दुनिया की चीनी बाजार में हलचलभारत में बायो-एनर्जी और चीनी उद्योगों के लिए 2026-27 का समय बहुत अहम माना जा रहा है. हाल ही में दुनिया भर में चीनी के उत्पादन में कमी आई है क्योंकि कुछ देश चीनी बनाने के बजाय गन्ने से इथेनॉल बनाने को ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं. इथेनॉल एक तरह का ईंधन है जिसका इस्तेमाल पेट्रोल के साथ मिलाकर गाड़ियों में किया जाता है. जब दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इथेनॉल की मांग भी बढ़ जाती है, नतीजतन, कई देश चीनी के मुकाबले ज़्यादा इथेनॉल का उत्पादन कर रहे हैं. इस बदलाव की वजह से दुनिया भर में चीनी के स्टॉक में थोड़ी कमी आई है- यानी बाज़ार में उपलब्ध चीनी की मात्रा पहले के मुकाबले कम हो गई है.
भारत में 2025-26 का साल चीनी उत्पादन के लिए थोड़ा कमजोर रहा था, लेकिन 2026-27 के लिए स्थिति बेहतर दिख रही है. पिछले दो सालों में अच्छी बारिश (मानसून) हुई है, जिससे खेतों में पानी की स्थिति सुधरी है. गन्ने की फसल को पानी की जरूरत होती है, और जब बारिश अच्छी होती है तो फसल भी अच्छी होती है. इस वजह से किसानों की पैदावार बढ़ने की उम्मीद है. इस साल लगभग 2 प्रतिशत ज्यादा जमीन पर गन्ने की खेती की गई है. इसका मतलब है कि ज्यादा किसानों ने गन्ना लगाया है.
भारत में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य सबसे ज्यादा गन्ना पैदा करते हैं. इन तीन राज्यों का योगदान देश के कुल उत्पादन में लगभग 60 प्रतिशत होता है. अगर इन राज्यों में फसल अच्छी होती है तो पूरे देश का उत्पादन भी बढ़ जाता है. अनुमान लगाया जा रहा है कि 2026-27 में भारत में गन्ने और चीनी का उत्पादन बढ़कर लगभग 33.6 मिलियन टन तक पहुंच सकता है. यह एक अच्छी खबर है क्योंकि इससे देश में चीनी की उपलब्धता बेहतर होगी और जरूरत पड़ने पर बाहर निर्यात भी किया जा सकता है.
भारत सरकार ने अभी तक चीनी के निर्यात पर कोई रोक नहीं लगाई है. इसका मतलब है कि किसान और मिलें अपनी चीनी को विदेशों में भी बेच सकते हैं. अनुमान है कि भारत लगभग 3.6 मिलियन टन चीनी निर्यात कर सकता है. हालांकि, यह मात्रा बदल भी सकती है क्योंकि यह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर करता है. अगर भारत में चीनी की कीमतें कम होंगी तो निर्यात भी थोड़ा कम हो सकता है, और अगर कीमतें अच्छी होंगी तो निर्यात बढ़ सकता है.
हालांकि उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन सबसे बड़ा खतरा मौसम से जुड़ा हुआ है. अल नीनो एक प्राकृतिक मौसम बदलाव है, जिसमें कई बार बारिश कम हो जाती है और गर्मी ज्यादा बढ़ जाती है. भारत और थाईलैंड जैसे देशों में इसका असर गन्ने की फसल पर पड़ सकता है. अगर बारिश कम हुई तो गन्ने की पैदावार घट सकती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत और अन्य देशों में उत्पादन सिर्फ थोड़ा भी कम हुआ, तो दुनिया में चीनी का संतुलन बिगड़ सकता है. इसका असर अगले साल की फसल पर भी पड़ सकता है, क्योंकि कमजोर बारिश से नई फसल की तैयारी भी प्रभावित होती है. इसलिए किसानों और सरकार को अगले दो साल तक मौसम पर खास ध्यान देना होगा.
भारत में अब गन्ने का उपयोग सिर्फ चीनी बनाने तक सीमित नहीं है. अब इसे इथेनॉल बनाने में भी इस्तेमाल किया जा रहा है. सरकार का लक्ष्य है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर प्रदूषण कम किया जाए और विदेशी तेल पर निर्भरता घटाई जाए. अभी भारत में इथेनॉल बनाने की क्षमता जरूरत से ज्यादा है, इसलिए भविष्य में इसे और बढ़ाने और नई तकनीक अपनाने की जरूरत है.
कुछ विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि आने वाले समय में ऐसे वाहन बनाए जाएं जो ज्यादा इथेनॉल पर चल सकें. इससे पर्यावरण को फायदा होगा और किसानों को भी अपनी फसल का बेहतर दाम मिलेगा. गन्ने के अलावा मक्का और खराब अनाज का भी उपयोग इथेनॉल बनाने में किया जा रहा है, जिससे यह योजना और मजबूत बनती है.
हालांकि स्थिति बेहतर दिख रही है, लेकिन चीनी मिलों पर आर्थिक दबाव अभी भी बना हुआ है. कई जगह चीनी के दाम उत्पादन लागत से कम हैं, जिससे मिलों को नुकसान हो रहा है. मिलें चाहती हैं कि सरकार चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य बढ़ाए ताकि उन्हें नुकसान न हो और वे किसानों को समय पर भुगतान कर सकें. यह समस्या हर साल सामने आती है और इसका समाधान जरूरी है.
कुल मिलाकर 2026-27 का समय भारत के लिए उम्मीद और सावधानी दोनों का समय है. एक तरफ उत्पादन बढ़ने की संभावना है और जैव-ऊर्जा क्षेत्र मजबूत हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ मौसम और एल नीनो जैसी चुनौतियाँ भी हैं. अगर मौसम अनुकूल रहा तो भारत की अर्थव्यवस्था और किसानों दोनों को बड़ा लाभ मिल सकता है.
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