कपास किसानों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. किसान दाम गिरने से पहले से ही परेशान थे. ऊपर से इंपोर्ट ड्यूटी खत्म होने का साफ असर अब झलकने लगा है. पिछले 10 दिनों में तीन बार कपास का फ्लोर प्राइस घटाया गया है. इसी कड़ी में गुरुवार को कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी CCI ने कपास का फ्लोर प्राइस 600 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी में 356 किलो कपास) तक घटा दिया है. यहां जान लेना चाहिए कि कॉटन का फ्लोर प्राइस न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP की तरह ही होता है, लेकिन एमएसपी से तकनीकी मायने में यह थोड़ा अलग होता है. कॉटन का फ्लोर प्राइस घटाने का मामला सरकार के उस फैसले के बाद आया है जिसमें इंपोर्ट ड्यूटी को बिल्कुल शून्य यानी खत्म कर दिया गया है. गुरुवार को पिछले 10 दिनों में तीसरी बार कपास का फ्लोर प्राइस घटाया गया है.
व्यापारिक सूत्रों ने बताया कि सीसीआई दाम में गिरावट इसलिए कर रहा है ताकि मिलों के लिए कपास के दाम को थोड़ा कम और आकर्षक बनाया जा सके. सीसीआई एक सरकारी संस्था है जो कपास से जुड़े मामलों को देखती है. सूत्रों का कहना है कि सीसीआई आने वाले समय में और भी दाम गिरा सकता है ताकि कपास के स्टॉक को मिलों के लायक सस्ता बनाया जा सके. इसके पीछे सीसीआई और सरकार की ये मंशा है कि मिल मालिक किसानों से डायरेक्ट सस्ते में कपास खरीदें और उन्हें आयातित कपास खरीदने की जरूरत न पड़े. इससे किसानों का कपास तो निकल जाएगा, लेकिन उन्हें नुकसान उठाना होगा क्योंकि वे अधिक दाम की उम्मीद कर रहे हैं.
19 अगस्त को जब केंद्र सरकार ने इंपोर्ट ड्यूटी हटाने का फैसला किया, तब सीसीआई ने कपास के दाम में 600 रुपये प्रति कैंडी की गिरावट की. उसके अगले दिन 500 रुपये की गिरावट हुई. इस तरह पिछले 10 दिन में कपास के फ्लोर प्राइस में 1700 रुपये तक की गिरावट है. कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के अध्यक्ष अतुल गणात्रा ने 'बिजनेसलाइन' से कहा, "CCI की कीमतें अभी भी मिलों की अपेक्षा से ज्यादा हैं. साथ ही, उनकी क्वालिटी अब बचे हुए स्टॉक से आ रही है क्योंकि अच्छा कपास पहले ही बिक चुका है. इसलिए, CCI को अपनी कीमतों में कम से कम 2,000 प्रति कैंडी की और कमी करनी होगी." गुरुवार को, CCI मिलों को केवल 6,000 गांठें (170 किलो की) ही बेच पाई, और 2,600 गांठें व्यापारियों को बेची गईं.
CCI, जिसने 2024-25 के मार्केटिंग सीजन के दौरान MSP पर 1 करोड़ गांठें खरीदी थीं, के पास अभी भी लगभग 27 लाख गांठें हैं. इसके अलावा, उनके पास लगभग 18 लाख गांठें ऐसी हैं जो बिक चुकी हैं लेकिन उठाई नहीं गई हैं, गणात्रा ने कहा. रायचूर स्थित सोर्सिंग एजेंट और ऑल इंडिया कॉटन ब्रोकर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रामानुज दास बूब ने कहा, "जब तक सीसीआई कीमतें कम नहीं करता, उसे अपना स्टॉक बेचना मुश्किल हो सकता है. उन्हें अपनी कीमतें आयातित कपास के बराबर रखनी होंगी." दास बूब ने बताया कि इसके अलावा, जिन रीसेलर ने पहले कपास खरीदा था, वे भी सीसीआई की कीमत से लगभग 500 रुपये कम पर कपास बेच रहे हैं.
पिछले हफ्ते, सीसीआई के अध्यक्ष ललित कुमार गुप्ता ने 'बिजनेसलाइन' को बताया था कि आयात शुल्क हटने के बाद घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ने की आशंका के बीच, सरकारी संस्था सीसीआई अक्टूबर से शुरू होने वाले नए सीजन के लिए बाजार में हस्तक्षेप के लिए पूरी तरह तैयार है. किसानों और किसान समूहों ने इंपोर्ट ड्यूटी हटने पर चिंता जाहिर की है, जिससे उनकी आय पर असर पड़ेगा.
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