
कैरेट किंग ऑफ इंडिया कहे जाने वाले कर्नल सुभाष देसवाल की कहानीकिसान का वर्कफ्लो कैसे होता है जानते हैं आप! किसान मिट्टी तैयार करता है, बीज बोता है, खाद डालता है, सिंचाई करता है, फसल की कटाई का समय आता है और फिर अपनी फसल लेकर किसान मंडी जाता है। किसान को भी हर कामकाजी इंसान की तरह लागत से ज्यादा कमाई की उम्मीद होती है। यहीं से शुरू होता है उम्मीदों का टूटना। गांव-गांव जाकर किसानों के इंटरव्यू करते हुए कई ऐसे किसानों की कहानी सुनी है मैंने जिन्हें मंडी में लगने वाले उनकी फसल के दाम ने बुरी तरह तोड़ दिया। एक कहानी आज यहां आपको सुना रही हूं। फर्क ये है कि इस किसान ने मन टूटने के बाद दिमाग को ऐसी दिशा दिखाई कि आज ये किसान Carrot King of India के नाम से जाना जाता है।
बुलंदशहर के सिकंदराबाद को देश के प्रमुख गाजर उत्पादक क्षेत्रों में पहचान दिलाने में Carrot King of India के नाम से मशहूर सुभाष देसवाल की बड़ी भूमिका है। उन्हें इस पूरी कहानी में साथ मिला लाल कृष्ण यादव का। आज की तारीख में दोनों मिलकर करीब 1500 एकड़ में गाजर की खेती करते हैं—अपनी जमीन पर भी और सैकड़ों कॉन्ट्रैक्ट किसानों के साथ भी। लेकिन इस कहानी की शुरुआत 1500 एकड़ से नहीं हुई थी। सुभाष देसवाल मूल रूप से हरियाणा के झज्जर जिले के भदानी गांव के किसान परिवार से आते हैं। उन्होंने 1984 में भारतीय सेना की 12वीं बटालियन ज्वॉइन की और करीब 21 साल सेना में सेवा देने के बाद 2006 में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से समय से पहले रिटायरमेंट लिया।
रिटायरमेंट के बाद सिकंदराबाद में अपने बड़े भाई से मिलने के दौरान उनकी मुलाकात स्थानीय किसान और कीटनाशक कारोबारी लाल कृष्ण यादव से हुई। दोनों ने मिलकर 1998 में करीब 50 एकड़ जमीन लीज पर लेकर आलू, प्याज और गेहूं की खेती शुरू की। ये शुरुआत आसान नहीं थी। चार साल लगातार नुकसान हुआ। यहीं से सुभाष देसवाल के लिए खेती सिर्फ फसल उगाने का काम नहीं रही, बल्कि एक ऐसी पहेली बन गई जिसे उन्हें हल करना था।2002-03 में देसवाल और यादव ने सिर्फ 2 एकड़ में गाजर की खेती का प्रयोग किया। नतीजे उम्मीद से बेहतर आए। अगले साल उन्होंने गाजर का रकबा बढ़ाकर 20 एकड़ कर दिया। लेकिन उन्होंने सिर्फ फसल नहीं बदली, खेती करने का तरीका भी बदलना शुरू किया। उन्होंने पारंपरिक देसी लाल गाजर की जगह इंग्लिश कैरेट को अपनाया। इंग्लिश कैरेट यानी वही संतरी रंग वाली गाजर जो 12 महीने आपको बाजार में मिल जाती है। धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि असली कमाई सिर्फ ज्यादा फसल उगाने में नहीं, बल्कि अच्छी क्वालिटी, सही तकनीक और सही बाजार में है।

शुरुआती दिनों में सुभाष देसवाल के खेत में उगने वाली गाजर दिल्ली की आजादपुर मंडी जाती थी। किसान को फोन पर एक भाव बताया जाता था। वह उसी भाव के भरोसे फसल काटता, धोता, ग्रेडिंग करता और रात में मंडी भेज देता। लेकिन मंडी पहुंचने के बाद कहानी बदल जाती। एक ही खेप की अलग-अलग बोरियों के अलग-अलग भाव लगाए जाते और कमीशन समेत कई तरह की कटौतियां होतीं। यहीं देसवाल ने महसूस किया कि किसान अगर छोटा उत्पादक रहेगा और सिर्फ दूसरों के बताए भाव पर