इथेनॉल के लिए मेहरबान सरकार. हिंदी साहित्य के पुरोधा भगवतीचरण वर्मा की कालजयी कहानी 'वसीयत' का वह प्रसंग याद करिए, जहां आचार्य चूड़ामणि का बैंक मैनेजर बेटा लालमणि पैसे और जायदाद की खातिर रातों-रात अपने आधुनिक संस्कार बदल लेता है. वह बीच का रास्ता निकालते हुए कहता है कि बाल छोटे करवाएगा तो सिर पर एक 'चुटिया' निकल आएगी, ताकि बाप की अकूत संपत्ति भी हाथ से न जाए और आधुनिकता का चोगा भी न छूटे. केंद्र सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के चावल में टूटे दानों की सीमा घटाने का जो ताजा फैसला लिया है, वह इस इसी तरह की 'चुटिया छाप' चालाकी का सबसे आधुनिक उदाहरण है. गरीबों को अच्छा चावल खिलाने की आड़ में सरकार ने असल में इथेनॉल कंपनियों के लिए कच्चे माल की एक स्थायी और मुनाफेदार वसीयत लिख दी है.
सरकार ने बड़े गाजे-बाजे के साथ एलान किया है कि अब कच्चे चावल में टूटे दानों की सीमा 25 प्रतिशत से घटाकर 10 और उसना चावल में 16 से घटाकर 5 प्रतिशत की जाएगी. देखने में यह फैसला बेहद गरीब हितैषी लगता है कि अब देश के 80 करोड़ गरीबों को बिना टूटा हुआ, साफ-सुथरा साबुत चावल मिलेगा. लेकिन इस नकाब के पीछे का असली चेहरा समझने की जरूरत है.
इस नियम के लागू होते ही देश भर की राइस मिलों में जैसे ही धान की कुटाई होगी, उसमें से 15 प्रतिशत (कच्चे चावल में) और 11 प्रतिशत (उसने चावल में) अतिरिक्त टूटा दाना कानूनी रूप से अनिवार्य रूप से बाहर निकाल दिया जाएगा. यह अनाज-आधारित इथेनॉल कंपनियों के लिए चांदी है. इन कंपनियों के सामने सबसे बड़ा संकट यह था कि बाजार में मक्का या चावल महंगा होने पर उनकी भट्टियां ठंडी पड़ जाती थीं. अब सरकार ने गरीबों की थाली का बहाना बनाकर मिलों के स्तर पर ही हर साल उच्च गुणवत्ता वाले टूटे चावल की ऐसी 'सप्लाई चेन' बना दी है, जो सीधे इन कंपनियों के गोदामों में गिरेगी. यानी गरीबों को साफ चावल देने की चिंता नहीं थी, चिंता कंपनियों को कचरा-मुक्त सॉलिड रॉ मैटेरियल देने की थी.
इथेनॉल कंपनियों पर सरकारी 'मेहरबानी' यहीं खत्म नहीं हो रही. सबसे बड़ा नीतिगत विरोधाभास यही है कि इथेनॉल के लिए धान की एमएसपी से भी कम कीमत पर चावल देने जा रही है. यह सीधे तौर पर अर्थशास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों का मजाक सा लगता है. व्यापार का एक सीधा नियम है कि कच्चा माल हमेशा सस्ता होता है और उससे तैयार होने वाली चीज महंगी. लेकिन देश के नीतिगत गलियारों में इन दिनों यह एक ऐसा अनोखा अर्थशास्त्र चल रहा है, जिसे देखकर बड़े-बड़ों का दिमाग चकरा जाए.
वर्ष 2026 के लिए धान की एमएसपी 2,441 रुपये प्रति क्विंटल तय है, लेकिन उसी धान से तैयार चावल इथेनॉल कंपनियों को महज 2,320 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर दिया जाएगा. दुनिया के किसी भी बाजार में ऐसा नहीं होता कि तैयार माल की कीमत उसके कच्चे माल से भी कम हो जाए.
