सोयाबीन की बुवाई 40% घटी, उत्पादन कम हुआ तो क्या होगा? तेल, दूध और चिकन तक पड़ेगा असर

सोयाबीन की बुवाई 40% घटी, उत्पादन कम हुआ तो क्या होगा? तेल, दूध और चिकन तक पड़ेगा असर

खरीफ सीजन में सोयाबीन समेत तिलहनी फसलों का रकबा करीब 40 प्रतिशत तक घट गया है. कमजोर मॉनसून और किसानों को कम दाम मिलने से उत्पादन घटने की आशंका बढ़ गई है. यदि सोयाबीन की पैदावार कम रही तो भारत को सोयाबीन तेल और सोया उत्पादों का आयात बढ़ाना पड़ सकता है, जिससे खाद्य तेल, दूध, अंडे और चिकन की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि ब्राजील और अर्जेंटीना के मुकाबले भारत की कम उत्पादकता और ऊंची लागत दुनिया के बाजारों में बड़ी चुनौती बनी हुई है.

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सोयाबीन की बुवाई 40% घटी, उत्पादन कम हुआ तो क्या होगा? तेल, दूध और चिकन तक पड़ेगा असरसोयाबीन के गिरते दाम से किसान परेशान

सबके मन में एक ही सवाल है-अगर खरीफ में तिलहन, खासकर सोयाबीन का रकबा नहीं बढ़ा तो क्या होगा? यह सवाल सबको परेशान कर रहा है क्योंकि खरीफ पर ढीले मॉनसून और कम बारिश का सीधा असर देखा जा रहा है. ये असर अल नीनो की वजह से है. खरीफ बुवाई की ताजा रिपोर्ट बताती है कि इस सीजन में अगर किसी फसल पर सबसे तगड़ी मार पड़ी है, तो वो हैं तिलहनी फसलें. तिलहन का कुल रकबा पिछले साल के मुकाबले रिकॉर्ड 42.96 लाख हेक्टेयर पिछड़ चुका है, जो कि 39.31% की भारी-भरकम गिरावट को दर्शाता है. जहां बीते साल इस समय तक 109.27 लाख हेक्टेयर में तिलहनी फसलें लहलहा रही थीं, वहीं इस साल किसानों ने अब तक सिर्फ 66.31 लाख हेक्टेयर क्षेत्र ही कवर किया है. सोयाबीन का इस बार रकबा घटकर 47.80 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले साल के 79.20 लाख हेक्टेयर से 31.40 लाख हेक्टेयर लगभग  39.64% कम है. मूंगफली की इस बार बुवाई 16.93 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल के 28.00 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 11.07 लाख हेक्टेयर यानी 39.53% कम है. 

इस रिपोर्ट में सबसे अधिक परेशानी सोयाबीन को लेकर है क्योंकि इसे सबसे अच्छा देसी तिलहन फसल माना जाता है. इसके बाद ही सरसों, रेपसीड और मूंगफली जैसी फसलें आती हैं. लेकिन बीते कुछ साल में सोयाबीन किसानों को दाम में इस कदर धोखा मिला है कि वे अब बुवाई से सहम गए हैं. फसल तैयार होने के बाद सोयाबीन के दाम ऐसे गिरते हैं, जैसे मंडियों में भूकंप आ गया हो. इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने में आएगा. बुवाई के हालात नहीं सुधरे तो किसान रेट के लिए तरस जाएंगे. 

आइए जानते हैं कि सोयाबीन का उत्पादन गिरने पर क्या होगा. इसके दोतरफा प्रभाव होंगे-एक तो सोयाबीन के आयात बढ़ेंगे जिस पर सरकारी खजाना खाली होगा. दूसरा, घरेलू बाजार में सोयाबीन तेल के दाम में इजाफा होगा जिससे महंगाई बढ़ेगी और उपभोक्ताओं की जेब अधिक ढीली होगी. और भी कई तरह के प्रभाव देखे जाएंगे.

सोयाबीन उत्पादन गिरा तो क्या होगा?

भारत में सोयाबीन के उत्पादन में कमी से घरेलू सोया मील की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं. इससे मुख्य उत्पादक क्षेत्रों (जैसे मध्य प्रदेश) के किसानों के लिए आर्थिक संकट पैदा होता है, पोल्ट्री और डेयरी उद्योगों को चारे की बढ़ती लागत से जूझना पड़ता है, और अंडे, दूध और चिकन की खुदरा कीमतें बढ़ जाती हैं. इस बार भी ऐसी आशंका है क्योंकि मौजूदा खरीफ बुवाई की धीमी रफ्तार उत्पादन में गिरावट का इशारा कर रही है. 

पशु आहार संकट 

सोया मील पोल्ट्री, डेयरी और एक्वाकल्चर (मछली पालन) के चारे के लिए प्रोटीन का मुख्य स्रोत है. जब घरेलू उत्पादन गिरता है, तो फ़ीड मिलों को भारी सप्लाई संकट का सामना करना पड़ता है. टिके रहने के लिए, उद्योग सोयाबीन के आयात को बढ़ाने या मक्का जैसी दूसरी फसलों की ओर रुख करने पर निर्भर करता है. 

