पेट्रोल में इथेनॉल ,डर बनाम हकीकतआजकल पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट यानी इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल को लेकर जनता और ऑटोमोबाइल सेक्टर में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. कुछ लोगों को लगता है कि सरकार यह फैसला बिना सोची-समझी जल्दबाजी में लाई है. लेकिन सरकार का कहना है कि यह रातों-रात लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि इस बड़े मिशन की शुरुआत करीब 25 साल पहले, साल 2001 में ही हो गई थी. शुरुआत में इसके पायलट प्रोजेक्ट चलाए गए और धीरे-धीरे इस नीति को आगे बढ़ाया गया. भारत में इथेनॉल का यह सफर दो दशकों से भी ज्यादा पुराना है, जिसकी शुरुआत 2001 में पहले पायलट प्रोजेक्ट से हुई, 2004 में इसका औपचारिक ऐलान हुआ और 2006 तक कई राज्यों में 5% इथेनॉल (E5) मिलाने की शुरुआत की गई.
साल 2013 में सरकारी गजट में पॉलिसी को नोटिफाई कर 10 राज्यों में 5% मिक्सिंग का लक्ष्य रखा गया, लेकिन गन्ने की सीमित उपलब्धता के कारण 2014 तक यह सिर्फ 1.5% पर ही अटका रहा. इस चुनौती से निपटने के लिए मई 2018 में बायोफ्यूल पर नई राष्ट्रीय नीति लाई गई, जिसमें गन्ने के साथ-साथ मक्के और खराब अनाज से भी इथेनॉल बनाने की छूट दी गई. इसके बाद, जून 2021 में नीति आयोग ने ऑटो कंपनियों और विशेषज्ञों से बातचीत कर एक मजबूत रोडमैप तैयार किया. फिर अगस्त 2021 में सरकारी तेल कंपनियों IOCL, BPCL, HPCLने निजी निवेश को बढ़ावा दिया, जिससे देश में इथेनॉल का उत्पादन और सप्लाई तेजी से बढ़ी.
लोग हैरान हैं कि भारत इतनी तेजी से 20 फीसदी इथेनॉल मिक्स (E20) पेट्रोल की तरफ कैसे बढ़ गया. असल में, साल 2021 में जहां देश को सिर्फ 500 से 600 करोड़ लीटर इथेनॉल की जरूरत थी, वहीं नए प्लांट और तगड़े निवेश की बदौलत आज देश में लगभग 1,200 करोड़ लीटर इथेनॉल तैयार हो रहा है. जब सप्लाई भरपूर हो गई, तो पेट्रोल में इसकी मात्रा बढ़ाना एक समझदारी भरा कुदरती कदम था. भारत ने इस मामले में ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों के पुराने तजुर्बे से बहुत कुछ सीखा है. ब्राजील में तो आज पेट्रोल में करीब 27 फीसदी इथेनॉल मिलाया जा रहा है और अमेरिका में भी E15 पेट्रोल धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है.
एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि पेट्रोल पंपों पर आम ग्राहकों को सादा पेट्रोल और इथेनॉल मिक्स पेट्रोल में से खुद चुनने का हक क्यों नहीं मिलता? सरकार का कहना है कि पूरे मुल्क में एक लाख से ज्यादा पेट्रोल पंप हैं, जो पाइपलाइनों और बड़े टर्मिनलों से जुड़े हैं. अगर हर पंप पर तीन अलग-अलग तरह के बेस ईंधन का स्टॉक रखा जाने लगा, तो इसकी रख-रखाव लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी और ईंधन की क्वालिटी पर नजर रखना नामुमकिन हो जाएगा. इसके अलावा, सरकारी बैंकों ने इथेनॉल प्लांट और स्टोरेज सिस्टम को खड़ा करने के लिए हर साल करीब 1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दिया है. अगर अब कदम पीछे खींचे गए, तो देश के किसानों और उद्यमियों का भारी नुकसान होगा.
सरकार का कहना है गाड़ी मालिकों को सबसे ज्यादा फिक्र इस बात की है कि क्या E20 पेट्रोल से उनकी गाड़ी का माइलेज कम हो जाएगा या इंजन खराब हो जाएगा? सच यह है कि इथेनॉल की वजह से माइलेज में महज 3 से 5 फीसदी तक का मामूली फर्क आ सकता है, लेकिन गाड़ी का औसत असल में आपके चलाने के अंदाज, टायर के प्रेशर और वक्त पर होने वाली सर्विस पर निर्भर करता है. इसके उलट, इथेनॉल का ऑक्टेन नंबर बहुत ऊंचा करीब 108.5 होता है, जिससे पेट्रोल की ताकत बढ़ती है और इंजन के अंदर ईंधन बेहतर तरीके से जलता है. ऑटोमोबाइल कंपनियों ने भी सालों तक लैब और सड़कों पर कड़े टेस्ट करने के बाद ही गाड़ियों को E20 के कंपैटिबल घोषित किया है और इसकी बाकायदा वारंटी दे रही हैं.
जिन लोगों के पास पुरानी गाड़ियां हैं, वे डर रहे हैं कि E20 पेट्रोल उनके इंजन के रबर के पुर्जों या फ्यूल लाइनों को गला देगा. इस डर को खारिज करते हुए देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुजुकी ने अपना एक ठोस आंकड़ा सामने रखा है. कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 2.84 करोड़ कारों की सर्विस की, जिनमें से 1.5 करोड़ गाड़ियां काफी पुरानी थीं, जिन्हें कभी E20 के लिए नहीं बनाया गया था. इसके बावजूद, एक भी गाड़ी में इथेनॉल की वजह से खराबी का कोई मामला सामने नहीं आया. अगर वाकई कोई नुकसान होता तो देश भर के सर्विस सेंटरों में शिकायतों का सैलाब आ जाता. हर स्तर पर सरकारी एजेंसियों द्वारा इसकी कड़ी निगरानी की जा रही है.
आखिरी सवाल यह है कि जब इथेनॉल सस्ता है, तो E20 पेट्रोल की कीमत सादे पेट्रोल से कम क्यों नहीं है? सरकार का कहना है दरअसल, सरकार किसानों को उनके मक्के और गन्ने की सही कीमत जैसे मक्के के इथेनॉल लिए ₹71.86 प्रति लीटर देती है. जब दुनिया में कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास होता है तो इथेनॉल पेट्रोल बनाने का खर्च लगभग बराबर बैठता है.
लेकिन इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि हर पेट्रोल टैंक का पांचवां हिस्सा हमारे अपने मुल्क में बनता है. यही वजह है कि साल 2022 से 2026 के बीच जहां पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी मुल्कों में पेट्रोल के दाम 35 से 42 फीसदी तक बढ़ गए, वहीं भारत में यह बढ़ोतरी सिर्फ 5.58 प्रतिशत रही. यह नीति देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और विदेशी निर्भरता को कम करने का एक बेहतरीन जरिया साबित हो रही है.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today