निर्भर रहेगा, तो वह हमेशा कमजोर रहेगा। कहते हैं- 'उस दिन जब मंडी में गया था तो मन एकदम टूट गया था। परेशान हो गया था। पहली बार ऐसा लगा कि भाई आपके साथ गलत भी हो रहा है और आप कह भी नहीं सकते। तब लगा कि हम इस तरह एक्सप्लॉइट नहीं हो सकते।' सुभाष देसवाल ने Annakshetre Podcast में बताया कि उसी दिन मैंने ठान लिया था कि हमें इतना उत्पादन और इतनी अच्छी क्वालिटी पैदा करनी है कि भाव किसान नहीं, खरीदार हमारे साथ बैठकर तय करे।' आज सुभाष देसवाल की कहानी देखकर लगता है कि यही सोच आगे चलकर उनके बिजनेस मॉडल की नींव बनी।
2004-05 में उन्होंने खेती का तरीका पूरी तरह बदलना शुरू किया। दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों की मदद से उन्होंने प्रिसिजन सीड ड्रिल का इस्तेमाल शुरू किया। इससे बीजों की बुवाई निश्चित गहराई और दूरी पर होने लगी। जहां पारंपरिक तरीके में एक एकड़ में 3 किलो से ज्यादा बीज लगते थे, वहीं प्रिसिजन फार्मिंग से जरूरत करीब 800 ग्राम प्रति एकड़ तक आ गई। इसके साथ उन्होंने लेजर लैंड लेवलिंग, रेज्ड बेड और फर्रो सिस्टम, मशीन से बुवाई, मशीनों से कटाई, गाजर की वॉशिंग और ग्रेडिंग जैसी तकनीकों को अपनाया। नतीजा? जहां पहले एक एकड़ से करीब 8–10 टन गाजर निकलती थी, वहां उत्पादन बढ़कर 20 टन से ज्यादा हो गया। बाद में हाइब्रिड वैरायटीज के इस्तेमाल से यह उत्पादन करीब 30–35 टन प्रति एकड़ तक पहुंच गया।
देसवाल की कहानी की खास बात सिर्फ उनकी अपनी खेती नहीं है। उन्होंने आसपास के किसानों को भी अपने मॉडल से जोड़ा। कॉन्ट्रैक्ट किसानों को बीज, जरूरी कृषि इनपुट, तकनीकी सहायता और मशीनों की सुविधा उपलब्ध कराई गई। बुवाई से लेकर कटाई तक कई काम मशीनों के जरिए किए जाने लगे। इससे एक किसान की सफलता धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र की गाजर अर्थव्यवस्था में बदलने लगी। सिकंदराबाद और आसपास के कई गांव इस मॉडल से जुड़े और गाजर का रकबा तेजी से बढ़ा। सिर्फ गाजर उगाई नहीं, उसकी पूरी वैल्यू चेन बनाई। वो आज उन सब लोगों के लिए एकदम खुलकर ये बात कहते हैं- 'जो लोग जमीन ना होने का रोना रोकर खेती नहीं करते वो ये देखें कि हमारे पास अपनी जमीन नहीं है फिर भी हम यहां सबसे बड़े किसान हैं।' इतना ही नहीं जो लोग ये कहते हैं कि खेती में पैसा नहीं है उनके लिए भी देसवाल का कड़ा जवाब तैयार रहता है। बताते हैं- कैसे कहते हैं लोग खेती में पैसा नहीं है...खेती में कितना पैसा है हम देख रहे हैं। आज हमारा सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर ही 100 करोड़ का है।'
2006 में देसवाल और यादव ने Sunshine Vegetables Private Limited की स्थापना की। अब लक्ष्य सिर्फ गाजर उगाना नहीं था। उन्होंने सोचा गाजर खेत से निकलने के बाद उसकी कीमत कौन तय करेगा? और इसके जवाब में सामने आया वो दिल जो मंडी जाकर टूट गया था और वो दिमाग जिसने एक नई दुनिया का दरवाजा खोला था। तो अब गाजर खेत से निकलने के बाद उसकी कीमत कोई और नहीं बल्कि कीमत तय करने वाला था-किसान खुद। इसी सोच के साथ कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग, वॉशिंग, पॉलिशिंग, ग्रेडिंग और पैकेजिंग की सुविधाएं विकसित की गईं। गाजर को लंबे समय तक सुरक्षित रखकर ऑफ-सीजन में बेहतर कीमत पर बेचने का रास्ता बनाया गया। आज उनकी कंपनी की कोल्ड स्टोरेज क्षमता बढ़कर करीब 25,000 टन हो चुकी है। 2024 में शुरू हुए इंटीग्रेटेड कोल्ड चेन प्रोजेक्ट में 6,000 टन की 0°C कोल्ड स्टोरेज, 4,000 टन फ्रोजन स्टोरेज, 5 टन प्रति घंटे की ऑटोमेटिक वेजिटेबल प्रोसेसिंग लाइन और रेफ्रीजरेटेड ट्रक्स जैसी सुविधाएं शामिल हैं।
