कर दी हैं. इसका असर भारत पर भी दिखने लगा है. सबसे पहले कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे पेट्रोल–डीजल की लागत बढ़ी है. अब इसका असर लोगों पर आना शुरू हो गया है. इसी बीच खाद्य तेलों के दाम भी चुपचाप चढ़ने लगे हैं, जबकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा बाहर से खरीदता है, खासकर पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल. युद्ध से इसकी आपूर्त‍ि पर भी असर पड़ा है, ज‍िससे उसके दाम में इजाफा हुआ है. ऐसे में भारत में सरसों और सोयाबीन की खेती करने वाले क‍िसानों को फायदा म‍िलने की उम्मीद जग गई है. मंड‍ियों में इसका असर भी द‍िखना शुरू हो गया है. आमतौर पर फसल की कटाई के समय सरसों की कीमत बाजार में एमएसपी से कम हो जाती थी. लेक‍िन इस बार एमएसपी से ज्यादा है. इस समय सरसों का एमएसपी 5950 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल है, जबक‍ि बाजार भाव 6468.48 रुपये पहुंच गया है. 

सबसे पहले समझते हैं क‍ि खाद्य तेलों के दाम में युद्ध की वजह से क‍ितना इजाफा हुआ है. उपभोक्ता मामलों के विभाग के अनुसार, सिर्फ एक महीने—24 फरवरी से 24 मार्च 2026 के बीच—सूरजमुखी तेल 175 से बढ़कर 181 रुपये किलो हो गया. इसी अवधि में पाम तेल 5 रुपये बढ़कर 141 रुपये और सोयाबीन तेल 4 रुपये महंगा हुआ. मूंगफली, वनस्पति और सरसों तेल के दाम भी 3 रुपये प्रति किलो चढ़ गए. इन बढ़ते दामों ने आम परिवारों के किचन बजट पर दबाव बढ़ा दिया है, और आने वाले दिनों में यह बोझ और भारी पड़ सकता है.

किसानों के लिए राहत

हालांकि इन तमाम मुश्किलों के बीच किसानों के लिए एक राहतभरी खबर है. तिलहन फसलों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं. इसका कारण है खाद्य तेलों का महंगा और आयात प्रभाव‍ित होने की वजह से उपलब्धता में कमी. भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक है और पाम तेल का 41% और सोयाबीन का लगभग 35% हिस्सा विदेशों से आता है. इंडोनेशिया, मलेशिया, यूक्रेन, रूस, अर्जेंटीना और ब्राजील इस सप्लाई के मुख्य सोर्स हैं. भले ही इन देशों का सीधा संबंध होर्मुज संकट से न हो, लेकिन शिपिंग लागत बढ़ने और वैश्विक सप्लाई चेन बिगड़ने से तेल महंगा होना तय है.

इस महंगाई का एक दिलचस्प असर सरसों के तेल पर पड़ा है. आमतौर पर सरसों के तेल में पाम तेल की मिलावट की जाती है, क्योंकि मांग अधिक और घरेलू उत्पादन सीमित होता है. इस मिलावट पर कोई सख्त रोक भी नहीं है. लेकिन जब पाम और सोयाबीन तेल की सप्लाई घट गई, तो व्यापारी मिलावट करने के लिए भी तेल नहीं जुटा पा रहे हैं. मजबूरी में उन्हें शुद्ध सरसों तेल बेचना पड़ रहा है, जिससे कीमतें और बढ़ गई हैं. इसी वजह से सरसों की खरीद तेज हुई है और किसानों को बेहतर भाव मिल रहे हैं.

सरसों के भाव में सबसे अधिक फायदा

कृषि मंत्रालय के ताजा मंडी भाव भी यही कहानी बताते हैं. इस हफ्ते सरसों के भाव में सबसे अधिक फायदा देखा जा रहा है. जब भी सरसों की सरकारी खरीद शुरू होती है तो उसके रेट में गिरावट देखी जाती है. किसानों में हाहाकार मच जाता है, पैनिक में किसान अपनी उपज को औने-पौने दाम में निकाल देते हैं. लेकिन इस बार मामला ठीक विपरीत है. इस बार एमएसपी से 500-600 रुपये क्विंटल अधिक रेट मिल रहा है जिससे किसानों में बेहद खुशी है. जानकार बताते हैं कि खाद्य तेलों के आयात में आई गिरावट का सबसे बड़ा फायदा सरसों को मिलता दिख रहा है.  

सरसों की तरह बाकी तिलहन फसलें भी फायदे में हैं. कृष‍ि मंत्रालय की ओर से उपलब्ध करवाए गए मंडी भाव के अनुसार मूंगफली का भाव इस समय 7245 रुपये क्विंटल चल रहा है, जबकि एक महीने पहले यह 6642 रुपये और साल भर पहले मात्र 5497 रुपये था. तोरिया और सरसों दोनों के दाम 6468 रुपये क्विंटल से ऊपर पहुंच गए हैं, जो एमएसपी से करीब पांच सौ रुपये प्रति क्व‍िंटल ज्यादा है. तिल की कीमतें भी बढ़कर 9442 रुपये हो गई हैं. सोयाबीन के दाम एक महीने में 5109 से बढ़कर 5292 रुपये क्विंटल हो गए. सूरजमुखी का भाव पिछले दो सालों में 4100 से उछलकर 5900 रुपये क्विंटल तक पहुंच चुका है. खास बात यह है कि कई तिलहन फसलें अपने एमएसपी से अधिक कीमत पर बिक रही हैं.

इसी रुझान में सरसों सबसे आगे है, क्योंकि इसकी खेती व्यापक है और घरेलू तेल उद्योग में इसकी मांग लगातार बनी रहती है. विदेशी तेल की सप्लाई घटने के कारण सरसों तेल की खपत बढ़ी है और वर्तमान में इसके दाम 6800 रुपये क्विंटल तक पहुंच चुके हैं. किसानों को चिंता है कि यदि जल्द ही आयात बहाल हो गया, तो कीमतें वापस नीचे आ सकती हैं.

तिलहन के दाम में तेजी बरकरार

विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर पश्चिम एशिया की लड़ाई लंबे दिनों तक खिंचती है, तो सरसों के दाम और बढ़ सकते हैं. फिलहाल जमाखोरी पर सरकार की सख्ती और वायदा बाजार पर पाबंदी के कारण सटोरियों की भूमिका न के बराबर है. पहले विदेशी तेल की सप्लाई के चलते देश में लगभग 10 लाख टन सरसों का अतिरिक्त स्टॉक बना रहता था, लेकिन इस बार मांग बढ़ने से वह भी खत्म होने की आशंका है. ऐसे में वे किसान लाभ में रहेंगे जिन्होंने पुराना स्टॉक रोक रखा है या नई फसल बेहतर दाम मिलने पर धीरे-धीरे बेच रहे हैं. बहरहाल, तिलहन किसानों को इस संकट से सीधा आर्थिक लाभ मिल रहा है.

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