सिनेमा में किसानों का मसीहा, सत्ता में आते ही मिल मालिकों के साथ, थलपति विजय की मांग पर उठे सवाल

सिनेमा में किसानों का मसीहा, सत्ता में आते ही मिल मालिकों के साथ, थलपति विजय की मांग पर उठे सवाल

Cotton Import: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. विजय जोसेफ ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर विदेशी कपास पर 11 फीसदी आयात शुल्क हटाने की मांग की है, जिससे वे विवादों में घिर गए हैं. आलोचक इसे टेक्सटाइल मिलों और कॉर्पोरेट लॉबी के पक्ष में और किसानों के हितों के विरुद्ध बता रहे हैं, जो थलपति विजय की चुनावी छवि के विपरीत है. सवाल यह है क‍ि कॉर्पोरेट विरोधी 'कत्थी' का नायक अब विदेशी कपास के आयात का पैरोकार कैसे बन गया?

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सिनेमा में किसानों का मसीहा, सत्ता में आते ही मिल मालिकों के साथ, थलपति विजय की मांग पर उठे सवालसीएम विजय जोसेफ की मांग से क‍िसान नाराज.

परदे की नौटंकी और हकीकत की सियासत का अंतर बहुत गहरा होता है, और तमिल सिनेमा के सुपरस्टार से राजनेता बने सी व‍िजय जोसेफ को इसका अहसास बहुत जल्द ही होने वाला है. अपनी ब्लॉकबस्टर फिल्म 'कत्थी' में कॉर्पोरेट घरानों की धज्जियां उड़ाकर गरीब किसानों के हक की लड़ाई लड़ने वाले विजय ने जब मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, तो लोगों को उनसे एक जन-हितैषी राजनीति की उम्मीद थी. लेकिन, अपनी नई राजनीतिक पारी की शुरुआत में ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ऐसा खत लिख दिया जिसने देश के कृषि क्षेत्र और कॉटन बेल्ट में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है. आलोचकों का मानना है कि विजय की यह मांग किसानों के बजाय सीधे तौर पर टेक्सटाइल मिलों और कॉर्पोरेट लॉबी के हितों की वकालत करती है.

मुख्यमंत्री विजय ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में मांग की है कि विदेशी कपास पर लगने वाले 11% आयात शुल्क (Import Duty) को तुरंत खत्म किया जाए. विजय का तर्क है पिछले कुछ समय में कपास की कीमतें 54,700 से बढ़कर 67,700 प्रति कैंडी हो चुकी हैं. एक कैंडी में 340 किलोग्राम होता है. सूत (Yarn) के दाम बढ़ने से तमिलनाडु का विशाल टेक्सटाइल और कपड़ा उद्योग बड़े संकट में है, जिससे लाखों मजदूरों के रोजगार पर खतरा है. दरअसल, यह वही मांग है जिसे देश की टेक्सटाइल इंडस्ट्री की ताकतवर लॉबी सालों से दोहराती आ रही है सवाल यह उठ रहा है कि रील लाइफ में कॉरपोरेट से लोहा लेने वाले नेताजी रीयल लाइफ की सत्ता में आते ही इतनी जल्दी उद्योगों के दबाव में कैसे आ गए?

महंगाई है या कोई और बात? 

तम‍िलनाडु के सीएम जोसेफ व‍िजय भले ही टेक्सटाइल लॉबी के कहने पर महंगे कपास का रोना रो रहे हैं, लेक‍िन भारत सरकार की र‍िपोर्ट उनके महंगाई वाले दावों को खार‍िज करती है. केंद्रीय कृष‍ि मंत्रालय की र‍िपोर्ट बता रही है क‍ि मई 2026 में 7710 रुपये की एमएसपी वाले कॉटन का बाजार भाव स‍िर्फ 5040 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल रह गया है. इसके बावजूद टेक्सटाइल इंडस्ट्री व‍िदेशों से सस्ता कॉटन मंगाने के ल‍िए इंपोर्ट ड्यूटी जीरो करने की मांग कर रही है, ताक‍ि उनका मुनाफा और बढ़े. जबक‍ि, सरकार ने अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच जब कॉटन से 11% आयात शुल्क हटाया था तो आयात में 'उछाल' आया और उसने घरेलू किसानों की कमर टूट गई थी. क‍िसान धीरे-धीरे कपास की खेती छोड़ रहे हैं. क्योंक‍ि, अब यह फसल उनके ल‍िए घाटे का सौदा हो गई है.  

