गन्ने की खेती के टिप्स (फाइल फोटो)उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर के वैज्ञानिकों ने प्रदेश के तमाम चीनी मिल इलाकों का दौरा कर सुझाव जारी किया है. जून महीने की यह भीषण गर्मी और सूखा मौसम गन्ने के दुश्मनों यानी कीटों के लिए सबसे माकूल वक्त होता है. वैज्ञानिकों ने उत्तर प्रदेश के करीब 10-12 जिलों का लगातार दौरा करके फसलों की सेहत का जायजा लिया है. सर्वे के मुताबिक, इस तेज धूप और कम नमी के कारण गन्ने की फसल में बेधक कीटों और कंडुआ जैसी बीमारियों का अंदेशा काफी बढ़ गया है. खासकर जो फसलें देर से बोई गई थीं, उन पर मौसम की इस मार का असर साफ दिखाई दे रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसान इस नाजुक वक्त में थोड़ी सी मुस्तैदी दिखाएं और वैज्ञानिकों के बताए तरीकों पर अमल करें, तो फसल को किसी भी तरह के बड़े नुकसान से आसानी से बचाया जा सकता है.
जून की गर्मियों के इस सूखे मौसम में गन्ने की फसल पर 'जड़ बेधक कीट' का हमला सबसे ज्यादा देखा जा रहा है. अक्सर किसान इसे गलती से अंकुर बेधक समझ बैठते हैं, लेकिन इसकी पहचान का एक बेहद आसान और पक्का तरीका है. अंकुर बेधक लगने पर जब गन्ने की सूखी हुई बीच की पत्ती यानी गोफ को ऊपर खींचा जाता है, तो वह फौरन हाथ में आ जाती है. मगर, जड़ बेधक की सूरत में गोफ सूखने के बाद भी आसानी से बाहर नहीं खिंचता.
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इसका सफेद रंग का बिना धारियों वाला लार्वा जमीन के अंदर करीब ढाई इंच नीचे जाकर तने को गोल छल्ले के आकार में काटता है. इसकी वजह से पौधे की पकड़ जमीन में मजबूत तो रहती है, लेकिन नीचे से खुराक मिलना बंद हो जाती है और धीरे-धीरे पूरा पौधा सूखकर दम तोड़ देता है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक, यूपी के माहौल में इस खतरनाक कीट की अमूमन तीन पीढ़ियां देखने को मिलती हैं. इसकी मादा तितली पत्तियों पर मोम जैसे, छोटे-छोटे गुलाबी रंग के रसीले अंडे देती है, जो पूरी पत्ती पर बिंदियों की शक्ल में बिखरे रहते हैं. अंडों से निकलने वाली सूंड़ी का जीवनकाल 23 से 43 दिनों का होता है, और यही वो वक्त है जब यह बलुई या हल्की सूखी मिट्टी वाले खेतों को सबसे ज्यादा तबाह करती है.
जड़ बेधक कीट से फसल को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने दोतरफा उपाय बताए हैं. किसानों को चाहिए कि वे बलुई मिट्टी वाले खेतों को ज्यादा दिनों तक सूखा न रखें और वक्त-वक्त पर हल्की सिंचाई करके नमी बरकार रखें. साथ ही, नर तितलियों को फंसाने के लिए खेत में फेरोमोन ट्रैप या लाइट ट्रैप का इस्तेमाल करें. अगर नुकसान ज्यादा हो, तो रासायनिक इलाज के तौर पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8% एस.एल. की 200 मिलीलीटर मात्रा को 750 लीटर पानी में घोलकर गन्ने की जड़ों के पास ड्रेंचिंग करें और तुरंत पानी लगा दें.
इस समय गन्ने की पेड़ी या बावक फसल में सिर्फ 'सैनिक कीट' देखा गया है, जो पत्तियों को कुतरकर खाता है. यह भूरे रंग का कीड़ा दिन में गन्ने की गोफ या सूखी पत्तियों में छिपा रहता है और रात या सुबह-शाम के वक्त बाहर निकलकर पत्तियां चबाता है. पीड़ित पौधों पर इसका मल साफ देखा जा सकता है. इसके सफाए के लिए प्रोफेनोफॉस + साइपरमेथ्रिन 44% या क्लोरोपायरीफॉस + साइपरमेथ्रिन 55% के तैयार मिक्चर का 300 मिलीलीटर प्रति एकड़, अथवा इमिडाक्लोप्रिड 17.8% एस.एल. का 80 से 100 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें.
कीटों के अलावा, इस चढ़ते पारे में गन्ने की कुछ किस्मों जैसे को. 0238, को.शा. 13235 और को.शा. 13231 में 'कंडुआ रोग' (Smut ) के काले कीड़े जैसे लक्षण भी कहीं-कहीं देखे गए हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का साफ कहना है कि कंडुआ का असर अभी बहुत कम है, इसलिए परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है.
अगर खेत में ऐसा कोई बीमार पौधा दिखे, तो उसे सावधानी से काटकर निकाल दें और किसी अच्छे फफूंदनाशककी 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब से मिलाकर छिड़काव कर दें. संस्थान के वैज्ञानिकों ने सभी किसानों से गुजारिश की है कि वे मई-जून के इस बेहद नाजुक महीने में रोजाना सुबह और शाम अपने खेतों की सामान्य निगरानी जरूर करें.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today