कम उत्पादन, ज्यादा आयात पर निर्भरताखेती खाद और उसकी गुणवत्ता पर बहुत अधिक निर्भर करती है. फसल को अच्छा बढ़ने के लिए समय पर सही खाद मिलना बहुत जरूरी होता है. साल 2025 के अप्रैल से नवंबर तक के आंकड़े की अगर बात करें तो इस दौरान किसानों ने पहले से ज्यादा खाद खरीदी, यानी खाद की मांग बढ़ी. लेकिन दूसरी ओर, देश में कुछ प्रमुख खादों जैसे यूरिया और डीएपी का उत्पादन जरूरत के मुक़ाबले काफी कम हो गया. यानी जब किसानों को खाद की जरूरत थी तब देश में खाद की कमी चल रही थी. इस कमी को पूरा करने के लिए भारत को विदेशों से ज्यादा खाद मंगानी पड़ी. यह जानकारी द फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) ने अपने ताजा आंकड़ों में दी है. इन आंकड़ों से साफ होता है कि अब भारत की खाद व्यवस्था में आयात की भूमिका बहुत बढ़ गई है.
यूरिया खाद भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली खाद है. किसान इसका इस्तेमाल गेहूं, धान, मक्का और कई दूसरी फसलों में करते हैं. अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच यूरिया की बिक्री बढ़ी, यानी किसानों ने ज्यादा यूरिया खरीदा. लेकिन इसी समय देश में यूरिया का उत्पादन थोड़ा कम हो गया. जब उत्पादन कम हुआ और मांग ज्यादा रही, तो सरकार और खाद कंपनियों ने बाहर के देशों से यूरिया मंगाया. इस वजह से यूरिया का आयात पिछले साल की तुलना में बहुत ज्यादा बढ़ गया. इसका फायदा यह हुआ कि किसानों को समय पर यूरिया मिलती रही और खेती का काम नहीं रुका. यह दिखाता है कि जरूरत पड़ने पर आयात किसानों के लिए बड़ा सहारा बन रहा है.
डीएपी भी एक बहुत जरूरी खाद है, खासकर फसलों की जड़ों को मजबूत बनाने के लिए. इस साल डीएपी की बिक्री लगभग पिछले साल जैसी ही रही, यानी किसानों ने इसका इस्तेमाल कम नहीं किया. लेकिन देश में डीएपी का उत्पादन घट गया. इसका मतलब यह हुआ कि भारत को अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा बाहर से मंगाना पड़ा. अब स्थिति यह है कि भारत में इस्तेमाल होने वाली डीएपी का बड़ा भाग आयात से आता है. यह बदलाव बताता है कि फॉस्फेट वाली खाद के लिए भारत धीरे-धीरे विदेशी बाजारों पर ज्यादा निर्भर होता जा रहा है.
इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि देश में खाद की जरूरत लगातार बढ़ रही है और इसे पूरा करने के लिए अलग-अलग रास्ते अपनाए जा रहे हैं. यूरिया के मामले में उत्पादन में 3.7 प्रतिशत की गिरावट आई, लेकिन मांग बढ़ने के कारण इसकी बिक्री 2.3 प्रतिशत बढ़ गई. इसी कमी को पूरा करने के लिए यूरिया का आयात 120 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा, जिससे किसानों को समय पर खाद मिलती रही. डीएपी की बात करें तो इसका उत्पादन 5.2 प्रतिशत घटा और बिक्री भी थोड़ा कम रही, लेकिन इसके बावजूद आयात 54 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गया, जिससे साफ होता है कि देश अपनी कुल जरूरत का लगभग 67 प्रतिशत डीएपी बाहर से मंगा रहा है.
एमओपी की बिक्री 8.6 प्रतिशत बढ़ी, जो इसकी मजबूत मांग को दिखाती है, हालांकि इसका आयात कुछ कम हुआ. एनपी और एनपीके खाद में उत्पादन और आयात दोनों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि बिक्री लगभग स्थिर रही, इससे यह समझ में आता है कि किसान अब संतुलित पोषण वाली खाद को ज्यादा महत्व दे रहे हैं. वहीं एसएसपी के उत्पादन में 9.5 प्रतिशत और बिक्री में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी यह साबित करती है कि देश में बनी फॉस्फेटिक खाद पर किसानों का भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है.
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