हैरानी की बात यह है कि मिलिंग, ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज के भारी-भरकम खर्चों को जोड़कर भारतीय खाद्य निगम (FCI) के खातों में इस चावल की वास्तविक आर्थिक लागत 4400 रुपये प्रति क्विंटल बैठती है, जिसे इन डिस्टिलरीज को करीब आधी कीमत पर देने का प्लान है. इस 'उल्टी गंगा' को बहाने में जो घाटा होगा, उसकी पूरी भरपाई बहुत ही चालाकी से देश के 'खाद्य सब्सिडी' बजट से होगी.
जबकि खाद्य सब्सिडी का एकमात्र सामाजिक संकल्प यह है कि देश के सबसे लाचार, गरीब और कुपोषित परिवारों को भुखमरी से बचाया जा सके. लेकिन सरकार ने 'ग्रीन एनर्जी' और 'अतिरिक्त स्टॉक' जैसे टेक्निकल शब्दों का मायाजाल बुनकर गरीबों के हक के इस कल्याणकारी बजट हेड का रुख इथेनॉल कंपनियों की तरफ मोड़ दिया है. एक आम टैक्सपेयर यह सोचकर टैक्स चुकाता है कि उसका पैसा देश निर्माण या किसी गरीब की थाली में जाएगा, लेकिन यहां तो कुछ और ही खेल हो रहा है.
हालांकि, सरकार का दावा है कि इस टूटे चावल को FCI के गोदामों में न ले जाकर सीधे डिस्टिलरीज भेजने से 2,161 करोड़ की लॉजिस्टिक्स और परिवहन लागत बचेगी. लेकिन यहां सवाल यह है कि अगर ऐसा भी है तो यह बची हुई रकम और यह पूरा संसाधन किसके काम आएगा?
किसानों से MSP पर धान खरीदने के लिए पैसा टैक्सपेयर्स का लगा. मिलों को कुटाई के लिए सब्सिडी और सरकारी संरक्षण मिला. लेकिन जब उसमें से ब्रोकन राइस की मलाई निकली, तो उसे जनता को देने या बाजार में सस्ते दामों पर बेचने की बजाय सीधे निजी इथेनॉल डिस्टिलरीज को 'कंट्रोल रेट' पर सौंपने का रास्ता साफ कर दिया गया. यह जनता के पैसे का इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों की तिजोरी में ट्रांसफर नहीं तो और क्या है?
जब इस नीति पर सवाल उठाए जाते हैं, तो सरकार की तरफ से 'कच्चे तेल के आयात बिल में कटौती' जैसे बड़े-बड़े तकनीकी शब्दों का जाल बुना जाता है. लेकिन इस तर्क के पीछे छिपे इथेनॉल कंपनियों के 'डबल मुनाफे' को देखिए. अब कंपनियों को बाजार से महंगा अनाज खरीदने की जरूरत नहीं है, उन्हें सरकार से सस्ता चावल मिल रहा है. इस सस्ते चावल से जो इथेनॉल बनता है, उसे सरकारी तेल कंपनियां 68 रुपये प्रति लीटर तक के रेट पर खरीद रही हैं.
अगर इथेनॉल कंपनियों को मिल रही कच्चे माल की सब्सिडी का फायदा देश को मिलना था तो पेट्रोल की कीमतें कम होनी चाहिए थीं. लेकिन आम आदमी आज भी 100 रुपये लीटर से महंगा पेट्रोल खरीदने पर मजबूर है. कंपनियों को कच्चे माल पर भी छूट मिल रही है और तैयार माल पर भी अंधा मुनाफा, दूसरी ओर आम टैक्सपेयर को सिर्फ महंगाई की मार मिल रही है.
