पिता के नाम पर बनाया खास आमगर्मी का मौसम आते ही आम की मिठास लोगों को अपनी ओर खींचने लगती है. अल्फांसो, दशहरी, लंगड़ा, चौसा और केसर जैसे आमों के बारे में तो आपने खूब सुना होगा, लेकिन बिहार के एक किसान ने अपनी मेहनत और जुनून से आम की ऐसी नई वैरायटी तैयार की है, जो अब लोगों के बीच चर्चा और आकर्षण का केंद्र बन गई है. खास बात यह है कि इस आम का नाम उन्होंने अपने दिवंगत पिता की याद में रखा है. वहीं, इस आम की खास बात ये हैं कि इसकी वजन एक किलो तक होती है. आइए जानते हैं इस आम के तैयार होने की कहानी.
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के राहुआ गांव के रहने वाले रामकिशोर सिंह ने वर्षों की मेहनत के बाद 'नागेंद्र भोग' नाम की एक नई आम की किस्म विकसित की है. यह नाम उन्होंने अपने पिता नागेंद्र सिंह के सम्मान में रखा है. आज यह आम न केवल गांव और जिले में बल्कि सोशल मीडिया और देश के कई हिस्सों में चर्चा का विषय बना हुआ है. बता दें कि रामकिशोर सिंह पेशे से नर्सरी संचालक हैं.
उन्होंने बताया कि इस खास आम को तैयार करने में उन्हें करीब पांच साल का समय लगा. इस दौरान उन्होंने आम की कई किस्मों पर लगातार प्रयोग किए. मिठास, खुशबू, आकार, गूदे की क्वालिटी और लंबे समय तक सुरक्षित रहने जैसी खूबियों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने चार अलग-अलग आम की किस्मों का संकरण किया. आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और 'नागेंद्र भोग' का जन्म हुआ.
इस आम की सबसे बड़ी खासियत इसका आकार है. दरअसल, एक 'नागेंद्र भोग' आम का वजन एक किलो तक पहुंच सकता है. इसके अलावा इसमें गूदा भरपूर होता है, गुठली पतली होती है और स्वाद में मिठास और हल्की खटास का बेहतरीन संतुलन मिलता है. यही वजह है कि इसे खाने वाले लोग इसका स्वाद लंबे समय तक याद रखते हैं. रामकिशोर सिंह के अनुसार, यह आम सामान्य किस्मों की तुलना में देर से पकता है और तोड़ने के बाद भी 7 से 8 दिनों तक खराब नहीं होता. इससे किसानों को इसे दूर-दराज के बाजारों तक भेजने में आसानी होती है और नुकसान भी कम होता है.
इस अनोखी किस्म की लोकप्रियता अब बिहार की सीमाओं को पार कर चुकी है. देश के कई राज्यों से लोग इसके पौधे और फल खरीदने के लिए संपर्क कर रहे हैं. इतना ही नहीं, विदेशों से भी किसान और उपभोक्ता इसमें रुचि दिखा रहे हैं. बढ़ती मांग का असर इसकी कीमत पर भी दिखाई दे रहा है. फिलहाल यह आम करीब 200 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है, जबकि पहले इसकी कीमत 100 से 150 रुपये प्रति किलो के बीच थी. रामकिशोर सिंह की यह सफलता दिखाती है कि खेती में नवाचार और धैर्य के दम पर किसान न सिर्फ नई पहचान बना सकते हैं, बल्कि कृषि क्षेत्र में नई संभावनाओं के दरवाजे भी खोल सकते हैं. 'नागेंद्र भोग' आज एक आम नहीं, बल्कि एक किसान की मेहनत, लगन और पिता के प्रति सम्मान की मिसाल बन चुका है.
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