बढ़ते तापमान में गेहूं फसल का अधिक ध्यान रखना जरूरीमार्च के महीने में मौसम के बदलते मिजाज और अचानक हुई बारिश ने खेती के समीकरण बदल दिए हैं. पहले बढ़ती तपिश की वजह से फसल के वक्त से पहले पकने और पैदावार घटने का खौफ था, लेकिन अचानक आई बारिश के कारण अब हालात बदल चुके हैं और मौजूदा हालात में किसानों को बहुत चौकन्ना रहने की जरूरत है. ऐसे में किसानों को अपनी फसल की बारीकी से निगरानी करनी चाहिए और गेहूं की फसल का इंतजाम मौसम की चाल को देखकर ही करना चाहिए.
भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIWBR) के मुताबिक, अगर गेहूं के दानों के छिलके या डंठल पर बैंगनी या काले निशान दिख रहे हैं, तो घबराएं नहीं. यह केवल फरवरी-मार्च की गर्मी का असर है, जिससे दाने की क्वालिटी या पैदावार पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा. इसलिए किसी भी दवा का छिड़काव न करें. किसान जल निकासी का इंतजाम दुरुस्त रखें और कीड़ों और रतुआ जैसी बीमारियों पर मुस्तैद नजर बनाए रखें ताकि मेहनत की कमाई सुरक्षित रहे.
बढ़ते तापमान और लू के खतरों को देखते हुए सिंचाई का मैनेजमेंट बेहद अहम हो गया था. मगर पिछले दिनों हुई बारिश की वजह से खेतों में पानी जमा हो गया है, तो जल निकासी का फौरन बंदोबस्त करें, ताकि फसल गिर न जाए. अगर सिंचाई की जरूरत हो तो हमेशा शाम के वक्त करें और यह ध्यान रखें कि हवा की रफ्तार कम हो, क्योंकि तेज हवा में पानी देने से फसल गिर सकती है जिससे भारी नुकसान का अंदेशा रहता है.
अगर इस बारिश के बाद भी तापमान तीन दिनों तक बहुत ज्यादा बना रहे, तो हीट स्ट्रेस यानी गर्मी के तनाव को कम करने के लिए म्यूरेट ऑफ पोटाश 0.2% या पोटेशियम नाइट्रेट 2% का छिड़काव करें. अगर सिंचाई की जरूरत हो तो कोशिश करें स्प्रिंकलर का इस्तेमाल करें, जिससे फसल के गिरने का डर कम रहता है और फसल को नमी और ठंडक मिलती हैे.
फसल की सेहत को दुरुस्त रखने के लिए किसान अपने खेतों का लगातार मुआयना करें. इस मौसम में पीला रतुआ, भूरा या काला रतुआ होने का खतरा बढ़ जाता है. अगर खेत में कहीं भी रतुआ के लक्षण साफ नजर आएं, तो प्रोपिकोनाज़ोल 25EC का इस्तेमाल करें. इसकी सही खुराक 1 मिली दवा प्रति लीटर पानी है. यानी एक एकड़ के लिए 200 मिली दवा को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें. खास ख्याल रखें कि छिड़काव तभी करें जब मौसम साफ हो और पत्तियों पर ओस या बारिश का पानी न हो, वरना दवा का असर कम हो जाएगा.
गेहूं की पत्तियों पर चेपा यानी एफिड का हमला इस वक्त एक बड़ी चुनौती बन सकता है. किसानों को सलाह है कि वे 'चेपा' पर कड़ी नजर रखें. जब इनकी तादाद 10-15 एफिड प्रति टिलर तक पहुंच जाए, तभी कीटनाशक का इस्तेमाल सही रहता है. ऐसी सूरत में क्विनालफॉस 25% EC का छिड़काव करना फायदेमंद रहेगा. एक एकड़ खेत के लिए 400 मिली क्विनालफॉस को 200 से 250 लीटर पानी में मिलाकर अच्छी तरह स्प्रे करें. सही वक्त पर किया गया यह उपाय गेहूं के दाने को खोखला होने से रोकता है.
अगर फसल पूरी तरह पक कर तैयार हो चुकी है, और खेतो में नमी नही है तो वहां कंबाइन रीपर से कटाई शुरू कर देनी चाहिए. हाथ से कटाई करने वाले किसान ध्यान रखें कि मड़ाई से पहले गेहूं को अच्छी तरह सुखा लें, ताकि नमी 12-13% के बीच रहे. सबसे जरूरी बात यह है कि कटाई के बाद खेतों में बचे पराली के अवशेष हरगिज न जलाएं. पराली जलाने से जमीन की उर्वरा शक्ति खत्म होती है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है.
इसके बजाय, 'नो टिल' (no till) तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अवशेषों के साथ ही मूंग की बुवाई करें. इससे न सिर्फ जमीन की ताकत बढ़ेगी, बल्कि किसानों को कम लागत में एक अतिरिक्त फसल का मुनाफा भी हासिल होगा.
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