कागज पर MSP का जश्न-मंडियों में किसान पस्त, सरकारी आंकड़ों ने ही खोल दी दावों की पोल

कागज पर MSP का जश्न-मंडियों में किसान पस्त, सरकारी आंकड़ों ने ही खोल दी दावों की पोल

MSP vs Market Price: मई के शुरुआती सप्ताह में देश भर की मंडियों में प्रमुख फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से 5 से 25 प्रतिशत कम दर पर बिकीं. धान, गेहूं, बाजरा, सूरजमुखी और दलहन फसलें भी MSP से नीचे बिकीं. इसका मतलब यह है क‍ि सिर्फ एमएसपी घोषित करना ही काफी नहीं है. कृषि मंत्रालय की र‍िपोर्ट ने बताया-क्यों MSP गारंटी मांग रहे हैं किसान?

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कागज पर MSP का जश्न-मंडियों में किसान पस्त, सरकारी आंकड़ों ने ही खोल दी दावों की पोलएमएसपी से क्यों कम है दाम?

सरकारें हर साल चुनावी मंचों और प्रेस कॉन्फ्रेंस से फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी का ढिंढोरा तो पीटती हैं, लेकिन देश की अनाज मंडियों से जो ताजा सच निकलकर सामने आया है, वह क‍िसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है. कृषि मंत्रालय की एक आंतरिक और आधिकारिक डेटा शीट ने इस कड़वी हकीकत पर मुहर लगा दी है कि देश के किसानों को उनकी मेहनत की गाढ़ी कमाई का न्यूनतम हक भी नहीं मिल पा रहा है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस हफ्ते देश की मंडियों में धान, गेहूं और दालों समेत सभी 11 प्रमुख फसलें सरकार द्वारा तय MSP से औसतन 5 से लेकर 25 फीसदी तक के भारी घाटे के साथ बिकीं. यह डेटा साफ करता है कि कागजों पर घोषित राहत और किसान की जेब तक पहुंचने वाली कीमत के बीच की खाई आज भी कितनी गहरी है.

केंद्रीय कृषि मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, मई के शुरुआती सप्ताह में कोई भी प्रमुख फसल मंडी में अपनी MSP का आंकड़ा नहीं छू सकी है. सबसे बदतर स्थिति मोटे अनाजों और तिलहन उगाने वाले किसानों की है. सबसे तगड़ी मार मक्का, बाजरा और सूरजमुखी के किसानों पर पड़ी है. इसी तरह देश में मांग के मुकाबले दालों की कमी है. ऐसे में इनकी कीमतें तो अच्छी होनी चाह‍िए. लेकिन डेटा कुछ और ही कह रहा है. देश की सबसे मुख्य खाद्य फसलें, धान और गेहूं का दाम भी एमएसपी से कम ही रहा. यानी जो सीधे देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ी हैं, वे भी सुरक्षित नहीं हैं. 

क‍िसका क‍ितना कम रहा दाम? 

  • बाजरा का MSP 2,775 रुपये है, लेकिन बिक रहा है मात्र 2,066 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल पर. यानी एमएसपी से 25.55 फीसदी कम दाम पर. यह गिरावट बताती है कि मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के दावों के बीच बाजार किसानों का साथ नहीं दे रहा है.
  • सूरजमुखी का एमएसपी 7,721 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल है, लेक‍िन इसका बाजार भाव केवल 5,870 रुपये है. यानी इसका भाव एमएसपी से 23.97 फीसदी कम रहा. यह अंतर तिलहन उत्पादन बढ़ाने की कोशिशों को कमजोर करता है.
  • ज‍िस मक्का से इथेनॉल बनाकर क‍िसानों को उर्जादाता बनाने का ख्वाब द‍िखाया गया उसका भी हाल देख‍िए. इसका एमएसपी 2,400 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल है, जबक‍ि बाजार भाव 1,889 रुपये ही रहा. यानी एमएसपी से 21.29 फीसदी कम.
  • मूंग सबसे महंगी दालों में से एक है. इसकी एमएसपी 8,768 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल है. लेक‍िन इसका बाजार भाव 7,556 रुपये ही रहा. यानी एमएसपी से 13.82 फीसदी कम.
  • उड़द का एमएसपी 7800 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल है, लेक‍िन बाजार भाव 6966 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल रहा. यानी उड़द का बाजार भाव एमएसपी के मुकाबले 10.69 फीसदी कम रहा.
  • अरहर का एमएसपी 8000 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल है, लेक‍िन बाजार भाव 7298 रुपये प्रति क्व‍िंटल रहा. इसका मतलब यह है क‍ि अरहर का दाम एमएसपी से 8.78 फीसदी कम रहा. यानी दाल उत्पादकों को भी इस हफ्ते मंडियों में सही दाम नहीं मिला.
  • धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,369 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल रहा, लेकिन मंडी भाव 2,255 ही दर्ज क‍िया गया है. यानी एमएसपी से 4.81 फीसदी कम.
  • रबी सीजन की मुख्य फसल होने के बावजूद गेूहं की कीमत उसकी MSP 2,585 से कम रही. इसका भाव 2,479 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल रहा. यानी 4.10 फीसदी की कमी.

दाम क्यों है कम?

सरकारी खरीद की सीमित पहुंच इसकी बड़ी वजह है. देश में मुश्क‍िल से अभी 12 फीसदी क‍िसानों को ही एमएसपी का फायदा म‍िल पा रहा है. बाकी बाजार के भरोसे हैं. जब बाजार में क‍िसी फसल का दाम बढ़ता है तब सरकार एक्सपोर्ट बैन लगाकर और इंपोर्ट ड्यूटी घटाकर उसे ग‍िरा देती है, लेक‍िन जब दाम घटता है तो गायब हो जाती है. ऐसे में क‍िसानों को सही कीमत नहीं म‍िल पाती. एमएसपी का लाभ केवल उन्हीं किसानों को मिल पाता है जो सीधे सरकारी खरीद केंद्रों पर अपनी फसल बेच पाते हैं. जिन राज्यों या जिलों में सरकारी केंद्र सक्रिय नहीं हैं, वहां किसान मजबूरी में स्थानीय आढ़तियों को कम दाम पर फसल बेच रहे हैं.

दाम ग‍िरने का एक और कारण है. मई का महीना गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलों की आवक का चरम समय होता है. जब मंडियों में एक साथ भारी मात्रा में फसल आती है, तो व्यापारी कार्टेल बनाकर कीमतें गिरा देते हैं. इन फसलों की ग‍िरी हुई कीमतें किसानों के उस दर्द को बयां करती है जिसके लिए वे अक्सर एमएसपी गारंटी कानून की मांग करते हैं. यह स्थिति दर्शाती है कि सिर्फ एमएसपी घोषित कर देना काफी नहीं है, जब तक कि मंडियों में उस मूल्य पर खरीद सुनिश्चित करने का कोई मजबूत कानूनी या प्रशासनिक ढांचा न हो.  

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