छोटे किसानों से एग्री स्टार्टअप्स तक IFAD का बड़ा प्लान, 1 साल में 4 निवेश डील्स की तैयारी में UN की संस्‍था

छोटे किसानों से एग्री स्टार्टअप्स तक IFAD का बड़ा प्लान, 1 साल में 4 निवेश डील्स की तैयारी में UN की संस्‍था

संयुक्त राष्ट्र की संस्था IFAD अब भारत के एग्री स्टार्टअप्स और ग्रामीण कृषि क्षेत्र में सीधे निवेश की तैयारी में है. अगले एक साल में 3-4 निवेश डील्स हो सकती हैं, जबकि छोटे किसानों, किसान समूहों और जलवायु अनुकूल खेती पर भी बड़ा फोकस रखा गया है.

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छोटे किसानों से एग्री स्टार्टअप्स तक IFAD का बड़ा प्लान, 1 साल में 4 निवेश डील्स की तैयारी में UN की संस्‍थाएग्री स्‍टार्टअप्‍स के लिए खुशखबरी (AI Image)

संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (International Fund for Agricultural Development- IFAD) अब भारत के कृषि स्टार्टअप इकोसिस्टम में सीधे निवेश की तैयारी कर रही है. एजेंसी अगले एक साल में तीन से चार भारतीय एग्री-स्टार्टअप्स में निवेश के सौदे करने की दिशा में काम कर रही है. यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है, जब IFAD अपनी पारंपरिक डोनर ग्रांट आधारित फंडिंग व्यवस्था से आगे बढ़कर निजी पूंजी आधारित मॉडल को अपनाने पर जोर दे रही है.

निजी निवेश मॉडल की ओर बढ़ रहा IFAD

IFAD के कंट्री ऑपरेशंस के एसोसिएट वाइस-प्रेसिडेंट डोनल ब्राउन (Donal Brown) ने पीटीआई को दिए इंटरव्यू में बताया कि संस्था अब अपने काम को पूरी तरह नए स्तर पर ले जाना चाहती है. उन्होंने कहा कि करीब सात साल पहले IFAD ने अपने संस्थागत नियमों में बदलाव किया था, जिसके बाद उसे सीधे निजी क्षेत्र में निवेश की अनुमति मिली. इससे पहले संस्था केवल सरकारों के जरिए ही फंडिंग कर सकती थी.

ब्राउन ने बताया कि IFAD की निजी क्षेत्र इकाई कुछ सप्ताह पहले भारत आई थी और उसने कई संभावित अवसरों का आकलन किया. ब्राउन के मुताबिक, संस्था को भारत की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े चार से पांच प्रस्ताव मिल चुके हैं. इनमें कृषि स्टार्टअप्स, ग्रामीण वित्त और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं.

भारत के लिए 8 साल की नई रणनीति तैयार

12 मई को IFAD और भारत सरकार ने नई दिल्ली में आठ साल की नई कंट्री स्ट्रैटेजी लॉन्च की. यह रणनीति केंद्रीय वित्त मंत्रालय और कृषि मंत्रालय के साथ मिलकर तैयार की गई है. इसका फोकस ग्रामीण समुदायों को जलवायु और आर्थिक चुनौतियों के प्रति अधिक मजबूत बनाना है.

यह रणनीति देश के 110 आकांक्षी जिलों और गरीब राज्यों को ध्यान में रखकर बनाई गई है. इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत@2047 विजन के अनुरूप बताया गया है.

भारत में 1.2 अरब डॉलर का पोर्टफोलियो

ब्राउन ने बताया कि भारत में IFAD का मौजूदा पोर्टफोलियो करीब 1.2 अरब डॉलर का है. इसमें पांच प्रमुख परियोजनाएं शामिल हैं. इनमें से लगभग 350 मिलियन डॉलर की सीधी फाइनेंसिंग IFAD की तरफ से की गई है. वहीं, अगले तीन साल की परियोजना पाइपलाइन के लिए करीब 160 मिलियन डॉलर की फंडिंग निर्धारित की गई है.

हालांकि, संस्था अब सब्सिडी आधारित मॉडल पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहती. ब्राउन ने IFAD को “फाइनेंस का असेंबलर” बताया. उन्होंने कहा कि संस्था अपनी बैलेंस शीट का इस्तेमाल करके निजी निवेशकों की पूंजी को आकर्षित कर रही है. IFAD अब तक वैश्विक स्तर पर एक लाख से ज्यादा कंपनियों में लगभग 1.5 अरब डॉलर का निजी निवेश जुटाने में भूमिका निभा चुकी है.

