चना के हर क्विंटल पर किसानों को 775 रुपये का घाटा, दलहन फसलों का भी दाम नहीं दिला पा रही सरकार

चना के हर क्विंटल पर किसानों को 775 रुपये का घाटा, दलहन फसलों का भी दाम नहीं दिला पा रही सरकार

दलहन फसलों की खेती करने वाले किसानों को इस बार सही दाम नहीं मिल पा रहा है. खरीद केंद्रों की कमी और धीमी सरकारी खरीद के कारण किसान मजबूरी में अपनी उपज कम कीमत पर बेच रहे हैं. चना सहित कई दलहन फसलों पर किसानों को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है, जिससे उनकी आर्थिक परेशानियां लगातार बढ़ती जा रही हैं.

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चना के हर क्विंटल पर किसानों को 775 रुपये का घाटा, दलहन फसलों का भी दाम नहीं दिला पा रही सरकारदलहन किसानों की मेहनत पर मंडियों में चोट

राजस्थान में इस बार चना बेचने वाले किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. किसान संगठनों का कहना है कि सरकार की खरीद व्यवस्था ठीक तरीके से काम नहीं कर रही है. इसकी वजह से किसानों को अपना चना बाजार में कम दाम पर बेचना पड़ रहा है. बताया जा रहा है कि किसानों को हर क्विंटल चने पर करीब 775 रुपये तक का घाटा हो रहा है. किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए सरकार पर सवाल उठाए हैं.

खरीद केंद्र कम होने से बढ़ी परेशानी

सरकार की ‘मूल्य समर्थन योजना’ (MSP) के तहत किसानों से समर्थन मूल्य पर चना खरीदने का नियम है. इसके लिए नेफेड और एनसीसीएफ जैसी एजेंसियों को सीधी खरीद की जिम्मेदारी दी गई है. लेकिन राजस्थान में खरीद केंद्रों की संख्या बहुत कम बताई जा रही है.

मध्य प्रदेश में जहां 3,627 खरीद केंद्र बनाए गए हैं, वहीं राजस्थान में सिर्फ 773 केंद्र हैं. इनमें भी कई केंद्र ऐसे हैं जहां खरीद शुरू ही नहीं हुई. रिपोर्ट के अनुसार 30 अप्रैल तक 261 केंद्रों पर एक भी खरीद नहीं हुई थी. इसका सीधा असर किसानों पर पड़ा और उन्हें मजबूरी में बाजार में कम कीमत पर चना बेचना पड़ा.

दूसरे राज्यों से पीछे रह गया राजस्थान

चना उत्पादन के मामले में राजस्थान देश के बड़े राज्यों में शामिल है. मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात मिलकर देश का 78 प्रतिशत से ज्यादा चना उत्पादन करते हैं. इसके बावजूद खरीद व्यवस्था में राजस्थान काफी पीछे दिखाई दे रहा है.

महाराष्ट्र में लाखों टन चना खरीदा जा चुका है और वहां खरीद प्रक्रिया तेजी से चल रही है. गुजरात और मध्य प्रदेश की स्थिति भी बेहतर बताई जा रही है. लेकिन राजस्थान में लगभग 23 लाख टन उत्पादन होने के बाद भी डेढ़ लाख टन से कम खरीद हुई है. यह तय लक्ष्य का 25 प्रतिशत से भी कम माना जा रहा है.

पंजीकरण प्रक्रिया भी बनी बड़ी समस्या

किसानों का कहना है कि चना बेचने के लिए पंजीकरण करवाना भी आसान नहीं है. राजस्थान में राजफेड के जरिए पंजीकरण किया जाता है, लेकिन इसकी प्रक्रिया काफी कठिन बताई जा रही है. किसान नेताओं का आरोप है कि यह प्रक्रिया “चूहा-बिल्ली के खेल” जैसी हो गई है.

राजस्थान में पंजीकरण के लिए जनआधार कार्ड मान्य है. इससे एक परिवार में कई खातेदार होने के बावजूद केवल एक व्यक्ति की ही खरीद हो पाती है. वहीं नेफेड और एनसीसीएफ आधार कार्ड के आधार पर खरीद करते हैं, जिससे परिवार के सभी खातेदार अपनी उपज बेच सकते हैं.

किसानों ने सरकार से की सुधार की मांग

किसान संगठनों का कहना है कि पिछले 10 वर्षों से इस व्यवस्था में सुधार की मांग की जा रही है, लेकिन अभी तक कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ. किसानों का कहना है कि अगर खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए और पंजीकरण प्रक्रिया आसान बनाई जाए, तो किसानों को सही दाम मिल सकता है.

राजस्थान के किसान अब उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार जल्द कदम उठाएगी, ताकि उन्हें अपनी मेहनत की फसल का उचित मूल्य मिल सके और घाटे से राहत मिल पाए.

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