मटर की खेती के लिए जंगल में ग्लाइफोसेट का छिड़काव (Photo: Representative)हिमाचल प्रदेश में वन भूमि पर अवैध तरीके से मटर की खेती और इसके लिए ग्लाइफोसेट जैसे खरपतवार नाशक के इस्तेमाल का मामला सामने आया है. मंडी जिले के नाचन फॉरेस्ट डिवीजन की थाची रेंज समेत कुछ अन्य इलाकों में वन भूमि पर घास और दूसरे पौधों को खत्म करने के लिए ग्लाइफोसेट का छिड़काव किए जाने की जानकारी मिली है. मामला सामने आने के बाद वन विभाग ने कुछ जगहों पर फसल को नष्ट कर दिया है और जिम्मेदार लोगों की पहचान की जा रही है. विभाग का कहना है कि दोषियों के खिलाफ FIR भी दर्ज कराई जाएगी.
दरअसल, हिमाचल के कई पहाड़ी इलाकों में बरसात के मौसम में मटर समेत दूसरी सब्जियों की खेती की जाती है. इसके लिए कुछ लोग वन भूमि के कछार या खाली हिस्सों को साफ कर खेती करने की कोशिश करते हैं. आरोप है कि कुछ जगहों पर घास और दूसरी वनस्पतियों को जल्दी खत्म करने के लिए ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल किया गया. पर्यावरणविदों ने इस पर गंभीर चिंता जताई है, क्योंकि वन क्षेत्र में किसी खरपतवार नाशक का इस्तेमाल मिट्टी, पानी, वनस्पतियों और आसपास के जीव-जंतुओं को प्रभावित कर सकता है.
हिमालय नीति अभियान के संयोजक गुमान सिंह के मुताबिक, मंडी जिले के नाचन फॉरेस्ट डिवीजन की थाची रेंज में वन भूमि पर मटर की खेती के लिए घास और पौधों को हटाने के लिए ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल किया गया. उनका आरोप है कि इस तरह की गतिविधियां जंगल और जैव विविधता के लिए नुकसानदेह हैं. उनका कहना है कि वन भूमि पर खेती करने के लिए इस तरह के रसायन का इस्तेमाल जन स्वास्थ्य के साथ-साथ पशुधन, वन्यजीव और वनस्पतियों के लिए भी चिंता का विषय है.
मंडी के डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर एसएस कश्यप के अनुसार, वन विभाग को रूटीन चेकिंग और पेट्रोलिंग के दौरान इस तरह की गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है. उन्होंने बताया कि बड़े स्तर पर ऐसे मामले सामने नहीं आए हैं, लेकिन कुछ स्थानों पर ऐसी गतिविधियां मिली हैं. विभाग ने इन पर नजर रखने के लिए टीमें बनाई हैं, जो मौके पर जाकर जांच कर रही हैं.
डीएफओ के मुताबिक, एक-दो जगहों पर ऐसी खेती मिली थी, जिसे विभाग ने नष्ट कर दिया है. उन्होंने बताया कि बरसात के मौसम में मटर जैसी फसलों का सीजन होता है और इसी दौरान इस तरह की गतिविधियां सामने आती हैं. विभाग का कहना है कि इस बार स्थिति पर काफी हद तक नियंत्रण है. जिन लोगों की भूमिका सामने आएगी, उनकी पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और दोषियों के खिलाफ FIR भी दर्ज कराई जाएगी.
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, कई बार लोग अपनी जमीन के आसपास या वन क्षेत्र में चुपचाप बीज डाल देते हैं. बीज डालने के समय यह पता लगाना मुश्किल होता है कि वहां खेती की जा रही है. जब कुछ समय बाद पौधे निकल आते हैं, तब वन विभाग को इसकी जानकारी मिलती है. इसके बाद विभाग की टीमें मौके पर पहुंचकर जांच करती हैं और अवैध खेती मिलने पर कार्रवाई की जाती है.
