डॉ. सुधांशु सिंहअंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (ISARC) के सफल नेतृत्व के बाद, डॉ. सुधांशु सिंह को अब एक और बड़ी वैश्विक जिम्मेदारी सौंपी गई है. उन्हें आगरा स्थित अंतर्राष्ट्रीय आलू केंद्र (CIP) के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र का नया निदेशक और दक्षिण एशिया प्रमुख नियुक्त किया गया है. डॉ. सिंह 1 अप्रैल से अपना नया पदभार संभालेंगे. धान के क्षेत्र में उनके विशाल और सफल अनुभव का सीधा लाभ अब आलू अनुसंधान और इसके विस्तार को मिलेगा. जिस तरह उन्होंने धान की उन्नत खेती और किसानों की आय बढ़ाने के लिए नई तकनीकों और रणनीतियों पर काम किया, वही अनुभव अब आलू के उत्पादन और गुणवत्ता सुधार में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा.
डॉ. सिंह की कार्यशैली और कृषि विज्ञान की गहरी समझ से न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के आलू किसानों को नई दिशा मिलेगी. उनकी यह नई नियुक्ति कृषि नजरिये के लिए उम्मीद की एक नई किरण है, जहां उनके पुराने प्रशासनिक और वैज्ञानिक अनुभवों के मेल से उत्तर प्रदेश और पूरे दक्षिण एशिया के कृषि नजरिये के लिए एक उम्मीद की किरण भी है.
सुधांशु सिंह के कार्यकाल का सबसे सफल पक्ष इरी ईसारक (ISARC) वाराणसी को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करना रहा है. उनके कुशल नेतृत्व में इस संस्थान ने उत्तर प्रदेश से लेकर अंतरराष्ट्रीय कृषि नेटवर्क तक अपनी मजबूत धाक जमाई. डॉ. सिंह के योगदान का मुख्य केंद्र तनाव-सहनशील धान की किस्मों (Stress-tolerant varieties) का विकास और उनका प्रबंधन रहा है. उन्होंने विशेष रूप से बाढ़, सूखा और खारेपन (Salinity) जैसी कठिन परिस्थितियों में भी बेहतर पैदावार देने वाली किस्मों पर जोर दिया. उनका शोध कार्य बाढ़ सहने वाली 'सब-वन' (Sub-1) किस्मों पर केंद्रित रहा, जिसने जलभराव वाले क्षेत्रों के किसानों के फायदेमंद हो. इसके साथ ही, उन्होंने पारंपरिक चावल की किस्मों के संरक्षण और विकास को भी प्राथमिकता दी.
इसी कड़ी में काला नमक चावल के विस्तार में उनका अहम योगदान रहा, जिससे इस सुगंधित चावल को नई पहचान मिली. डॉ. सिंह ने 'किसान तक' को बताया की खेती को 'स्मार्ट बिजनेस' बनाने के लिए जलवायु-अनुकूल कृषि और धान की सीधी बुआई (DSR) जैसी कम लागत और कम पानी वाली तकनीकों को बढ़ावा दिया. उनके इन प्रयासों से उन लाखों किसानों को संबल मिला जो गिरते भूजल स्तर और मौसम की मार झेल रहे थे. उनका मानना है कि शोध का असली महत्व तभी है जब वह सीधे किसान के खेत तक पहुंचे और उनकी आय में वृद्धि करे.
डॉ. सिंह ने 'किसान तक' को बताया कि उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय शोध की असली सफलता तभी है, जब उसका सीधा फायदा जमीन से जुड़े छोटे और स्थानीय किसान के खेत तक पहुंचे. उनके इन्हीं प्रयासों ने न केवल कृषि तकनीक को सुधारा, बल्कि किसानों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाने की नींव रखी डॉ. सिंह की सफलता की जड़ें उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद के छोटे से गांव 'समेंदा' में हैं. उनकी शुरुआती शिक्षा और कृषि के प्रति लगाव यहीं से शुरू हुआ. उन्होंने आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी की, जहां उन्होंने कृषि शिक्षा में स्वर्ण पदक प्राप्त कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया.
इसके बाद उन्होंने राजस्थान लोक सेवा आयोग के जरिए करियर शुरू किया, लेकिन उनकी खोज उन्हें फिलीपींस ले गई. वहां उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) से अपनी पीएचडी और पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप पूरी की. 30 से अधिक अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं का नेतृत्व करने वाले डॉ. सिंह के नाम 150 से अधिक वैज्ञानिक शोध पत्र दर्ज हैं, जो उनकी विद्वत्ता का प्रमाण हैं.
डॉ. सुधांशु सिंह की सेवाओं को देखते हुए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है. वर्ष 2025 में उन्हें 'इंडियन सोसाइटी ऑफ एग्रोनॉमी फेलो अवार्ड' दिया गया और हाल ही में मिला 'यूपी गौरव सम्मान 2026' उनके उन प्रयासों की मुहर है, जिन्होंने किसानों की आजीविका में सुधार किया. अब आगरा में अंतर्राष्ट्रीय आलू केंद्र (CIP) की जिम्मेदारी संभालते हुए उनका मुख्य लक्ष्य फसल विविधीकरण होगा. आगरा में इस केंद्र की स्थापना में भी उनकी बड़ी भूमिका रही है. अब वह आलू की ऐसी किस्मों और तकनीकों पर काम करेंगे जो न केवल ज्यादा पैदावार दें, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी उतरें ताकि उत्तर प्रदेश का किसान वैश्विक बाजारों में अपना उत्पाद बेच सके. 1 अप्रैल से शुरू होने वाला उनका यह कार्यकाल प्रदेश की कृषि खाद्य प्रणालियों में एक क्रांतिकारी बदलाव लाने वाला साबित होगा.
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