जलवायु परिवर्तन के अनुकूल है सबौर मसूरी धान की किस्मजलवायु परिवर्तन को विश्वभर में एक बड़ी समस्या के तौर पर देखा जा रहा है. कृषि क्षेत्र में भी जलवायु परिवर्तन का बड़ा असर है, जिससे फसलों के उत्पादन पर गंभीर परिणाम देखे जा रहे हैं. देश के भीतर कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा अब मुख्य फसलों में शामिल धान और गेहूं की ऐसी किस्मों को विकसित करने के प्रयास जारी है, जिन पर जलवायु परिवर्तन का असर कम हो. इस दिशा में खरीफ सीजन के शुरू होने से पहले ही धान की एक नई किस्म को सैंट्रल वैरायटी रिलीज कमेटी से स्वीकृति मिल गई है. धान की इस नई किस्म का नाम सबौर मसूरी धान (Sabour Masoori) है. धान की इस किस्म को बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ प्रकाश सिंह ने विकसित किया है. धान की यह किस्म किसानों को समृद्ध करने का काम करेगी. वहीं इस किस्म को देश के 10 राज्यों के लिए उपयुक्त पाया गया है
सबौर मसूरी धान (Sabour Masoori) की किस्म का परीक्षण बीते 4 वर्षों से 19 राज्यों में अखिल भारतीय समन्वित धान सुधार परियोजना के अंतर्गत किया जा रहा था. राष्ट्रीय स्तर पर सफल परीक्षण के बाद सैंट्रल वैरायटी रिलीज कमेटी ने इसे देश के 10 राज्य के लिए मंजूरी दे दी है. केंद्र की मंजूरी के बाद उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, कर्नाटक एवं केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी में इसे उगाया जा सकेगा. मौसम की मार को झेलने में धान की किस्में काफी अनुकूल है. वहीं इस किस्म में पानी और उर्वरक भी दूसरी किस्मों के मुकाबले कम लगते हैं और आंधी तूफान को भी यह ज्यादा मजबूती से झेल सकती है.
सबौर मसूरी धान की किस्म को विकसित करने वाली विज्ञानी डॉ प्रकाश सिंह का कहना है की इस किस्म का उत्पादन धान की दूसरी किस्मों के मुकाबले काफी बेहतर है. 105 -110 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक इसका उत्पादन पाया गया है, जो दूसरी धान की किस्मों के मुकाबले ज्यादा बेहतर है.
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खरीफ सीजन से पहले किसानों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल विकसित हुई सबौर मसूरी धान की किस्म रोग प्रतिरोधी भी है. यह किस्म झुलसा रोग लगने और कीट के प्रति ज्यादा सहनशील भी है. धान की लगभग सभी किस्म में झुलसा रोग एक बड़ी समस्या है. वहीं इस किस्म की बुवाई से किसान की फसल लागत कम होगी, जिससे वह समृद्ध होगा.
सबौर मसूरी धाम की उत्पादन क्षमता दूसरी किस्मों के मुकाबले काफी बेहतर है. यह किस्म 135 से 40 दिनों में तैयार हो जाती है. प्रति हेक्टेयर इसका उत्पादन 105-110 क्विंटल तक है. वही प्रति पौधे में 18 से 20 कल्ले निकलते हैं जिसमें धान की बालियां लगती हैं. वही इस धान में एमाइलॉज भी 24% होता है जिसके चलते पकने के बाद यह चावल काफी मुलायम और भूरभरा होता है.
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