डीएफओ ने बताया कि पिछले साल भी सराज क्षेत्र में इस तरह के मामले सामने आए थे. इस बार थाची से लेकर धारघाट क्षेत्र में एक-दो स्थानों पर ऐसी गतिविधियां मिली हैं. विभाग का मानना है कि वन क्षेत्र में ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल से मिट्टी प्रभावित हो सकती है और आसपास के जलस्रोतों के दूषित होने का खतरा भी रहता है. यही वजह है कि वन विभाग इस मामले को गंभीरता से ले रहा है.
ग्लाइफोसेट एक खरपतवार नाशक है, जिसका इस्तेमाल घास और अनचाहे पौधों को खत्म करने के लिए किया जाता है. भारत में इसके इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है. पेस्टिसाइड एक्शन नेटवर्क इंडिया का कहना है कि इसका इस्तेमाल उन फसलों और जगहों पर नहीं किया जाना चाहिए, जहां इसके उपयोग की अनुमति नहीं है. संगठन लंबे समय से ग्लाइफोसेट पर कड़े प्रतिबंध की मांग करता रहा है.
भारत में कीटनाशकों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए Insecticides Act, 1968 लागू है. केंद्र सरकार ने 2022 में ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल को पेस्ट कंट्रोल ऑपरेटरों तक सीमित करने का आदेश जारी किया था. इसके बाद भी इसके इस्तेमाल और नियमन को लेकर लगातार चर्चा होती रही है. आधिकारिक रिकॉर्ड में 2023 में केंद्रीय बोर्ड की बैठक में भी ग्लाइफोसेट के पेस्ट कंट्रोल ऑपरेटरों के जरिए प्रतिबंधित उपयोग से जुड़े मुद्दे पर चर्चा दर्ज है.
पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता सिर्फ फसल तक सीमित नहीं है. उनका कहना है कि जंगल में किसी खरपतवार नाशक का इस्तेमाल करने से रसायन मिट्टी में पहुंच सकता है और बारिश के पानी के साथ आसपास के नालों और जलस्रोतों तक भी जा सकता है. हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में यह चिंता और बढ़ जाती है, क्योंकि यहां बारिश के दौरान खेतों और ढलानों से रसायनों के बहकर जलस्रोतों तक पहुंचने का खतरा रहता है. हाल की पर्यावरणीय रिपोर्टों में भी हिमाचल में अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों के इस्तेमाल से मिट्टी, पानी और जैव विविधता पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई गई है.
ग्लाइफोसेट के स्वास्थ्य पर संभावित प्रभाव को लेकर वैज्ञानिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में लंबे समय से बहस चल रही है. पेस्टिसाइड एक्शन नेटवर्क इंडिया का कहना है कि ग्लाइफोसेट शरीर के हार्मोन से जुड़े रास्तों को प्रभावित कर सकता है और इसके संपर्क में आने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं. वहीं, इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने 2015 में ग्लाइफोसेट को “probably carcinogenic to humans” यानी मनुष्यों में कैंसर पैदा करने की संभावना वाले पदार्थ के रूप में वर्गीकृत किया था. हालांकि, ग्लाइफोसेट की कैंसर संबंधी जोखिम पर अलग-अलग वैज्ञानिक और नियामक संस्थाओं के आकलन में अंतर रहा है.
फिलहाल वन विभाग ने प्रभावित इलाकों में अवैध खेती को हटाने और ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल की जांच शुरू कर दी है. विभाग की टीमें उन लोगों की पहचान कर रही हैं, जिन्होंने वन भूमि पर खेती के लिए यह गतिविधि की. अधिकारियों का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी और जरूरत पड़ने पर FIR भी दर्ज होगी. ऐसे में अब सवाल सिर्फ वन भूमि पर अवैध खेती का नहीं, बल्कि जंगल, मिट्टी, पानी और आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा का भी है. विभाग के सामने चुनौती यह है कि ऐसी गतिविधियों को समय रहते रोका जाए, ताकि खेती के लिए जंगलों को साफ करने और रसायनों के इस्तेमाल का सिलसिला आगे न बढ़े.
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