बाजार में बाजरे का नहीं मिल रहा सही दाम, किस काम का मंत्री जी का अल नीनो वाला ज्ञान?

बाजार में बाजरे का नहीं मिल रहा सही दाम, किस काम का मंत्री जी का अल नीनो वाला ज्ञान?

Bajra Price: अल नीनो संकट के बीच कृषि मंत्री द्वारा धान के स्थान पर कम पानी वाली बाजरे जैसी फसलें उगाने की सलाह दी जा रही है. जबक‍ि 81 महीनों में बाजरे का बाजार भाव एमएसपी से नीचे है. ऐसे में कोई क‍िसान शौक से बाजरे की बुवाई नहीं करेगा. क‍िसानों के ल‍िए बाजरे की खेती मजबूरी वाली ही रहेगी.

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बाजार में बाजरे का नहीं मिल रहा सही दाम, किस काम का मंत्री जी का अल नीनो वाला ज्ञान?किसानों को बाजरे का सही दाम नहीं मिल रहा है

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान इन दिनों देश के किसानों को एक नया 'ज्ञान' बांट रहे हैं. वे लगातार बैठकों में अल नीनो (El Niño) के संकट और कम बारिश की दुहाई देकर किसानों को समझा रहे हैं कि वे पारंपरिक धान छोड़कर कम पानी वाली फसलें उगाएं. वे 'बाजरा' का नाम लेते हैं. लेकिन देश का अन्नदाता आज कृषि मंत्रालय से सीधे यह सवाल पूछ रहा है क‍ि साहब, जब बाजार में बाजरे का सही दाम ही नहीं मिल रहा, तो ऐसी नसीहतें किस काम की? सितंबर 2019 से जून 2026 तक कुल 81 महीने से बाजरे का बाजार भाव उसके सरकारी रेट यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे रहा है. सरकारी आंकड़ों का जो पुलिंदा कृषि मंत्रालय के पोर्टल पर सजाया गया है, वही सरकार की इस खोखली नीति की पोल खोल रहा है.  

इस कड़वी हकीकत के बीच अब एक सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि क्या कृषि मंत्रालय के आला अधिकारी खुद कृषि मंत्री को अंधेरे में रख रहे हैं? क्या अधिकारी मंत्री जी को सिर्फ 'बंपर पैदावार' और 'रिकॉर्ड एमएसपी वृद्धि' के गुलाबी आंकड़े दिखा रहे हैं? क्या मंत्री जी को यह कभी बताया ही नहीं जाता कि उनकी नाक के नीचे, देश के सबसे बड़े बाजरा उत्पादक राज्यों की मंडियों में किसानों की फसल को खुलेआम कौड़ियों के भाव लूटा जा रहा है? अगर मंत्री जी तक यह बात पहुंच रही है कि किसानों को बाजरे का रेट एमएसपी से काफी कम और कई बार सी-2 लागत ज‍ितना भी नहीं मिल रहा है, तो वे चुप क्यों हैं? और अगर उन तक यह बात नहीं पहुंच रही, तो साफ है कि नौकरशाही उन्हें जमीनी सच से दूर रखकर सिर्फ अपनी पीठ थपथपाने में जुटी है. 

लागत, एमएसपी और बाजार भाव  

कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की ताजा 'प्राइस पॉलिसी रिपोर्ट' के आंकड़े चीख-चीखकर सरकारी दावों की धज्जियां उड़ा रहे हैं. स्वामीनाथन आयोग जिस C2 लागत-जिसमें किसान की जमीन का किराया और पूंजी का ब्याज भी शामिल है, को आधार बनाने की वकालत करता है, उसके मुकाबले बाजार भाव रसातल में है. सरकार C2 लागत को पूरी तरह दरकिनार कर केवल A2+FL (लागत + पारिवारिक श्रम) के आधार पर 'डेढ़ गुना दाम' देने का ढोल पीट रही है. 

बहरहाल, सीजन 2025-26 के लिए बाजरे का आधिकारिक एमएसपी 2,775 प्रति क्विंटल घोषित किया गया. लेकिन देश की प्रमुख मंडियों में औसत बाजार भाव 2,100 प्रति क्विंटल पर सिमट गया है. किसान को C2 लागत के आधार पर जो वाजिब मुनाफा मिलना चाहिए था, वह तो दूर, उसे घोषित एमएसपी से भी कम पैसा म‍िल रहा है. आगामी सीजन (2026-27) के लिए बाजरे का एमएसपी बढ़ाकर 2,900 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल जरूर किया गया है, लेकिन जब पुराना बाजरा ही 2100 में दम तोड़ रहा है, तो इस नई घोषणा का क्या औचित्य?

मिलेट ईयर का पाखंड

सरकार ने 2023 में संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर पूरे जोर-शोर से 'इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स' मनाया. वैश्विक मंचों पर बाजरे को 'सुपरफूड' और 'श्रीअन्न' बताकर ब्रांडिंग की गई. लेकिन आज यह सवाल पूछना लाजिमी है कि क्या यह पूरा अभियान सिर्फ शहरी उपभोक्ताओं और फाइव-स्टार होटलों के लिए चलाया गया था?

आज शहरों के सुपरमार्केट्स में पैक्ड बाजरे का आटा, मिलेट बिस्कुट और रेडी-टू-ईट उत्पाद 150 से 300 रुपये प्रति किलो तक बेचे जा रहे हैं. कंपनियां और बड़े रिटेलर्स मिलेट के नाम पर उपभोक्ताओं की जेब काट रहे हैं. उपभोक्ता जहां बाजरे के लिए भारी कीमत चुका रहा है, वहीं इसे हाड़-तोड़ मेहनत से उगाने वाला किसान मंडी में 21 रुपये क‍िलो के लिए आढ़तियों के आगे हाथ जोड़ने को मजबूर हैं. 

कुल म‍िलाकर कृष‍ि मंत्रालय का खुद का आंकड़ा यह कह रहा है क‍ि मिलेट ईयर का फायदा न तो बाजरा किसानों की आय बढ़ाने में हुआ और न ही उसे बिचौलियों के चंगुल से आजाद करा पाया. यह अभियान सिर्फ एक मार्केटिंग स्टंट बनकर रह गया, जिसने एफएमसीजी कंपन‍ियों की तिजोरियां तो भरीं, लेकिन क‍िसान का भला नहीं कर पाया. 

उपदेश नहीं, दाम चाहिए

देश के किसान को अब लंबी-चौड़ी बैठकों, अल नीनो के डर और क्रॉप डायवर्स‍िफ‍िकेशन के खोखले उपदेशों की जरूरत नहीं है. किसान को अपनी हाड़-तोड़ मेहनत का जायज दाम चाहिए. जब तक कृषि मंत्रालय एमएसपी से नीचे खरीद करने वाले निजी व्यापारियों पर कानूनी नकेल नहीं कसता, C2 लागत के आधार पर शत-प्रतिशत सरकारी खरीद सुनिश्चित नहीं करता और अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं करता, तब तक मंत्री जी का बाजरे की बुवाई वाला यह ज्ञान पूरी तरह बेअसर और किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा ही रहेगा.

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