
मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के पाटन विकासखंड के ग्राम रोंझा में मूंग और उड़द की फसल में पीतशिरा रोग और फली छेदक कीट के प्रकोप की जानकारी सामने आई है. फसल में बीमारी और कीट के हमले से परेशान किसानों ने क्षेत्र भ्रमण पर पहुंची कृषि विभाग की टीम को अपनी समस्या बताई. इसके बाद कृषि अधिकारियों ने कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक से संपर्क कर किसानों को मौके पर ही फसल बचाने के उपाय बताए.
क्षेत्र भ्रमण के दौरान किसानों ने बताया कि मूंग और उड़द की फसल में पीतशिरा रोग दिखाई दे रहा है. इस रोग के कारण पौधों की पत्तियों और पूरी फसल की बढ़वार प्रभावित हो सकती है.समय रहते रोगग्रस्त पौधों को अलग नहीं किया गया तो संक्रमण दूसरे पौधों तक फैलने का खतरा रहता है.
किसानों की इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए अनुविभागीय कृषि अधिकारी पाटन डॉ. इंदिरा त्रिपाठी ने मौके से ही कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. ए.के. सिंह से संपर्क किया.वैज्ञानिक ने फसल की स्थिति को देखते हुए किसानों को रोग और कीट नियंत्रण के संबंध में जरूरी सलाह दी.
कृषि अधिकारियों ने किसानों को सलाह दी कि पीतशिरा रोग से प्रभावित पौधों को उखाड़कर मिट्टी में दबा दें. इसका उद्देश्य रोग के आगे फैलाव को रोकना है.इसके साथ ही रोग के प्रसार को रोकने के लिए विभागीय सलाह के अनुसार बुप्रोफेजिन 32 प्रतिशत + क्लोथियानिडिन 12 प्रतिशत डब्ल्यूजी की 100 ग्राम अथवा थायमेथोक्साम 50 प्रतिशत डब्ल्यूजी की 80 ग्राम प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई.
कृषि अधिकारियों ने किसानों को यह भी कहा कि किसी भी दवा का इस्तेमाल अपनी तरफ से अधिक मात्रा में न करें और फसल की स्थिति के अनुसार कृषि विभाग या कृषि वैज्ञानिकों की सलाह लें.
मूंग और उड़द की फसल में फली छेदक कीट का प्रकोप भी किसानों के लिए चिंता का कारण बना हुआ है. यह कीट फलियों को नुकसान पहुंचाकर दाने बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है. इससे फसल की उपज पर सीधा असर पड़ने की आशंका रहती है.
फली छेदक कीट के नियंत्रण के लिए किसानों को क्विनालफॉस 25 प्रतिशत ईसी की 150 मिली प्रति एकड़ की दर से 150 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई.
इसके अलावा फली छेदक के नियंत्रण के लिए पूर्व मिश्रित कीटनाशी क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 9.3 प्रतिशत + लैम्ब्डा-सायहेलोथ्रिन 4.6 प्रतिशत जेडसी की 80 मिली अथवा नोवाल्यूरॉन 5.25 प्रतिशत + इंडोक्साकार्ब 4.5 प्रतिशत एससी की 330 मिली प्रति एकड़ की दर से 150 से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव की सलाह दी गई.
क्षेत्र भ्रमण के दौरान कृषि अधिकारियों ने केवल मूंग और उड़द ही नहीं, बल्कि धान की फसल में कीट प्रबंधन को लेकर भी किसानों को जानकारी दी.धान में भूरा, सफेद और हरा फुदका जैसे कीट फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इनके नियंत्रण के लिए पायरीप्रॉक्सीफेन 11.3 प्रतिशत + इमिडाक्लोप्रिड 1.9 प्रतिशत कीटनाशी की 400 मिली प्रति एकड़ की दर से छिड़काव की सलाह दी गई.
धान में पत्ती मोड़क और तना छेदक कीटों के नियंत्रण के लिए भी अनुशंसित कीटनाशियों का इस्तेमाल करने और 150 से 200 लीटर पानी प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करने की सलाह किसानों को दी गई.
मक्का की फसल में फॉल आर्मीवर्म से बचाव के लिए भी किसानों को जरूरी जानकारी दी गई.इसके नियंत्रण के लिए डेल्टामेथ्रिन 18.18 प्रतिशत एससी की 100 मिली अथवा पूर्व मिश्रित कीटनाशी क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 6.5 प्रतिशत + थायमेथोक्साम 5 प्रतिशत की 300 मिली प्रति एकड़ आदि अनुशंसित कीटनाशियों के उपयोग की सलाह दी गई.
कृषि अधिकारियों ने बताया कि कीटों का प्रकोप दिखाई देने पर किसान फसल की स्थिति के अनुसार समय पर नियंत्रण के उपाय करें.छिड़काव के लिए 150 से 200 लीटर पानी प्रति एकड़ की दर रखने की सलाह दी गई.
अनुविभागीय कृषि अधिकारी पाटन डॉ. इंदिरा त्रिपाठी ने किसानों से अपील की कि फसल में किसी भी तरह के रोग या कीट के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर उसे नजरअंदाज न करें. किसान तत्काल कृषि वैज्ञानिकों, कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क करें.उन्होंने किसानों को अनुशंसित कीटनाशियों का निर्धारित मात्रा में ही इस्तेमाल करने की सलाह दी.समय पर बीमारी और कीट की पहचान होने से फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है.
कीटनाशक और फफूंदनाशक की मात्रा विभाग की जानकारी के अनुसार दी गई है. खबर प्रकाशित करने से पहले स्थानीय कृषि विभाग और दवा केलेबल पर दी गई नई सलाह की जांच जरूर कर लें.
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