खरपतवारनाशी पैराक्वाट पर घमासान! एग्रोकेमिकल कंपनियां रोक के खिलाफ, किसान संगठन बैन पर अड़े

खरपतवारनाशी पैराक्वाट पर घमासान! एग्रोकेमिकल कंपनियां रोक के खिलाफ, किसान संगठन बैन पर अड़े

पैराक्वाट डायक्लोराइड पर आंध्र प्रदेश के अस्थायी बैन के बाद विवाद तेज हो गया है. किसान संगठन इसे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बता रहे हैं, जबकि कंपनियां कह रही हैं कि इस पर रोक से किसानों की लागत बढ़ जाएगी और खेती प्रभावित होगी.

Advertisement
खरपतवारनाशी पैराक्वाट पर घमासान! एग्रोकेमिकल कंपनियां रोक के खिलाफ, किसान संगठन बैन पर अड़ेपैराक्‍वाट डाइक्‍लोराइड बैन पर घमासान (AI Image)

देश में पैराक्वाट डाइक्लोराइड को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है. आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा इस शाकनाशी पर 60 दिन का अस्थायी बैन लगाए जाने के बाद एग्रो केमिकल कंपनियां और उनके संगठन खुलकर इसके विरोध में उतर आए हैं. इसी बीच, क्रॉपलाइफ इंडिया ने सरकार से अपील की है कि किसी भी फैसले से पहले वैज्ञानिक तथ्यों और किसानों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखा जाए. संगठन का कहना है कि पैराक्वाट जैसे शाकनाशी पर अचानक रोक लगाने से किसानों की लागत बढ़ सकती है और खेती पर असर पड़ सकता है.

बैन लगाने से किसानों की लागत बढ़ेगी: क्रॉपलाइफ इंडिया

क्रॉपलाइफ इंडिया के चेयरमैन अंकुर अग्रवाल ने बयान जारी कर कहा कि किसानों की आत्महत्या जैसी गंभीर समस्या का समाधान किसी एक रसायन पर प्रतिबंध लगाने से नहीं होगा. किसानों की असली परेशानी कर्ज, फसल खराब होना, बढ़ती लागत और आय का संकट है. संगठन ने दावा किया कि पैराक्वाट कम लागत में खरपतवार नियंत्रण का प्रभावी विकल्प है और इसका इस्तेमाल लाखों एकड़ क्षेत्र में किया जाता है. कंपनी का तर्क है कि अगर इसे बाजार से हटाया गया तो किसानों को महंगे विकल्प अपनाने पड़ेंगे, जिससे खेती की लागत और बढ़ सकती है.

PMFAI ने दिया ये तर्क

वहीं, घरेलू कृषि रसायन उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाला PMFAI यानी पेस्टिसाइड्स मैन्युफैक्चरर्स एंड फॉर्म्युलेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया भी सक्रिय हो गया है. संगठन ने केंद्र सरकार से अपील की है कि कृषि रसायनों को लेकर कोई भी फैसला "मेक इन इंडिया" और "आत्मनिर्भर भारत" को ध्यान में रखकर लिया जाए. पीएमएफएआई ने दावा किया कि भारत दुनिया का बड़ा जेनेरिक एग्रो केमिकल उत्पादक देश बन चुका है और अत्यधिक सख्ती से घरेलू उद्योग प्रभावित हो सकता है.

क्‍यों विवादों में है पैराक्वाट डाइक्लोराइड?

दरअसल, पैराक्वाट डाइक्लोराइड खेती में इस्तेमाल होने वाला एक तेज असर वाला शाकनाशी है, जिसका उपयोग खेतों में खरपतवार खत्म करने के लिए किया जाता है. खासतौर पर जायद मूंग जैसी फसलों में कटाई से पहले फसल सुखाने को लेकर इसका इस्तेमाल लंबे समय से विवादों में रहा है. किसान संगठनों और कई विशेषज्ञों का आरोप है कि इसका अंधाधुंध इस्तेमाल खाद्य सुरक्षा और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरा बन सकता है. वहीं, कई राज्‍यों में इस जहरीले केमिकल का सेवन कर किसानों की आत्‍महत्‍या करने की घटनाएं सामने आती रही हैं, आंध्र में लगने वाले अस्‍थायी बैन के पीछे यह एक बड़ी वजह बताई गई है.

किसान संगठन ने उठाई बैन लगाने की मांग

वहीं, राजस्थान में सक्रिय किसान संगठन किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने हाल ही में इस रसायन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग उठाई थी. उनका कहना है कि मूंग की फसल को जल्दी सुखाने के लिए पैराक्वाट का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे अनाज में रासायनिक अवशेष रहने का खतरा बढ़ जाता है. उनका तर्क है कि इससे लोगों में गंभीर और जानलेवा बीमारियों का जोखिम पैदा हो सकता है. साथ ही यदि निर्यात या बाजार जांच में अवशेष पाए जाते हैं तो किसानों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है.

मध्‍य प्रदेश में सामने आ चुका विवाद

यह विवाद नया नहीं है. पिछले साल मध्य प्रदेश में भी इसी तरह की आशंकाओं के चलते सरकार ने मूंग को 'जहरीला' बताते हुए सरकारी खरीद से इनकार कर दिया था. हालांकि, किसानों और विपक्ष के दबाव के बाद में सरकार ने खरीद को मंजूरी दे दी थी. इससे पहले भी अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर पैराक्वाट पर अस्थायी प्रतिबंध लगाए जाते रहे हैं. यहां तक कि कई देशों में इस रसायन पर पहले से प्रतिबंध लागू है. अब सवाल यह उठता है कि जब इस शाकनाशी को लेकर लगातार स्वास्थ्य संबंधी खतरे सामने आते रहे हैं और कई देशों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है तो भारत में अब तक सख्त कदम क्यों नहीं उठाए गए? 

POST A COMMENT