NABARD के साथ मिलकर निवेश की तैयारी

IFAD ने राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के साथ सह-निवेश की संभावनाओं को लेकर एक लेटर ऑफ इंटेंट भी साइन किया है. ब्राउन ने इसे भारत में संस्था की सबसे अहम पहलों में से एक बताया. उन्होंने कहा कि नाबार्ड का भारत में अनुभव और IFAD का वैश्विक अनुभव मिलकर ग्रामीण निवेश के क्षेत्र में मजबूत असर पैदा कर सकता है. संस्था छोटे किसानों को बाजार से जोड़ने पर विशेष ध्यान देना चाहती है, ताकि उत्पादन से लेकर भंडारण, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग तक पूरी वैल्यू चेन मजबूत हो सके.

छोटे किसानों की सौदेबाजी ताकत बढ़ाने पर जोर

ब्राउन ने कहा कि अकेले काम करने वाले छोटे किसानों को बाजार में कम कीमत मिलती है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई किसान 10 किलो चावल बेचता है तो उसकी सौदेबाजी क्षमता सीमित रहती है, लेकिन अगर किसान समूह या सहकारी संस्था के जरिए 2,000 किलो चावल बेचा जाए तो बेहतर दाम हासिल किए जा सकते हैं.

उन्होंने बताया कि IFAD आगे चलकर भारत के सफल मॉडल जैसे महिला स्वयं सहायता समूह, गांव स्तर की बचत योजनाएं और किसान सहकारी समितियों को दूसरे विकासशील देशों तक पहुंचाने पर भी काम करेगा.

जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ी चुनौती

ब्राउन ने कहा कि IFAD जिन ग्रामीण समुदायों के साथ काम करता है, उनके लिए जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ी दीर्घकालिक चुनौती बन चुका है. खासकर वर्षा आधारित खेती करने वाले छोटे किसान सबसे अधिक जोखिम में हैं, क्योंकि उनके पास अनुकूलन के लिए सीमित संसाधन होते हैं.

उन्होंने कहा कि भारत को कृषि में एग्रो-इकोलॉजिकल मॉडल, मिट्टी की सेहत सुधारने वाली तकनीकों और पारंपरिक फसलों की ओर बढ़ना होगा. ब्राउन ने मोटे अनाजों जैसे बाजरा और ज्वार को बदलते मौसम के लिहाज से बेहतर फसल बताया, जबकि सीमांत इलाकों में अधिक सिंचाई वाली गेहूं और धान जैसी फसलों पर अत्यधिक निर्भरता को चुनौतीपूर्ण माना.

परियोजनाओं में नेतृत्व की निरंतरता जरूरी

राज्यों में परियोजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर ब्राउन ने कहा कि बार-बार परियोजना निदेशकों का बदलना सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है. उन्होंने इसे फुटबॉल टीम से जोड़ते हुए कहा कि अगर एक सीजन में पांच मैनेजर बदल जाएं तो अच्छे परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती. इसलिए सफल परियोजनाओं के लिए नेतृत्व में निरंतरता बेहद जरूरी है.

कई राज्यों में चल रही हैं परियोजनाएं

IFAD इस समय महाराष्ट्र, मेघालय, मिजोरम, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड समेत कई राज्यों में परियोजनाएं चला रही है. ओडिशा और तमिलनाडु में भी संस्था लंबे समय से काम कर रही है. ब्राउन ने बताया कि वह जल्द ही असम और मेघालय का दौरा करेंगे, जहां नई परियोजनाओं और निवेश संभावनाओं पर चर्चा होगी.

1978 से भारत में सक्रिय है IFAD

ब्राउन ने कहा कि भारत में IFAD का पहला निवेश वर्ष 1978 में हुआ था. संस्था 2028 में भारत के साथ अपनी साझेदारी के 50 साल पूरे करेगी. उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले दशकों में भी यह साझेदारी जारी रहेगी, हालांकि इसका स्वरूप अब निजी निवेश और ज्ञान साझेदारी की दिशा में ज्‍यादा विकसित होगा.

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