
खेत में उगने वाले खरपतवार किसानों के लिए सिर्फ एक अनचाहा पौधा नहीं, बल्कि फसल की पैदावार और आमदनी को प्रभावित करने वाली बड़ी समस्या हैं. खरपतवार फसल के साथ मिट्टी में मौजूद पानी, पोषक तत्व, धूप और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं.यदि शुरुआती अवस्था में इनका प्रभावी नियंत्रण नहीं किया जाए तो इसका सीधा असर फसल की उत्पादकता पर पड़ता है.
मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित राष्ट्रीय खरपतवार अनुसंधान संस्थान भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. संस्थान खरपतवार की पहचान, उनके प्रभाव, नियंत्रण की नई तकनीकों और किसानों तक वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाने पर काम कर रहा है.
राष्ट्रीय खरपतवार अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. जे.एस. मिश्रा ने किसान तक को बताया कि वर्ष 2004 से 2014 के बीच देश में खरपतवार के कारण फसलों को औसतन करीब 25 प्रतिशत तक नुकसान हुआ था. इस नुकसान का अनुमानित आर्थिक मूल्य लगभग 71 हजार करोड़ रुपये बताया गया.
खरपतवार की वजह से होने वाले इस नुकसान को कम करने के लिए पिछले वर्षों में वैज्ञानिक प्रबंधन, जागरूकता और बेहतर नियंत्रण तकनीकों पर जोर दिया गया.इसका असर भी देखने को मिला.
डॉ. मिश्रा के मुताबिक, 2014 से 2024 के बीच खरपतवार के कारण होने वाला फसल नुकसान घटकर करीब 14 प्रतिशत तक पहुंच गया.यानी खरपतवार प्रबंधन की तकनीकों के बेहतर इस्तेमाल से नुकसान को काफी हद तक कम करने में सफलता मिली.इसका सीधा फायदा किसानों को मिला.खरपतवार का दबाव कम होने से फसल को पानी और पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मिल सके, जिससे उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली और किसानों की आय पर भी सकारात्मक असर पड़ा.
खरपतवारों में गाजर घास (Parthenium) एक बेहद आक्रामक खरपतवार मानी जाती है. यह खेतों के साथ-साथ खाली जमीन, सड़क किनारे और अन्य स्थानों पर तेजी से फैल सकती है.
गाजर घास के नियंत्रण के लिए जबलपुर स्थित संस्थान में जैविक नियंत्रण की दिशा में भी काम किया गया है.इसके लिए ऐसे कीटों और जैविक उपायों पर शोध किया गया, जो गाजर घास के फैलाव को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं.
खरपतवार नियंत्रण में जैविक तरीकों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इससे रासायनिक नियंत्रण पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है.इसके अलावा पर्यावरण और कृषि पारिस्थितिकी को ध्यान में रखते हुए भी ऐसे उपाय महत्वपूर्ण हैं.संस्थान की ओर से गाजर घास के अलावा जाल खरपतवार सहित अन्य खरपतवारों के प्रबंधन पर भी अध्ययन और शोध किया गया है.
जबलपुर स्थित राष्ट्रीय खरपतवार अनुसंधान संस्थान पिछले करीब 37 वर्षों से खरपतवार प्रबंधन के क्षेत्र में काम कर रहा है. संस्थान का फोकस केवल खरपतवार की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके कारण होने वाले नुकसान और उनके प्रभावी नियंत्रण के वैज्ञानिक तरीकों पर भी शोध किया जाता है.यहां खरपतवार प्रबंधन के साथ जेनेटिक इंजीनियरिंग, पर्यावरण, मृदा और फसल स्वास्थ्य जैसे विषयों पर भी अध्ययन किया जा रहा है.
संस्थान के वैज्ञानिकों का उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करना है, जिसे किसान अपने खेत की परिस्थितियों के अनुसार आसानी से अपना सकें. इसके लिए शोध को प्रयोगशाला से खेत तक पहुंचाने पर भी जोर दिया जा रहा है.
संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पी.के. सिंह के मुताबिक, संस्थान में एक टेक्नोलॉजी पार्क भी विकसित किया गया है.यहां अलग-अलग फसलों में खरपतवार प्रबंधन की विभिन्न तकनीकों का प्रयोग किया जाता है.इस टेक्नोलॉजी पार्क की खास बात यह है कि वैज्ञानिक अलग-अलग परिस्थितियों में यह देखने की कोशिश करते हैं कि किस फसल में कौन-सा खरपतवार अधिक नुकसान पहुंचा रहा है और उसके नियंत्रण के लिए कौन-सी तकनीक ज्यादा प्रभावी हो सकती है.
तकनीक को खेत की परिस्थितियों में परखने के बाद उसके परिणामों को किसानों के बीच साझा किया जाता है. इससे किसानों को केवल सैद्धांतिक जानकारी ही नहीं मिलती, बल्कि वे यह भी समझ पाते हैं कि खेत में खरपतवार की पहचान कैसे करनी है और फसल के मुताबिक उसका प्रबंधन किस तरह किया जा सकता है.
खरपतवार का सबसे ज्यादा असर फसल के शुरुआती विकास चरण में देखने को मिलता है. इस दौरान फसल और खरपतवार दोनों ही मिट्टी से पानी और पोषक तत्व लेते हैं. खरपतवार तेजी से बढ़ने के कारण कई बार फसल के मुकाबले संसाधनों पर ज्यादा कब्जा कर लेते हैं.इससे फसल के पौधों को पर्याप्त पोषण और नमी नहीं मिल पाती.परिणामस्वरूप पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है और अंततः उत्पादन में कमी आ सकती है.
इसके अलावा कुछ खरपतवार खेत में कीटों और रोगों के लिए अनुकूल वातावरण भी तैयार कर सकते हैं.इसलिए केवल खरपतवार को काट देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी सही पहचान और फसल के मुताबिक वैज्ञानिक प्रबंधन जरूरी है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक खरपतवार नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सही समय है. खेत में खरपतवार बहुत ज्यादा फैल जाने के बाद नियंत्रण करना अपेक्षाकृत मुश्किल और महंगा हो सकता है.इसलिए किसान को फसल की शुरुआती अवस्था से ही खेत की निगरानी करनी चाहिए. किस फसल में कौन-सा खरपतवार है, उसका जीवन चक्र क्या है और वह फसल को कितना नुकसान पहुंचा रहा है—इन बातों को ध्यान में रखकर नियंत्रण की रणनीति तय की जानी चाहिए.
खरपतवार नियंत्रण के लिए यांत्रिक, सांस्कृतिक, जैविक और आवश्यकता के अनुसार रासायनिक उपायों का वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है.किसी भी खरपतवारनाशी का इस्तेमाल फसल, खरपतवार की प्रजाति और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए.
जबलपुर का राष्ट्रीय खरपतवार अनुसंधान संस्थान देश में खरपतवार प्रबंधन को लेकर लंबे समय से शोध कर रहा है.संस्थान की कोशिश है कि वैज्ञानिक शोध केवल संस्थान और प्रयोगशालाओं तक सीमित न रहे, बल्कि उसका फायदा सीधे किसानों को मिले.
खरपतवार के कारण होने वाले नुकसान को कम करके फसल की उत्पादकता बढ़ाना, खेती की लागत को नियंत्रित करना और किसानों की आय बढ़ाने में मदद करना इस पूरी कवायद का अहम हिस्सा है.ऐसे में खेत में दिखने वाले छोटे-छोटे खरपतवार को नजरअंदाज करना किसानों के लिए महंगा पड़ सकता है. समय पर पहचान, सही प्रबंधन और वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल फसल को खरपतवार के नुकसान से बचाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है.
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