देश में कपास और जूट से बने उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है. कपास और जूट से बने अलग-अलग उत्पादों की मांग भी लगातार बढ़ रही है. जिसके कारण इनकी खेती करने वाले किसानों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है. इतना ही नहीं इन उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण बाजार में नकली उत्पादों की संख्या भी बढ़ती जा रही है. ऐसे में कपास और जूट के उत्पादों पर बढ़ती निर्भरता को देखते हुए नई फसल की मांग बढ़ रही है. इसी में शामिल है सीसल का पौधा. आपको बता दें कि सीसल के पत्तों का इस्तेमाल अब कपड़े, रस्सी, जूते, बैग आदि बनाने में किया जा रहा है. किसान अब कपास और जूट की जगह सीसल के पत्तों से बने इन उत्पादों को बेचकर बाजार में अच्छी कीमत कमा रहे हैं.
सीसल के रेशों का इस्तेमाल जूट की तरह पारंपरिक रूप से रस्सियां और सुतली बनाने में किया जा रहा है. इन रेशों की ताकत और खिंचाव जूट के जितनी होती है जो उन्हें मजबूत और टिकाऊ बनाता है, जिससे इन रस्सियों का इस्तेमाल अलग-अलग चीजों में किया जाता है.
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सीसल का पौधा न केवल अपने उपयोगी रेशों के लिए जाना जाता है, बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद है. इसे उगाने के दौरान कम पानी की जरूरत होती है, और इसकी खेती में अधिक कीटनाशकों की भी जरूरत नहीं होती है. जिस वजह से यह पर्यावरण के अनुकूल पौधा है.
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सीसल अलग-अलग उपयोग वाला पौधा है, जिसका इस्तेमाल कई उद्योगों में किया जाता है. इसका रेशा न केवल मजबूत और टिकाऊ होता है, बल्कि इसका उपयोग कागज, कपड़ा, रस्सी, बैग, जूते और अन्य उत्पाद बनाने के लिए भी किया जाता है. इसके अलावा, सिसल का उपयोग पारंपरिक शराब मेज़कल के उत्पादन में भी किया जाता है. इसके पर्यावरणीय लाभों के कारण भविष्य में यह और भी महत्वपूर्ण हो सकता है.
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