इस पूरी नीति का एक और विरोधाभास देश के पर्यावरण और कृषि संकट से जुड़ा है. नीति आयोग से लेकर कृषि मंत्रालय तक सालों से किसानों को डरा रहे हैं कि धान की खेती छोड़ो क्योंकि एक किलो चावल उगाने में 3,000 से 5,000 लीटर पानी धरती के सीने से खींच लिया जाता है. धान की वजह से ही पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी जैसे क्षेत्रों में भू-जल संकट है. इसीलिए धान की खेती छोड़ने पर किसानों को पंजाब में प्रति एकड़ 7,000, हरियाणा में 8,000 और छत्तीसगढ़ में 15,000 रुपये की प्रोत्साहन रकम दी जा रही है.
सरकार एक तरफ तो कहती है कि पानी बचाने के लिए धान की खेती को हतोत्साहित किया जाए, और दूसरी तरफ उसी पानी से सींचे गए चावल से गाड़ियां चलाने के लिए इथेनॉल कंपनियों को करोड़ों टन चावल की गारंटी दे रही है. पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल (E20) मिलाने के जिस 'ग्रीन फ्यूल' के टारगेट का ढोल पीटा जा रहा है, वह असल में देश के बहुमूल्य पानी और अनाज को फैक्ट्रियों की भट्टी में झोंकने का आत्मघाती रास्ता लगता है.
सरकार ने पानी बचाने और इथेनॉल क्रांति का ढिंढोरा पीटते हुए किसानों को 'धान छोड़ो, मक्का उगाओ' का जो झांसा दिया था, वह आज कृषि इतिहास का सबसे बड़ा नीतिगत छलावा साबित हो चुका है. सरकार के दावों पर आंख मूंदकर भरोसा करने वाले किसानों ने खून-पसीना बहाया और मक्के की रिकॉर्ड पैदावार कर दी. लेकिन कामयाबी का सेहरा बंधने से पहले ही सरकार ने पीठ फेर ली और इथेनॉल आपूर्ति वर्ष (ESY) 2024-25 में डिस्टिलरियों के लिए चावल का कोटा बढ़ाकर सीधे 52 लाख मीट्रिक टन कर दिया. सरकारी प्राथमिकताओं की इस पलटी ने मक्के के बाजार को ऐसा ध्वस्त किया कि पिछले लगभग एक साल से किसानों को मक्के का MSP तक नसीब नहीं हुआ.
कागजों पर 2,400 रुपये प्रति क्विंटल की एमएसपी वाला मक्का मंडियों में महज 1200 से 1800 रुपये के दाम पर बिका. अब रही-सही कसर पूरी करने के लिए इथेनॉल कंपनियों के आगे रिकॉर्ड 72 लाख टन रियायती टूटे चावल की दावत परोस दी गई है. जब कंपनियों को कौड़ियों के भाव सरकारी चावल की थाली सजी-सजाई मिलेगी, तो वे किसानों का मक्का क्यों छुएंगी? इस बेरहम मॉडल में 'ऊर्जादाता' बनने का ख्वाब देखने वाले मक्का किसानों का अब क्या होगा? मक्के का एमएसपी 2410 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि चावल मिलेगा 2,320 रुपये के भाव पर. फिर भला कौन सी इथेनॉल कंपनी मक्का खरीदना पसंद करेगी?
बहरहाल, भगवतीचरण वर्मा के उस चालाक बैंक मैनेजर बेटे की तरह ही मौजूदा नीति नियंताओं ने भी लाजवाब रास्ता निकाला है. जनता और विपक्ष के सामने यह चोगा पहन लिया गया है कि देखो, हम गरीबों को कितना उम्दा राशन दे रहे हैं, लेकिन असल बात यह है कि पिछले दरवाजे से इथेनॉल कंपनियों को टूटे चावल के बहाने मुनाफे की गारंटी दे दी गई है. यह नीति देश की खाद्य सुरक्षा या गरीब कल्याण की नहीं, बल्कि 'वेलफेयर स्टेट' के मुखौटे में छिपी शुद्ध कंपनी परस्ती की नई 'वसीयत' है.
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