खाने-पीने की महंगाई 

डेयरी और पोल्ट्री किसान लागत में भारी बढ़ोतरी का बोझ खुद नहीं उठा सकते. ये सभी बोझ  ग्राहकों पर डाले जाते हैं, जिससे पोल्ट्री प्रोडक्ट (चिकन, अंडे) और डेयरी उत्पादों (पनीर, दही) की कीमतें बढ़ जाती हैं. 

किसानों की रोजी-रोटी पर खतरा 

सोयाबीन लाखों किसानों के लिए आर्थिक लाइफलाइन है. जब पैदावार गिरती है तो अक्सर बेमौसम बारिश, वैश्विक सप्लाई चेन में उतार-चढ़ाव या दूसरी फसलों की ओर रुख करने के कारण किसानों की आय कम हो जाती है और उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है. 

आयात में बदलाव 

घरेलू कमी को पूरा करने के लिए, भारत अक्सर अर्जेंटीना और ब्राजील जैसे देशों से कच्चे सोयाबीन तेल का आयात बढ़ाता है. इसी तरह, व्यापार संघों ने अक्सर सोया मील आपूर्ति संकट से निपटने के लिए सरकार से दखल देने और आयात शुल्क में ढील देने की मांग की है. 

इस पूरी जानकारी में सोया मील और सोयाबीन तेल सबसे अहम हैं. अहम बात है कि भारत सोया मील का आयात करने वाला देश नहीं बल्कि निर्यातक रहा है. मगर हाल के वर्षों में स्थिति उलट गई है. इसकी वजह है भारत के माल का महंगा पड़ना. जानकार बताते हैं, भारत में कृषि उत्पादकता ब्राजील और अर्जेंटीना की तुलना में लगभग एक-तिहाई है, जबकि इसे बनाने की लागत और कीमतें उससे अधिक हैं. इस अंतर को कम करने के लिए फिलहाल कोई तुरंत समाधान दिखाई नहीं देता और निकट भविष्य में भी इसकी संभावना भी कम ही नजर आती है. जब तक प्रति टन उत्पादन क्षमता में बड़ी वृद्धि नहीं होती, तब तक वैश्विक बाजार में भारत के सोया मील का निर्यात प्रभावित होता रहेगा.

इसके लिए सरकार को सबसे पहले सोयाबीन उत्पादकता बढ़ाने पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि पिछले 25-30 वर्षों से यह आंकड़ा लगभग स्थिर बना हुआ है. हालांकि, अर्जेंटीना और ब्राजील के पास उपलब्ध विशाल कृषि भूमि और संसाधनों के कारण उनके उत्पादन स्तर तक पहुंचना भारत के लिए चुनौती भरा हो सकता है, लेकिन बेहतर तकनीक, क्वालिटी वाले बीज और आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर भारत सोयाबीन की प्रोडक्टिविटी में निश्चित रूप से सुधार कर सकता है. जैसे ही सोयाबीन की पैदावार और उत्पादकता बढ़ेगी, सोया मील जैसे प्रोडक्ट के आयात की मजबूरी खत्म हो जाएगी.

सोयाबीन तेल का महंगा आयात

सोयाबीन तेल ऐसा खाद्य तेल है जो भारत के बजट पर बड़ा असर डालता है. रिपोर्ट बताती है कि ऑयल ईयर 2025-26 (नवंबर-अक्टूबर) के शुरुआती सात महीनों में खाने के तेल के कुल आयात में बढ़ोतरी की एक बड़ी वजह कच्चे सोयाबीन तेल का ज्यादा आयात रहा, खासकर मई के महीने में. सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के डेटा के मुताबिक, नवंबर-मई 2025-26 के दौरान भारत का खाने के तेल का आयात बढ़कर 92.17 लाख टन (lt) हो गया, जबकि पिछले ऑयल ईयर की इसी अवधि में यह 81.31 लाख टन था. इस तरह इसमें 13.35 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

मई 2026 में भारत का खाद्य तेल आयात अप्रैल 2026 के मुकाबले 2.4 प्रतिशत बढ़ा. इसकी मुख्य वजह कच्चे सोयाबीन तेल का ज्यादा आयात था, क्योंकि पाम तेल के मुकाबले सोयाबीन तेल के भाव कुछ कम रहे. 

पाम के मुकाबले सोयाबीन पर भरोसा

पाम तेल को लेकर अच्छी खबरें नहीं आ रही हैं. मलेशिया और इंडोनेशिया में उत्पादन गिरने की आशंका है. साथ ही, दोनों देश पाम तेल का बायोफ्यूल में इस्तेमाल बढ़ाने वाले हैं. इससे पाम तेल का निर्यात गिरेगा. भारत जैसे देश बड़ी मात्रा में पाम तेल का आयात करते हैं. इसे देखते हुए भारत को अपनी मांग पूरी करने के लिए दूसरे देशों से खरीद बढ़ानी होगी जो सस्ता सौदा साबित नहीं होगा. पाम तेल की कमी को पाटने के लिए भी सोयाबीन तेल का आयात बढ़ सकता है.

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