आज सुभाष देसवाल और लाल कृष्ण यादव करीब 1500 एकड़ में गाजर उगाते हैं और उसकी प्रोसेसिंग भी करते हैं। 284 एकड़ अपनी खेती और बाकी आसपास के इलाके के सैकड़ों कॉन्ट्रेक्टर ग्रोअर्स के जरिए। उनकी गाजर सिर्फ दिल्ली-NCR या उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। राजस्थान, पंजाब, जम्मू से लेकर मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई और कोयंबटूर तक उनकी सप्लाई पहुंचती है। उनकी कहानी सिर्फ गाजर की खेती नहीं है। उनकी कहानी है-खेती को विज्ञान से जोड़ने की। किसान को बाजार से जोड़ने की। फसल को प्रोसेसिंग से जोड़ने की। और किसान को प्राइस सेटर बनाने की।
FAQs
1. गाजर की खेती के लिए कौन-सी मिट्टी सबसे अच्छी होती है?
गाजर की खेती के लिए गहरी, भुरभुरी और अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी बेहतर मानी जाती है। भारी और कड़ी मिट्टी में जड़ें ठीक से विकसित नहीं हो पातीं और गाजर का आकार व गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
2. गाजर की बुवाई का सही समय क्या है?
भारत में गाजर की बुवाई का समय क्षेत्र और किस्म के अनुसार बदलता है। सामान्य तौर पर मैदानी इलाकों में इसकी खेती ठंडे मौसम में की जाती है। उत्तर भारत में इसकी बुवाई मुख्यतः मॉनसून के बाद शुरू होती है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में समय अलग हो सकता है।
3. गाजर की फसल कितने दिनों में तैयार हो जाती है?
गाजर की फसल सामान्यतः लगभग 70–100 दिनों में तैयार हो सकती है। वास्तविक अवधि किस्म, मौसम और खेती की परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
4. गाजर की खेती में कौन-सी सिंचाई सबसे जरूरी है?
गाजर की जड़ों के अच्छे विकास के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखना जरूरी है। बुवाई के बाद शुरुआती सिंचाई और उसके बाद जरूरत के अनुसार नियमित सिंचाई करनी चाहिए। पानी का अत्यधिक जमाव फसल के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
5. एक एकड़ में गाजर का कितना उत्पादन हो सकता है?
गाजर की उपज किस्म, मिट्टी, मौसम, बीज की गुणवत्ता और खेती की तकनीक पर काफी निर्भर करती है। बेहतर प्रबंधन और उन्नत किस्म से एक एकड़ में 100-120 क्विंटल गाजर का उत्पादन हो सकता है।
6.गाजर की बेस्ट किस्में कौन सी हैं?
गाजर की प्रमुख किस्मों में पूसा केसर, पूसा मेघाली, पूसा रुधिरा, पूसा जमादग्नि और न्यू कुरोदा शामिल हैं। इनमें से किस्म का चुनाव स्थानीय जलवायु, मिट्टी और बाजार की मांग के अनुसार करना चाहिए। लाल गाजर के लिए पूसा केसर और संतरी रंग की गाजर के लिए न्यू कुरोदा जैसी किस्में अच्छी मानी जाती हैं।
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