जैविक खेती का दायरा तेजी से बढ़ रहा हैभारतीय कृषि में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. अब किसानों का ध्यान केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि मिट्टी की क्वालिटी, फसल की सुरक्षा, उत्पादन लागत में कमी और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दे भी खेती के केंद्र में आ गए हैं. यही वजह है कि किसान तेजी से जैव-कीटनाशकों, बायो फर्टिलाइजर, नीम आधारित उत्पादों, कंपोस्ट और प्राकृतिक खेती के विकल्पों को अपना रहे हैं.
इस बारे में डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक और पादप रोग विशेषज्ञ प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह का कहना का कहना है कि खेती का भविष्य पूरी तरह रासायनिक या पूरी तरह जैविक खेती में नहीं, बल्कि दोनों के वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग में छिपा है. इसका मकसद रासायनिक इनपुट्स पर अनावश्यक निर्भरता कम करना और टिकाऊ कृषि प्रणाली विकसित करना है.
पौध संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार साल 1994-95 में देश में जैव और नीम आधारित कीटनाशकों का उपयोग केवल 123 मीट्रिक टन था. यह बढ़कर वर्ष 2024-25 में 7,649 मीट्रिक टन तकनीकी ग्रेड तक पहुंच गया.
विशेषज्ञों के अनुसार करीब 62 गुना की यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि किसान अब जैव-आधारित पौध संरक्षण तकनीकों पर अधिक भरोसा करने लगे हैं. इसके पीछे कीटनाशकों के प्रति कीटों में बढ़ता प्रतिरोध, लाभकारी कीटों और परागण करने वालों के संरक्षण की जरूरत और खाद्य उत्पादों में रासायनिक अवशेषों को लेकर बढ़ती जागरुकता प्रमुख कारण हैं.
राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP) के वर्ष 2024-25 के आंकड़े भी इस बदलाव की पुष्टि करते हैं. देश में लगभग 39.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र जैविक सर्टिफिकेशन के दायरे में आ चुका है. इसमें करीब 22.5 लाख हेक्टेयर प्रमाणित जैविक क्षेत्र शामिल है और 17.1 लाख हेक्टेयर में तेजी से काम चल रहा है.
इसी अवधि में लगभग 46.99 लाख मीट्रिक टन जैविक उत्पादन दर्ज किया गया. वहीं भारत ने 3.68 लाख टन से अधिक जैविक उत्पादों का निर्यात किया, जिससे करीब 5,394 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा अर्जित हुई. इससे स्पष्ट है कि जैविक खेती केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि किसानों के लिए बेहतर बाजार और अतिरिक्त आय का माध्यम भी बन रही है.
केंद्र सरकार ने नवंबर 2024 में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन को मंजूरी दी थी. इस मिशन के लिए 2,481 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में मिशन के तहत 18,893 किसान समूहों के माध्यम से लगभग 10.32 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को जोड़ा गया है. इस पहल में करीब 20.93 लाख किसान शामिल हुए हैं. मिशन का उद्देश्य स्थानीय संसाधनों, पशुधन आधारित इनपुट और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देकर खेती की लागत कम करना है.
विशेषज्ञों के अनुसार ट्राइकोडर्मा जैसे लाभकारी कवक मिट्टी और बीज जनित कई रोगों के नियंत्रण में उपयोगी साबित हो रहे हैं. वहीं बैसिलस और स्यूडोमोनास जैसे सूक्ष्मजीव पौधों की जड़ों के आसपास सक्रिय होकर रोग फैलाने वाले कारकों को नियंत्रित करने और पौधों की वृद्धि बढ़ाने में मदद करते हैं.
इसी तरह ब्यूवेरिया बैसियाना और मेटाराइजियम जैसे जैविक एजेंट कई हानिकारक कीटों के प्रबंधन में प्रभावी माने जाते हैं. नीम और अजादिरैक्टिन आधारित उत्पाद भी चूसक और पत्ती खाने वाले कीटों के नियंत्रण के लिए उपयोग किए जा रहे हैं.
पोषण प्रबंधन के क्षेत्र में राइजोबियम, एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम, फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु और माइकोराइजा जैसे बायो फर्टिलाइजर की मांग लगातार बढ़ रही है. वहीं वर्मी कंपोस्ट, सामान्य कंपोस्ट और हरी खाद मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाने और उसकी उर्वरता सुधारने में मदद कर रहे हैं.
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जैविक उत्पाद प्रभावी जरूर हैं, लेकिन इन्हें किसी चमत्कारी समाधान की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. जीवित सूक्ष्मजीवों वाले उत्पादों को काम करने के लिए उचित नमी, तापमान और समय की जरूरत होती है. इसलिए इनका उपयोग रोकथाम की रणनीति के रूप में अधिक लाभकारी होता है.
विशेषज्ञ समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन (IPM) मॉडल अपनाने की सलाह देते हैं. इसमें स्वस्थ बीज, रोगरोधी किस्में, फसल चक्र, खेत की सफाई, संतुलित पोषण, जैविक नियंत्रण और आवश्यकता पड़ने पर सीमित रासायनिक नियंत्रण शामिल होता है.
विशेषज्ञों ने किसानों को चेतावनी दी है कि बाजार में उपलब्ध हर जैविक उत्पाद समान क्वालिटी का नहीं होता. इसलिए खरीदारी के समय उत्पाद का रजिस्ट्रेशन, बैच नंबर, निर्माण और एक्सपायरी डेट, भंडारण निर्देश और लेबल पर दिए गए उपयोग के निर्देश को जरूर जांचना चाहिए.
साथ ही जैविक उत्पादों को तेज धूप और अधिक तापमान से बचाकर रखना जरूरी है, क्योंकि इससे उनकी प्रभावशीलता घट सकती है.
डॉ. एस. के. सिंह ने कहा कि भविष्य की खेती का मंत्र "कम रसायन" नहीं बल्कि "सही विज्ञान" होना चाहिए. उनका मानना है कि जैविक और सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों को वैज्ञानिक तरीके से समेकित प्रबंधन प्रणाली में शामिल कर खेती को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सकता है.
विशेषज्ञों के अनुसार बदलती खेती का मूल मंत्र यही है कि फसल की समस्या की सही पहचान हो, क्वालिटी से भरे उत्पाद का चयन किया जाए, सही समय पर उसका उपयोग किया जाए और सभी निर्णय वैज्ञानिक सलाह के आधार पर लिए जाएं. तभी जैविक विकल्प किसानों के लिए वास्तविक लाभ का माध्यम बन सकेंगे.
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