क‍िसान-कंज्यूमर और कंपनी 

अगर सरकार इंडस्ट्री के दबाव में आकर आयात के दरवाजे खोलती है, तो घरेलू किसान कपास की खेती से पूरी तरह तौबा कर लेगा. इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि जब भारत का अपना उत्पादन खत्म हो जाएगा, तब आज सस्ता कॉटन भेजने वाले देश (अमेरिका, ब्राजील आदि) भारतीय बाजार पर एकाधिकार जमा लेंगे और भविष्य में ब्लैकमेल कर मनमाना दाम वसूलेंगे. उस वक्त न तो देश के पास अपना 'सफेद सोना' होगा और न ही टेक्सटाइल इंडस्ट्री के पास मोलभाव करने की ताकत, जिससे पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और औद्योगिक ढांचा विदेशी ताकतों के रहमोकरम पर निर्भर हो जाएगा.

सस्ता कपास, महंगा कपड़ा 

बहरहाल, इस नीतिगत फैसले पर नागपुर के वरिष्ठ किसान नेता विजय जावंधिया ने मुख्यमंत्री विजय को सीधे निशाने पर लेते हुए बेहद गंभीर सवाल उठाए हैं. जावंधिया ने आक्रोश जताते हुए कहा-जोसेफ विजय, आपसे देश के गरीबों और किसानों को बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन आपकी इस मांग ने हमें गहरा दुख पहुंचाया है. आप उद्योगों की वकालत कर रहे हैं, क्या किसानों से आपकी कोई निजी दुश्मनी है? गोरे अंग्रेजों के जमाने से 'सस्ता कच्चा माल और महंगा तैयार कपड़ा' बेचने की जो शोषणकारी नीति चल रही थी, आप भी उसी को आगे बढ़ा रहे हैं. कच्चे माल की लूट से ही ये पूंजीपति अपनी तिजोरियां भर रहे हैं. 

जावंधिया ने उद्योगपतियों के दोहरे रवैये को बेनकाब करते हुए आगे जोड़ा. उन्होंने कहा क‍ि जब साल 2021 में कपास का रेट न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से ज्यादा था, तब टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने तुरंत शोर मचाकर तैयार कपड़ों के दाम बढ़ा दिए थे. लेकिन आज जब कपास का रेट एमएसपी से भी नीचे गिर चुका है और किसान घाटे में है, तब इन उद्योगों ने कपड़ों के रेट क्यों नहीं घटाए? विजय साहब, आपको न तो देश के किसान की परवाह है और न ही आम कंज्यूमर की, आपको सिर्फ कंपनियों के मुनाफे की फिक्र है.

आयात शुल्क और क‍िसान 

एक तरफ सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में एक छोटे किसान की रोजाना की शुद्ध कमाई महज 28 रुपये के आसपास है. खाद, उन्नत बीज, कीटनाशक और डीजल के दाम लगातार बढ़ने से खेती की लागत आसमान छू रही है. देश का कॉटन बेल्ट (विदर्भ, तेलंगाना, कर्नाटक) पहले से ही सबसे ज्यादा किसान आत्महत्याओं के लिए जाना जाता है, जहां किसान को अपनी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तक नसीब नहीं हो रहा है. ऐसे नाजुक समय में, मुख्यमंत्री विजय का ध्यान किसानों की बजाय मिल मालिकों की लागत पर गया. यदि केंद्र सरकार उनकी मांग मानकर 11% आयात शुल्क हटा देती है, तो भारतीय मिलें देश के किसानों से कपास खरीदने के बजाय विदेशों (अमेरिका, ब्राजील) से ड्यूटी-फ्री कपास मंगाने लगेंगी, जिससे घरेलू मंडियां पूरी तरह क्रैश हो जाएंगी. 

कसौटी पर थलपति की राजनीति

एक मुख्यमंत्री के नाते अपने राज्य के टेक्सटाइल सेक्टर और उसमें काम करने वाले लाखों श्रमिकों के रोजगार की चिंता करना विजय का अधिकार और कर्तव्य दोनों है. तमिलनाडु भारत का सबसे बड़ा कपड़ा उत्पादक राज्य है. इसलिए उद्योगों को बचाना उनकी मजबूरी हो सकती है. कॉटन उत्पादन में तम‍िलनाडु की ह‍िस्सेदारी एक फीसदी से ज्यादा नहीं होगी, ले‍क‍िन सूत यानी यार्न उत्पादन में करीब एक चौथाई शेयर है. लेकिन, उद्योगों को राहत देने के लिए देश के करोड़ों कपास उत्पादक किसानों की आजीविका को दांव पर लगा देना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता?

बहरहाल, सिनेमा के पर्दे पर संवाद बोलना और कैमरों के सामने किसानों का मसीहा बनना आसान है, लेकिन हकीकत की राजनीति में नीतिगत संतुलन बनाना ही एक सच्चे राजनेता की पहचान होती है. विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कजगम (TVK) जिस 'सोशल जस्टिस' का दावा करती है, उसकी पहली परीक्षा में वे चूकते हुए दिखाई दे रहे हैं.  

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